
Mushroom King : ज्यादातर मारवाड़ी परिवारों की तरह राजस्थान के शेखवाटी अंचल का वह युवा कम उम्र में ही रोजगार के लिए आसाम चला गया। वह वहां परिवार के ट्रेडिंग संबंधी कारोबार में लग गया। लेकिन इसी दौरान उसके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया। आज वह शख्स देश के गिने चुने मशरूम विशेषज्ञों में से एक है। यही नहीं उन्हें " मशरूम किंग " के नाम से जाना जाता है। आइए इस शख्सियत के बारे में विस्तार से जानते हैं।
हम बात कर रहे हैं, सीकर जिले के विजयपुरा गांव निवासी डॉ. मोटाराम शर्मा की। मोटाराम के " मशरूम किंग " बनने की यह कहानी तब शुरू हुई, जब वे करीब 35 की उम्र के रहे होंगे। वे आसाम में अपने पारिवारिक कारोबार में संलग्न थे, तभी उन्हें अल्सर की बीमारी हो गई। इसके उपचार के लिए वे आसाम में ही एक प्राकृतिक चिकित्सक से उपचार कराने गए।
चिकित्सक ने उन्हें दवा के रूप में मशरूम का सेवन करने की सलाह दी। इसके उपयोग से उनका अल्सर का रोग तो ठीक हो ही गया। लेकिन साथ ही उन पर एक अलग ही धुन सवार हो गई। वो थी राजस्थान में मशरूम उगाने की। फिर क्या था कि मोटाराम आसाम से अपने गांव विजयपुरा (सीकर) लौट आए और यहां मशरूम उगाने का काम काम शुरू कर दिया। इस कार्य की शुरुआत में उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन धीरे-धीरे एक समय ऐसा आया, जब उनकी पहचान राजस्थान ही नहीं देश के प्रमुख मशरूम विशेषज्ञ के रूप में होने लगी।
मशरूम उत्पादन में नवाचार के लिए मोटाराम को कई पुरस्कार प्राप्त हुए, लेकिन इनमें वर्ष 2019 हरियाणा के मरूथला में आयोजित नेशनल सिम्पोजियम ऑन ट्रेंड्स एंड इनोवेशन्स इन मशरूम प्रोडक्शन टेक्नोलोजीज, डायवर्सिफिकेशन, प्रोसेसिंग एंड कन्जप्शन एक ऐसा आयोजन था, जिसमें उन्हें "मशरूम किंग" कहकर संबोधित किया गया। आज डॉ. मोटाराम मशरूम सोसायटी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं।
मोटाराम शर्मा को देश में पहली बार मशरूम की गेनोडर्मा किस्म की खेती शुरू करने का श्रेय है। इसके लिए वर्ष 2010 में उन्हें सम्मानित किया गया। शर्मा बताते हैं कि इस किस्म का प्रयोग केंसर की दवा के लिए किया जाता है। पहले इसकी खेती सिर्फ मलेशिया, चीन, जापान जैसे देशों में होती थी।
राजस्थान आज देश के टॉप टेन मशरूम उत्पादक राज्यों में शामिल है। पिछले करीब एक दशक में आई इस मशरूम क्रांति में मोटाराम शर्मा जैसे नवाचार धर्मी किसानों का योगदान कम नहीं कहा जा सकता। वे संभवत: राजस्थान के एक मात्र प्रशिक्षक हैं, जो युवाओं को मशरूम उत्पादन की उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण देते हैं। वे बताते हैं कि कम स्थान में खेती, बाजार में अच्छी डिमांड और मुनाफे के कारण प्रदेश के युवाओं में मशरूम की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है। इस उत्पाद की मेडिसिनल वैल्यू बहुत ज्यादा है। दवा उद्योगों की डिमांड के अनुरूप किस्मों की भी प्रदेश में पैदावार हो रही है। हालांकि प्रदेश में मशरूम की खेती को कृषि श्रेणी का दर्जा नहीं होने से बिजली कनेक्शन सहित अन्य प्रकार की छूट नहीं मिल पाती है। वहीं प्रदेश में इसका बीज भी पर्याप्त मात्रा में नहीं बन रहा।
राजस्थान में मशरूम उत्पादन की कहानी भी दिलचस्प है। प्रदेश 2017-18 में 1.30 हजार मीट्रिक टन के साथ देश में 13वें पायदान पर था। वही 2023-24 में 20.69 मीट्रिक टन (15.9 गुना) उत्पादन के साथ देश में नवें पायदान पर आ खड़ा हुआ। प्रदेश के प्रमुख कृषि उत्पादक जिलों में सीकर, झुंझुनूं, चूरू, जयपुर, दौसा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, नागौर, पाली, जालौर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर आदि शामिल हैं। मशरूम की खेती करने वालाें में नवाचार धर्मी युवा किसानों की तादाद ज्यादा है।
प्रदेश में प्रमुख रूप से बटन, ऑयस्टर, मिल्की, पेडी स्ट्रॉ आदि किस्मों की मशरूम की पैदावार की जा रही है। इनमें मिल्की मशरूम राजस्थान की गर्म जलवायु के लिए अनुकूल है। इसे लगभग 28 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में उगाया जा सकता है, जबकि बटन मशरूम के लिए लगभग 16 से 18 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान की जरूरत होती है। किसान नियंत्रित तापमान वाले कमरे तैयार कर इनका उत्पादन कर रहे हैं। प्रदेश के प्रमुख पर्यटक शहरों जयपुर, जोधपुर, उदयपुर के प्रमुख रेस्तरां के मेन्यू बगैर मशरूम के अधूरे माने जाते हैं। हालांकि प्रदेश में तापमान नियंत्रण, तकनीकी ज्ञान, मार्केटिंग आदि उत्पादकों के समक्ष मुख्य चुनौतियां है।
मशरूम की असली ताकत खेत की पैदावार में नहीं, बल्कि कमरे की उत्पादकता से है। जहां कुछ दर्जन वर्गमीटर जगह से भी किसान साल में कई उत्पादन चक्र ले सकता है। इसीलिए मशरूम को छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन युवाओं तथा महिलाओं के लिए वैकल्पिक उद्यम के रूप में देखा जाता है। मौसम की मार से फसल खराबे की संभावना भी इसमें न के बराबर होती है। मशरूम की सामान्य किस्मों की उत्पादन लागत करीब 70 से 120 रुपए प्रतिकिलोग्राम होती है। जो थोक बाजार में 200 और रिटेल में 300 रुपए प्रति किलो तक बिक जाती है।
ऑल इंडिया कोर्डिनेटर रिसर्च ऑन मशरूम के प्रोजेक्ट इंचार्ज प्रो. एनएल मीणा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'मशरूम में एल्जाइमर से लेकर केंसर तक कई रोगों से बचाव के गुण है। इसे एंटी एजिंग भी माना जाता है। साथ ही इसमें विटामिन एवं केल्सिशयम की प्रचूर मात्रा पाई जाती है। इन्हीं गुणों के कारण दवा के रूप में इसकी विशेष मांग है। राजस्थान में सरकार इसकी खेती को इंडस्ट्री मानती है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। दक्षिण भारत में इसकी खेती पर सब्सिडी भी देती है। यह प्रावधान राजस्थान में भी होनी चाहिए। हमने टीएडी को एक प्रोजेक्ट भी भेजा है, ताकि वनवासी क्षेत्र में खेती से आदिवासियों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।'