
राजनांदगांव@मोहन कुलदीप। Inspirational Story: जिंदगी की राह में जब कदम साथ छोड़ दें, तब अक्सर इंसान के हौसले भी जवाब देने लगते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी कमजोरियों को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। राजनांदगांव जिले के आदिवासी वनांचल क्षेत्र की सामाजिक कार्यकर्ता ममता चंद्रवंशी ऐसी ही एक प्रेरणादायक शख्सियत हैं। बचपन में पोलियो से प्रभावित होने के कारण दोनों पैरों से दिव्यांग हुईं ममता ने न केवल अपनी जिंदगी की मुश्किलों का सामना किया, बल्कि हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बदलाव की नई इबारत भी लिखी।
ममता की राह आसान नहीं रही। दिव्यांगता और सामाजिक चुनौतियों के बीच गांव-गांव पहुंचना, महिलाओं को जोड़ना और उन्हें बदलाव के लिए तैयार करना अपने आप में कठिन काम था। इसके बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास किए। उनके कार्यों की सराहना आईआईएम रायपुर सहित विभिन्न संस्थाओं ने की है।
ममता को छत्तीसगढ़ सरकार का माता कौशल्या सम्मान, नारी शक्ति सम्मान, राष्ट्रपति दीदी सम्मान, एनआरएलएम सम्मान, मां बम्लेश्वरी अवार्ड और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सम्मान सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। ये सम्मान उनके सामाजिक योगदान और महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को दर्शाते हैं।
ममता के सामाजिक सफर की शुरुआत वर्ष 2008 में गरिमा स्व-सहायता समूह के गठन से हुई। उस समय ग्रामीण महिलाओं के सामने आर्थिक तंगी, सीमित अवसर और सामाजिक बंदिशें बड़ी चुनौतियां थीं। महिलाओं की आमदनी बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ममता ने उन्हें संगठित करना शुरू किया। उनका प्रयास था कि महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ परिवार की जरूरतों में भी अधिक भागीदारी निभा सकें।
शुरुआत में महिलाओं को एकजुट करना और उन्हें सामूहिक प्रयासों के महत्व को समझाना आसान नहीं था। इसके बावजूद ममता ने अपना प्रयास जारी रखा। धीरे-धीरे स्व-सहायता समूह महिलाओं के लिए आपसी सहयोग, बचत और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने का माध्यम बनते गए। इस तरह एक छोटे समूह से शुरू हुआ उनका सफर व्यापक सामाजिक बदलाव के अभियान में बदलने लगा।
स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं में बचत की आदत विकसित करने, बैंक ऋण प्राप्त करने और आर्थिक गतिविधियां शुरू करने के अवसर पैदा हुए। ममता ने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए काम किया और उन्हें ऋण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में सहयोग दिया।
महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आमदनी बढ़ाना नहीं, बल्कि अपने फैसले लेने की क्षमता विकसित करना भी है। समूहों से जुड़कर महिलाओं को बचत और बैंकिंग से जुड़ने के अवसर मिले। इससे आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ाने और परिवार की जरूरतों में उनकी भूमिका मजबूत करने का रास्ता खुला।
महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए ममता ने प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए के ऋण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में सहयोग किया। उनके प्रयासों का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक अवसरों से जोड़ना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रोत्साहित करना रहा है।
ममता का मानना है कि महिलाओं का सशक्तीकरण केवल पैसे कमाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
उन्होंने खुले में शौच मुक्त अभियान, स्वच्छता जागरूकता और माहवारी स्वच्छता जैसे विषयों पर महिलाओं को जागरूक किया। इन प्रयासों के जरिए महिलाओं को स्वच्छता और स्वास्थ्य के महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया गया। माहवारी स्वच्छता जैसे विषयों पर जागरूकता बढ़ाना भी उनके सामाजिक कार्यों का अहम हिस्सा रहा।
ममता के प्रयासों का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के साथ उन्हें अपने स्वास्थ्य, अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाना है। उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ग्रामीण समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में काम किया जा सकता है।