Moon Mission Expenses: अमेरिका, चीन और रूस ने चांद तक पहुंचने में अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन भारत ने बेहद कम बजट में इतिहास रच दिया। चंद्रयान मिशनों की सफलता ने दुनिया को दिखा दिया है कि स्पेस टेक्नोलॉजी में जीत सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि स्मार्ट प्लानिंग और किफायती तकनीक से भी हासिल की जा सकती है। जानिए पूरी रिपोर्ट।
Moon Mission Expenses: चांद सिर्फ वैज्ञानिकों का सपना नहीं, बल्कि कई देशों की ताकत दिखाने का नया मैदान बन चुका है। दुनिया के बड़े देश अरबों डॉलर खर्च करके चांद तक पहुंचे, लेकिन भारत ने कम पैसों में ऐसा काम कर दिखाया कि पूरी दुनिया हैरान रह गई। अमेरिका ने जिस काम पर खरबों रुपये लगा दिए, वहीं भारत ने अपने तीन चंद्रयान मिशनों से दुनिया को 'लो-कॉस्ट स्पेस मॉडल' का नया रास्ता दिखाया। कई देश भारत की स्पेस टेक्नोलॉजी और मिशन मैनेजमेंट को केस स्टडी की तरह देख रहे हैं। आखिर भारत ने ऐसा क्या किया, और बाकी देशों ने चांद तक पहुंचने में कितना पैसा बहाया?
भारत ने चांद पर कुल 3 मिशन भेजे हैं और हर बार दुनिया को अपनी काबिलियत से हैरान किया है। इसकी शुरुआत साल 2008 में चंद्रयान-1 से हुई थी, जिसमें केवल 386 करोड़ रुपये के बजट में चांद पर पानी खोजकर इतिहास रच दिया था। इसके बाद 2019 में 978 करोड़ रुपये की लागत वाला चंद्रयान-2 मिशन भेजा गया। हालांकि, लैंडर की क्रैश लैंडिंग से इसे अधूरा माना गया, लेकिन इसके ऑर्बिटर ने आज भी जानकारी भेज रहा है।
इसी अनुभव ने चंद्रयान-3 की कामयाबी का रास्ता साफ किया। साल 2023 में करीब 615 करोड़ रुपये के खर्च में चंद्रयान-3 ने चांद के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर सफल लैंडिंग की और भारत यहां पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। इन तीनों मिशनों ने साबित कर दिया कि इसरो (Indian Space Research Organization) न केवल कम बजट में काम करता है, बल्कि उसके पास दुनिया का सबसे स्मार्ट और पावरफुल स्पेस मॉडल है। भारत के तीनों चंद्रयान मिशनों का कुल बजट लगभग 1,979 करोड़ रुपये है
अमेरिका अबतक चांद पर कुल 45 मिशन भेज चुका है। इनमें सबसे चर्चित अपोलो मिशन रहा, जिसे दुनिया के सबसे महंगे और ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों में गिना जाता है। इसी मिशन के जरिए इंसान ने पहली बार चांद की सतह पर कदम रखा था। 1960 के दशक में नासा ने इस पर करीब 25.8 बिलियन डॉलर खर्च किए थे, जिसकी आज की कीमत 25 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। यह रकम इतनी बड़ी है कि इसमें भारत के चंद्रयान जैसे सैकड़ों मिशन पूरे किए जा सकते हैं। भारत ने केवल 615 करोड़ रुपये में चंद्रयान-3 को चांद पर उतार दिया। अमेरिका के इस भारी-भरकम बजट के मुकाबले भारत की कामयाबी ने यह साबित कर दिया कि स्पेस की जंग सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि बेहतर सूझबूझ और किफायती तकनीक से भी जीती जा सकती है।
