Dr. Karan Singh : 40 वर्षों तक लोकसभा और राज्यसभा सांसद और इंदिरा गांधी सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके डॉ. कर्ण सिंह अपनी बायोग्राफी (A Statesman and a Seeker: The Extra Ordinary Life and Legacy of Dr. karan Singh) की लॉन्चिंग के लिए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल्स में भाग लेने आए थे। उन्होंने पत्रिका से महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से लेकर भारत की वर्तमान राजनीति के बारे में बातचीत की। यहां पढ़िए पूरा इंटरव्यू।
Dr. Karan Singh Interview : जी। मैं पढ़ाई में अच्छा था और मैंने एमए और पीएचडी के लिए बहुत मेहनत की। राजनीति में मैं बचपन में ही आ गया था। मैं जब 18 वर्ष का था तो पिताजी ( जम्मू कश्मीर के तत्कालीन राजा) ने मुझे रीजेंट बनाया। मुझे यह पद किसी चुनाव के माध्यम से नहीं मिला था लेकिन राज्य का कामकाज देखना भी राजनीति ही थी। मैं लोकनीति के लिए काम कर रहा था। उस समय शेख अब्दुल्ला का जम्मू-कश्मीर पर बहुत प्रभाव था। उस माहौल में राज्य का काम देखना भी तो राजनीति ही थी। मैं 18 वर्ष तक राज्य का प्रमुख रहा। पहले रीजेंट बना, फिर सदर-ए-रियासत। इसके बाद मैं इंदिरा गांधी की कैबिनेट में शामिल हुआ। मैं 40 वर्ष लोकसभा सांसद और राज्यसभा सांसद रहा। इंदिरा जी की सरकार में सबसे कम उम्र का सांसद था।
मैं 16 वर्ष की उम्र में भारी मुश्किल में पड़ गया। मैं व्हीलचेयर पर सारा दिन बैठा रहता था। मेरे कूल्हे में कोई समस्या उत्पन्न हो गई थी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कूल्हे पर प्लास्टर चढ़ाकर मेरी समस्या ठीक करने की कोशिश की गई। छह महीने तक हाल जस की तस बनी हुई थी। मैं अपने पिता की चार बीवियों का इकलौता वारिश था। पहली तीन बीवियों से कोई बच्चा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने हिमाचल के कांगड़ा के एक गांव की औरत से शादी की। उनसे मैं पैदा हुआ। जाहिर सी बात है कि मेरी हालत देखकर वह बहुत परेशान रहते थे। उन्हीं दिनों जम्मू-कश्मीर रियासत का भारत में विलय करवाने के लिए सरदार बल्लभ पटेल मेरे पिता से मिलने मेरे घर आए थे। उन्होंने पिताजी से मेरे बारा में जानने के बाद कहा कि इसको अमेरिका भेजिए। मैं 11 महीने अपने इलाज के लिए अमेरिका में रहा। देवी मां की कृपा से मैं ठीक हो गया। जाहिर सी बात है कि बल्लभ भाई पटेल की नेक सलाह ने मुझपर गहरा प्रभाव डाला।
मैं रीजेंट पिताजी द्वारा बनाया गया था। अब भारत आजाद में जम्मू और कश्मीर का नया संविधान बना तो उसमें यह व्यवस्था बनाई कि राज परिवार के लोगों को सदर ए रियासत नहीं बनाया जाएगा। सदर ए रियासत के लिए चुनाव होगा। चुनाव हुआ था और मैं जीतकर जम्मू व कश्मीर का सदर ए रियासत बनाया गया था।
