Patrika Special News

Mushroom King : आसाम गए थे व्यापार करने, हुई अल्सर की बीमारी; जानिए कैसे राजस्थान का यह शख्स बना ‘मशरूम किंग’  

Mushroom King : राजस्थान के शेखावटी का एक व्यक्ति व्यापार के सिलसिले में आसाम गया लेकिन वहां जाकर बीमार पड़ गया। प्राकृतिक चिकित्सक ने उनकी बीमारी को मशरूम खिला-खिलाकर दूर कर दिया। अब युवक को लगा कि यह तो सब्जी नहीं अचूक दवा है। उसे इस सब्जी मशरूम के पैदावार की धुन चढ़ गई। धुन ऐसी चढ़ी कि उसे लोग अब मशरूम किंग के नाम से जानते हैं। उनके बारे में विस्तार से पढ़िए रुद्रेश शर्मा की रिपोर्ट।
5 min read
• •
Sep 26, 2026
Mushroom King Dr. Motaram Sharma
मशरूम विशेषज्ञ डॉ. मोटाराम शर्मा (Photo: Rajasthan Patrika, Designed: ChatGpt)

Mushroom King : ज्यादातर मारवाड़ी परिवारों की तरह राजस्थान के शेखवाटी अंचल का वह युवा कम उम्र में ही रोजगार के लिए आसाम चला गया। वह वहां परिवार के ट्रेडिंग संबंधी कारोबार में लग गया। लेकिन इसी दौरान उसके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया। आज वह शख्स देश के गिने चुने मशरूम विशेषज्ञों में से एक है। यही नहीं उन्हें " मशरूम किंग " के नाम से जाना जाता है। आइए इस ​शख्सियत के बारे में विस्तार से जानते हैं।

हम बात कर रहे हैं, सीकर जिले के विजयपुरा गांव निवासी डॉ. मोटाराम शर्मा की। मोटाराम के " मशरूम किंग " बनने की यह कहानी तब शुरू हुई, जब वे करीब 35 की उम्र के रहे होंगे। वे आसाम में अपने पारिवारिक कारोबार में संलग्न थे, तभी उन्हें अल्सर की बीमारी हो गई। इसके उपचार के लिए वे आसाम में ही एक प्राकृतिक चिकित्सक से उपचार कराने गए।

मशरूम के सेवन से ठीक क्या हुए, एक धुन सवार हो गई

चिकित्सक ने उन्हें दवा के रूप में मशरूम का सेवन करने की सलाह दी। इसके उपयोग से उनका अल्सर का रोग तो ठीक हो ही गया। लेकिन साथ ही उन पर एक अलग ही धुन सवार हो गई। वो थी राजस्थान में मशरूम उगाने की। फिर क्या था कि मोटाराम आसाम से अपने गांव विजयपुरा (सीकर) लौट आए और यहां मशरूम उगाने का काम काम शुरू कर दिया। इस कार्य की शुरुआत में उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन धीरे-धीरे एक समय ऐसा आया, जब उनकी पहचान राजस्थान ही नहीं देश के प्रमुख मशरूम विशेषज्ञ के रूप में होने लगी।

मशरूम उत्पादन में नवाचार के लिए कई पुरस्कार

मशरूम उत्पादन में नवाचार के लिए मोटाराम को कई पुरस्कार प्राप्त हुए, लेकिन इनमें वर्ष 2019 हरियाणा के मरूथला में आयोजित नेशनल सिम्पोजियम ऑन ट्रेंड्स एंड इनोवेशन्स इन मशरूम प्रोडक्शन टेक्नोलोजीज, डायवर्सिफिकेशन, प्रोसेसिंग एंड कन्जप्शन एक ऐसा आयोजन था, जिसमें उन्हें "मशरूम किंग" कहकर संबोधित किया गया। आज डॉ. मोटाराम मशरूम सोसायटी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। 

देश में पहली बार गेनोडर्मा किस्म की खेती का श्रेय

मोटाराम शर्मा को देश में पहली बार मशरूम की गेनोडर्मा किस्म की खेती शुरू करने का श्रेय है। इसके लिए वर्ष 2010 में उन्हें सम्मानित किया गया। शर्मा बताते हैं कि इस किस्म का प्रयोग केंसर की दवा के लिए किया जाता है। पहले इसकी खेती सिर्फ मले​शिया, चीन, जापान जैसे देशों में होती थी। 

राजस्थान में चुनौतियां

  • कृ​षि श्रेणी में नहीं, उत्पादन खर्च ज्यादा
  • सरकार की ओर से स​ब्सिडी नहीं मिल रही
  • लोकल मार्केट पर्याप्त नहीं
  • प्र​शिक्षण केंद्र बढ़ाने की आवश्यकता