चीन कुछ सालों में अपने Chang’e प्रोग्राम के जरिए चांद मिशनों पर तेजी से काम कर रहा है। चीन करीब 10 बड़े चंद्र मिशन लॉन्च कर चुका है, जिनमें ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और सैंपल रिटर्न मिशन शामिल हैं। चीन ने Chang’e-5 और Chang’e-6 मिशनों के जरिए चांद की मिट्टी और पत्थरों के सैंपल पृथ्वी पर वापस लाकर अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Chang’e-1 मिशन की लागत करीब 1 से 1.4 बिलियन युआन (लगभग 133 से 187 मिलियन डॉलर) बताई गई थी, वहीं Chang’e-4 मिशन पर अनुमानित 500 मिलियन से 1.2 बिलियन युआन ( करीब 72 से 172 मिलियन डॉलर) तक खर्च आया था। औसतन चीन के एक रोबोटिक मून मिशन पर 100 से 200 मिलियन डॉलर (लगभग 800 से 1600 करोड़ रुपये) तक खर्च माना जाता है। चीन ने भविष्य में चंद्र बेस बनाने की योजना पर काम कर रहा है, जिससे आने वाले सालों में अमेरिका और चीन के बीच नई “मून रेस” तेज होती दिखाई दे रही है।
सोवियत संघ (Union of Soviet Socialist Republics) ने अपने Luna Program के तहत चांद पर कुल 23 से ज्यादा बड़े मिशन भेजे। 1959 से 1976 के बीच चले इस कार्यक्रम में ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और सैंपल रिटर्न मिशन शामिल थे। USSR ने दुनिया का पहला Moon Flyby, पहला Moon Impact और चांद के दूर वाले हिस्से की पहली तस्वीरें लेने जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की थीं। सोवियत संघ ने अपने चंद्र मिशनों की आधिकारिक कुल लागत कभी सार्वजनिक नहीं की, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की एक रिपोर्ट के मुताबिक सोवियत चंद्र कार्यक्रम पर उस समय लगभग 1.35 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च हुआ था। वहीं कई विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि पूरे Luna Program की कुल लागत आज के हिसाब से करीब 6 से 10 बिलियन डॉलर के बराबर मानी जा सकती है। USSR के एक चंद्र मिशन पर करोड़ों डॉलर खर्च हुए कर रहा है।
जापान ने चांद से जुड़े करीब 6 बड़े मिशन लॉन्च किए हैं, जिनमें Hiten, Kaguya , OMOTENASHI, SLIM और निजी कंपनी ispace के Hakuto-R मिशन शामिल हैं। जापान का अंतरिक्ष संगठन JAXA पिछले कई वर्षों से चंद्र मिशनों पर लगातार काम कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जापान के हालिया SLIM (Smart Lander for Investigating Moon) मिशन की लागत करीब 15 से 18 बिलियन येन (लगभग 100 से 120 मिलियन डॉलर) रही थी। जापान ने इन मिशनों के जरिए चांद पर सटीक लैंडिंग तकनीक और भविष्य के चंद्र अन्वेषण की तैयारी को मजबूत किया है। जापान भी अमेरिका और अन्य देशों के साथ मिलकर भविष्य के Moon Base प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी ( European Space Agency) का स्वतंत्र रूप से भेजा गया सबसे प्रमुख चंद्र मिशन SMART-1 माना जाता है। इसके अलावा ESA ने कई अन्य चंद्र अभियानों में साझेदारी और तकनीकी सहयोग की भूमिका निभाई है।SMART-1 मिशन को 2003 में लॉन्च किया गया था। यह मिशन चांद की सतह और खनिजों का अध्ययन करने के लिए भेजा गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक SMART-1 मिशन पर लगभग 110 मिलियन यूरो ( करीब 120 मिलियन डॉलर) तक खर्च आया था। यूरोप इन मिशनों के जरिए भविष्य के Moon Base और Deep Space Exploration कार्यक्रमों की तैयारी कर रहा है। अमेरिका और अन्य देशों के साथ मिलकर नए चंद्र अभियानों पर काम कर रहा है।