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मेकअप किट ने बदला जमाना, भिलाई में आज भी जिंदा है 80 साल पुरानी शृंगार विरासत

Traditional Beauty Tools: भिलाई के एलसी कश्यप 80 साल पुरानी शृंगार विरासत सहेज रहे हैं। उनके संग्रह में 70 दुर्लभ पारंपरिक सौंदर्य साधन मौजूद हैं।
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Sep 09, 2026
Traditional Beauty Tools
80 साल पुराने शृंगार के सामानों की अनोखी विरासत (Photo Patrika)

Traditional Beauty Tools: सुंदर दिखने की चाह नई नहीं है। आज कॉस्मेटिक उत्पादों की भरमार है, लेकिन आठ-दस दशक पहले शृंगार के लिए इस्तेमाल होने वाले साधन अब दुर्लभ हो चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य दिवस पर भिलाई का एक अनोखा संग्रह लुप्त होती इसी परंपरा की याद दिलाता है।

पारंपरिक सौंदर्य साधनों के 70 दुर्लभ नमूने

सेक्टर-7 निवासी एलसी कश्यप के पास प्राचीन और पारंपरिक सौंदर्य साधनों के 70 दुर्लभ नमूने हैं। इनमें सिंदूरदान, काजलदान और सूरमेदान प्रमुख हैं। 80 से 90 साल पुराने ये साधन पीतल, कांसे और अन्य धातुओं से बने हैं। इन पर हाथी, मोर, मछली, फूल और जालीदार पत्तियों की बारीक ढोकरा नक्काशी है। कई काजलदान में छोटा आईना और उसे कमर में टांगने के लिए कुंडा भी लगा है।

15 साल लगे संग्रह बनाने में

कश्यप ने बताया कि इस संग्रह को जुटाने में 12 से 15 साल लगे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश के हाट-बाजारों और पुराने घरों से इन्हें एकत्र किया। पुराने समय में काजलदान स्त्री और सूरमेदान पुरुष शृंगार का हिस्सा माने जाते थे। मछली आकार के सूरमेदान को शुभ और बुरी नजर से बचाने वाला माना जाता था।

नई पीढ़ी को पुरानी परम्परा से जोड़ रहे

आधुनिक कॉस्मेटिक उत्पादों के दौर में ये पारंपरिक साधन उपयोग से बाहर हो गए हैं। कश्यप का संग्रह इन्हें संजोकर रखने के साथ नई पीढ़ी को पुरानी शृंगार परंपरा और ढोकरा शिल्प से भी जोड़ रहा है। इस संग्रह को वर्ष 2021 में गोल्डन बुक ऑफ रिकॉड्र्स में दर्ज किया गया था।

काजलदान से लेकर सूरमेदान तक की अलग पहचान

पुराने समय में शृंगार के साधनों का इस्तेमाल महिला और पुरुषों की जरूरत के अनुसार भी अलग-अलग होता था। कश्यप के अनुसार काजलदान महिलाओं के शृंगार का हिस्सा माना जाता था, जबकि सूरमेदान का इस्तेमाल पुरुषों द्वारा किया जाता था। संग्रह में मौजूद मछली के आकार का सूरमेदान भी खास आकर्षण का केंद्र है। पारंपरिक मान्यताओं में मछली को शुभ माना जाता था और इसे बुरी नजर से बचाने से भी जोड़ा जाता था। इस तरह इन साधनों का संबंध केवल सौंदर्य से नहीं, बल्कि उस समय की मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं से भी था।

कॉस्मेटिक के दौर में बची है पुरानी शृंगार संस्कृति

आज बाजार में सौंदर्य उत्पादों की लंबी श्रृंखला उपलब्ध है। क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक और आधुनिक मेकअप उत्पादों ने पुराने शृंगार साधनों को लगभग अप्रचलित कर दिया है। ऐसे समय में कश्यप का संग्रह बीते दौर की उस संस्कृति को सामने लाता है, जिसमें शृंगार के साधन भी स्थानीय कला और परंपरा से जुड़े हुए थे। इन वस्तुओं को देखने पर यह महसूस होता है कि सौंदर्य की परिभाषा समय के साथ भले बदल गई हो, लेकिन सुंदर दिखने और खुद को सजाने-संवारने की इच्छा सदियों पुरानी है। अंतर सिर्फ साधनों और तौर-तरीकों का है।

Updated on:
09 Sept 2026 02:23 pm
Published on:
09 Sept 2026 02:23 pm
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