सैंकड़ों युवाओं को मशरूम उगाना सिखाया

राजस्थान आज देश के टॉप टेन मशरूम उत्पादक राज्यों में शामिल है। पिछले करीब एक दशक में आई इस मशरूम क्रांति में मोटाराम शर्मा जैसे नवाचार धर्मी किसानों का योगदान कम नहीं कहा जा सकता। वे संभवत: राजस्थान के एक मात्र प्र​शिक्षक हैं, जो युवाओं को मशरूम उत्पादन की उन्नत तकनीकों का प्र​शिक्षण देते हैं। वे बताते हैं कि कम स्थान में खेती, बाजार में अच्छी डिमांड और मुनाफे के कारण प्रदेश के युवाओं में मशरूम की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है। इस उत्पाद की मेडिसिनल वैल्यू बहुत ज्यादा है। दवा उद्योगों की डिमांड के अनुरूप किस्मों की भी प्रदेश में पैदावार हो रही है। हालांकि प्रदेश में मशरूम की खेती को कृ​षि श्रेणी का दर्जा नहीं होने से बिजली कनेक्शन सहित अन्य प्रकार की छूट नहीं मिल पाती है। वहीं प्रदेश में इसका बीज भी पर्याप्त मात्रा में नहीं बन रहा।

राजस्थान में यूं बढ़ा मशरूम उत्पादन का क्रेज

राजस्थान में मशरूम उत्पादन की कहानी भी दिलचस्प है। प्रदेश 2017-18 में 1.30 हजार मीट्रिक टन के साथ देश में 13वें पायदान पर था। वही 2023-24 में 20.69 मीट्रिक टन (15.9 गुना) उत्पादन के साथ देश में नवें पायदान पर आ खड़ा हुआ। प्रदेश के प्रमुख कृ​षि उत्पादक जिलों में सीकर, झुंझुनूं, चूरू, जयपुर, दौसा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, नागौर, पाली, जालौर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर आदि शामिल हैं। मशरूम की खेती करने वालाें में नवाचार धर्मी युवा किसानों की तादाद ज्यादा है।

रेस्तरां के मेन्यू में मिस नहीं होता मशरूम

प्रदेश में प्रमुख रूप से बटन, ऑयस्टर, मिल्की, पेडी स्ट्रॉ आदि किस्मों की मशरूम की पैदावार की जा रही है। इनमें मिल्की मशरूम राजस्थान की गर्म जलवायु के लिए अनुकूल है। इसे लगभग 28 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में उगाया जा सकता है, जबकि बटन मशरूम के लिए लगभग 16 से 18 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान की जरूरत होती है। किसान नियंत्रित तापमान वाले कमरे तैयार कर इनका उत्पादन कर रहे हैं। प्रदेश के प्रमुख पर्यटक शहरों जयपुर, जोधपुर, उदयपुर के प्रमुख रेस्तरां के मेन्यू बगैर मशरूम के अधूरे माने जाते हैं। हालांकि प्रदेश में तापमान नियंत्रण, तकनीकी ज्ञान, मार्केटिंग आदि उत्पादकों के समक्ष मुख्य चुनौतियां है।

खेत नहीं, कमरों में पैदावार

मशरूम की असली ताकत खेत की पैदावार में नहीं, बल्कि कमरे की उत्पादकता से है। जहां कुछ दर्जन वर्गमीटर जगह से भी किसान साल में कई उत्पादन चक्र ले सकता है। इसीलिए मशरूम को छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन युवाओं तथा महिलाओं के लिए वैकल्पिक उद्यम के रूप में देखा जाता है। मौसम की मार से फसल खराबे की संभावना भी इसमें न के बराबर होती है। मशरूम की सामान्य किस्मों की उत्पादन लागत करीब 70 से 120 रुपए प्रतिकिलोग्राम होती है। जो थोक बाजार में 200 और रिटेल में 300 रुपए प्रति किलो तक बिक जाती है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

ऑल इंडिया कोर्डिनेटर रिसर्च ऑन मशरूम के प्रोजेक्ट इंचार्ज प्रो. एनएल मीणा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'मशरूम में एल्जाइमर से लेकर केंसर तक कई रोगों से बचाव के गुण है। इसे एंटी एजिंग भी माना जाता है। साथ ही इसमें विटामिन एवं के​ल्सिशयम की प्रचूर मात्रा पाई जाती है। इन्हीं गुणों के कारण दवा के रूप में इसकी विशेष मांग है। राजस्थान में सरकार इसकी खेती को इंडस्ट्री मानती है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। द​क्षिण भारत में इसकी खेती पर स​ब्सिडी भी देती है। यह प्रावधान राजस्थान में भी होनी चाहिए। हमने टीएडी को एक प्रोजेक्ट भी भेजा है, ताकि वनवासी क्षेत्र में खेती से आदिवासियों की आ​र्थिक स्थिति में सुधार हो सके।'

Updated on:
26 Sept 2026 05:15 pm
Published on:
26 Sept 2026 05:09 pm