खैर, संपर्क में तो क्या ही आए। मैंने उनके दर्शन किए। वर्ष 1947 में मई-जून का महीना रहा होगा तब गांधी जी कश्मीर आए और मेरे पिता हरि सिंह से मिलने हमारे घर आए। गांधीजी आमतौर पर किसी के घर नहीं जाते थे, पर वे आए थे। मैं उस समय व्हीलचेयर पर था, लेकिन मैंने गांधीजी को देखने की इच्छा जताई। इसके बाद मुझे व्हीलचेयर पर ही बिठाकर ले जाया गया। हमारे घर में जिस पेड़ के नीचे वे बैठे थे, वह वृक्ष आज भी वहां लगा हुआ है। वहां आज भी प्लेट पर लिखा हुआ है कि गांधी जी, महाराजा हरि सिंह, महारानी तारा देवी और युवराज कर्ण सिंह की मुलाकात इसी पेड़ के नीचे हुई थी।
देखिए, गांधी जी तो देश के नेता थे। वह राष्ट्रीय आंदोलन के नेता थे। मैं भी नौजवान था। हम उन्हें मिलने से पहले और मुलाकात के बाद भी श्रद्धा और आदर के भाव से देखते थे। गांधी जी की अगले ही साल हत्या हो गई। असल में राजनीति में हमारे गुरु जवाहर लाल नेहरू थे। उनका मुझपर बहुत स्नेह रहा। वह मुझे बहुत हौसला देते रहे। मैं नेहरू जी के निर्देशन में वर्ष 1949 से लेकर 1964 तक नए भारत के निर्माण में योगदान देता रहा।
मैंने उनकी लिखी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया पढ़ी तो मैं उनका दीवाना हो गया। उनकी पर्सनैलिटी बहुत डायनैमिक थी। वह बहुत ऊर्जावान व्यक्तित्व के धनी थे। उनका ख्याल मन में आते ही या उनके सामने आते ही लगता है कि मैं भी ऊर्जा से भर गया हूं। नेहरू जी ने मुझे चीजों को कैसे समझा जाए। इसके बारे में उन्होंने बताया कि किसी भी चीज को देखना हो तो उसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखो। किसी भी घटना को अकेला करके मत देखो, उसके अतीत में जाकर देखो। वह मुझे कई बार ब्रेकफास्ट में बुलाते थे और चीजों को लेकर काफी चर्चा, बहस करते थे। नेहरू जी के साथ ब्रेकफास्ट में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी भी बैठते थे। मैं देश के वर्तमान प्रधानमंत्री के साथ भविष्य के दो प्रधानमंत्रियों के साथ ब्रेकफास्ट करता था। इंदिरा जी के तो मंत्रीमंडल में ही रहा।
मेरी पीएचडी जब किताब के रूप में आनी थी, तब मैंने उनसे कहा कि आप इसका फॉरवर्ड लिख दीजिए। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी किताब की सामग्री दे दो। अगली बार जब उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने थीसिस के साथ मेरी किताब की प्रस्तावना भी लिखकर दी। नेहरू जी ने किताब की प्रस्तावना में लिखा- 'युवराज होने के बावजूद कर्ण सिंह ने राजशाही वाली चीजों शिकार, पोलो, हाई सोसायटी जैसी बातों से खुद को अलग रखकर विचारणीय प्रश्नों के जवाब ढूंढ़ने में दिल लगया।
नहीं। मैंने 1966 में इंदिरा गांधी से कहा था कि मुझे दिल्ली बुला लीजिए, तब मैं जम्मू कश्मीर का गवर्नर था। मैं 36 साल तक जम्मू कश्मीर में ही रहा। उसमें से 18 वर्ष तक जम्मू कश्मीर राज्य का प्रमुख ही रहा। मैंने उनसे कहा कि नए भारत के निर्माण में मैं भी योगदान देना चाहता हूं। गवर्नर रहकर आप कुछ खास नहीं कर सकते क्योंकि वह एक सेरिमोनियल पोस्ट है। फिर उन्होंने मुझे 1967 में दिल्ली बुलाया और अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया।
मैं उधमपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और पहले दो चुनाव तो आसानी से जीता। लेकिन तीसरा चुनाव मेरे लिए बहुत कठिन रहा। इंदिरा गांधी के आपातकाल की घोषणा के बाद देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन गया था। कांग्रेस के 150 उम्मीदवार हार गए थे। कांग्रेस के सारे मंत्री हार गए, लेकिन मैं जीत गया था। 1977 में जनता पार्टी की लहर में राजस्थान की नागौर लोकसभा सीट से नाथूराम मिर्धा और बिहार से एक कोई उम्मीदवार जीता था। जनता पार्टी ने 298 सीटें जीतीं और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने।
लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद मोरारजी भाई की जिद पर कांग्रेस के नेता पद के लिए पार्टी ने अंदरूनी चुनाव करवाया। मोरारजी ने चुनाव करवाया। यह उनका हक था। हालांकि तब इंदिरा गांधी के नाम पर ज्यादातर लोग सहमत थे। यह चुनाव परिणाम आने के बाद साफ हो गई। मोरारजी भारी मतों से हार गए। इसके बावजूद इंदिरा गांधी ने मोरारजी से मतभेद को परे रखकर बहुत इज्जत दी और 1966 में उन्हें डिप्टी पीएम भी बनाया। 1969 तक आते—आते दोनों के बीच मतभेद गहराते चले गए और दक्षिणपंथी विचार वाले मोरारजी और रामसेवक सिंह कांग्रेस छोड़कर चले गए। 1977 में जनता लहर में कांग्रेस बुरी तरह से चुनाव हार गई और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बन भी गए।
नेहरू जी की बेटी थीं, जितनी पार्टी होती थी सब वहीं अरैंज करती थी। यह सब इंदिरा गांधी के खिलाफ एक किस्म का दुष्प्रचार है। उनके बारे में यह भी कहा जाता था कि वह किसी को बोलने नहीं देती थीं। यह बिल्कुल गलत बात है। यह उनके स्वभाव के विपरीत बात थी। सभी को खूब बोलने का मौका देती थीं। कई बार जरूरत से ज्यादा बोलने देती थीं। कई बार लोकसभा सत्र के दौरान मेरी सीट उनके अपोजिट रहती। कई बार मुझे कहना पड़ता था कि अगले आइटम पर चलिए। मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि इंदिरा जी सख्त मिजाज की हैं। वह पूरी तरह डेमोक्रेटिक इंसान थीं।
मैं उड्डयन मंत्री था। वह हमारे पायलट थे। वह बहुत ही अच्छे व्यक्ति थे। यह देश का दुर्भाग्य था कि उनकी हत्या कर दी गई। वह भी नेहरू जी और इंदिरा जी की तरह तीन टर्म प्रधानमंत्री बन जाते। देश को आगे ले जाने में उसकी सोच भी बहुत अच्छी थी। मुझे अपने मंत्रीमंडल में नहीं रखा, इसके पीछे कोई खास बात नहीं थी। हर प्रधानमंत्री अपनी टीम बनाता है। नरेंद्र मोदी ने भी अपनी नई टीम बनाई। सभी अपनी टीम बनाते हैं।
राजनीति हमेशा ऐसी ही रहेगी। उसके स्वभाव में ही विचलन है। आज आप लोकसभा की बहस देखें। बहस का स्तर बहुत गिरता जा रहा है। राजनीति में शिष्टाचार की कमी आ रही है। वहां जिस भाषा में लोग अपनी बात रख रहे हैं। एक तरह से लोग एक-दूसरे को गालियां ही दे रहे हैं। मैंने अपने राज्यसभा के अंतिम भाषण में कहा था कि लोग मुद्दों पर अपनी बात रखें। कोई किसी को कटुवचन ना बोले। मैंने और बातों के अलावा यह भी कहा था- 'घट घट में वो सांई बसत है कटु बचन मत बोल…' कुछ भी हो जाए किसी को कटुवचन नहीं कहना चाहिए। आज की राजनीति में कटुता बहुत ज्यादा महसूस की जा रही है।