
MP News on National Youth Day 2026: देश का भविष्य युवाओं को कहा जाता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति युवाओं की सोच और उनकी कार्यक्षमता पर निर्भर करती है। स्वामी विवेकानंद युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत रहे हैं। उनका मानना था कि युवा शक्ति ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। आज स्वामीजी की जन्म जयंती पर हम मध्यप्रदेश के कुछ ऐसे युवाओं की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने अपने एक विचार से अपना जीवन बदला और दूसरों को भी नई दिशा दी…
शिवपुरी. 13 साल की दक्षता ने हाल ही में शिवपुरी में हुई नेशनल स्कूल अंडर-19 बालिका क्रिकेट प्रतियोगिता में न केवल मध्यप्रदेश टीम की कप्तानी की, बल्कि सभी छह मैचों में शानदार प्रदर्शन कर प्लेयर ऑफ द सीरीज का खिताब भी अपने नाम किया। दक्षता देश की महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा बनकर शिवपुरी का नाम रोशन करना चाहती हैं।
खास यह है कि दक्षता के कोच कोई और नहीं, बल्कि उनके पिता कपिल यादव हैं। कपिल खुद अच्छे क्रिकेटर रहे हैं। दक्षता ने महज 13 साल की उम्र में अंडर 19 प्रतियोगिता में शामिल होकर शानदार प्रदर्शन किया। छह मैचों में दो बार अर्धशतक और 10 विकेट लेने की उपलब्धि हासिल की थी। दक्षता ने कुछ महीने पहले इंदौर में मध्यप्रदेश से अंडर-15 आयु वर्ग में कैंप भी किया था। उनका कहना है कि वह अपने पिता के बताए रास्तों पर चल क्रिकेट में कुछ बड़ा करना चाहती हैं।
वे पिछले चार साल से क्रिकेट की बारीकियां अपने पिता कपिल यादव से सीख रही हैं। कपिल वर्ष 2010-11 में दिल्ली में आयोजित वीनू मांकड प्रतियोगिता में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे विराट कोहली के साथ खेले हैं। इसलिए पिता के अनुभव का लाभ उनकी बेटी को मिल रहा है।
दक्षता (MP News on National Youth Day 2026) हर रोज अभ्यास के लिए स्टेडियम में 4 से 5 घंटे का समय देती हैं। यह सिलसिला आज से नहीं, बल्कि कई वर्ष से लगातार चल रहा है। दक्षता बल्लेबाजी के साथ बेहतरीन बॉलर भी हैं। वह टीम में ऑलराउंडर की भूमिका में रहती हैं। दक्षता की सफल कप्तानी में पहली बार नेशनल बालिका प्रतियोगिता में एमपी की टीम को सिल्वर मेडल मिला है।
रतलाम. इलेक्ट्रॉनिक्स और रिसर्च के क्षेत्र में प्रतिभा का लोहा मनवाने रतलाम के युवा ने छात्रों व स्टार्टअप के लिए सीएनसी (कम्प्यूटर न्यूमेरिकल कंट्रोल) मशीन वी केयर बनाई है। विजय सोनी ने इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग उज्जैन से की। इसके बाद इंदौर में नौकरी की। विभिन्न प्रतिष्ठित कंपनियों में रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंजीनियर के रूप में काम किया। कई संस्थानों को तकनीकी कंसल्टेंट के रूप में सेवाएं दीं।
इस दौरान विजय (MP News on National Youth Day 2026) ने महसूस किया कि देश में छात्रों और शुरुआती स्टार्टअप्स के सामने समस्या पीसीबी (प्रिंटेड सर्किट बोर्ड) और हार्डवेयर प्रोटोटाइपिंग तक त्वरित, किफायती और आत्मनिर्भर पहुंच का अभाव है। ऐसे में उन्होंने कंसल्टेंट की नौकरी छोड़ वर्ष 2019 से नवाचार में लग गए। कई प्रयास और तीन साल की मेहनत के बाद उन्होंने 2021 में डेस्कटॉप सीएनसी मशीन तैयार की। पहली मांग हिमाचल प्रदेश से आई। उमीद जागी तो 2025 में मेकर माइंड लैब प्रा. लि. नाम से स्टार्टअप शुरू किया।
-10 दिन लग जाते थे जब सर्किट बोर्ड की जरूरत होती थी। इससे समय खराब होता था।
-2019 से से नवाचार में लग गए थे रतलाम के विजय सोनी। इसके बाद सफलता वर्ष 2021 में मिली।
-मशीनें देश के आइटी संस्थानों को भेजीं। इसके अच्छे रिजल्ट मिले।
विजय कहते हैं 'हमने 10 मशीन देश के विभिन्न आइटी संस्थानों को भेजीं। यहां से वर्कशॉप प्राप्त सात युवाओं को बड़े पैकेज पर कंपनियों ने हायर किया। सीएनसी मशीन केवल पीसीबी तक सीमित नहीं है। इसके जरिए एक्रेलिक, लकड़ी और प्लास्टिक की कटिंग व कार्विंग, एल्यूमिनियम पर एंग्रेविंग जैसे काम भी संभव हैं।
उज्जैन. फसल कटाई के बाद किसानों के लिए खेत में परेशानी लगने वाली पराली से 26 वर्षीय उद्यमी शुभम एस. सूर्या (MP News on National Youth Day 2026) ने स्ट्रॉ बनाने का उद्योग स्ट्रॉ फाउंडेशन स्टार्टअप के तहत शुरू किया है। इसे तुर्किये में भी निर्यात किया जा रहा है। हालांकि तुर्किये में मांग कुछ कम होने पर यूरोपियन शहरों में सह्रश्वलाई की डील चल रही है। शुभम के अनुसार औसत 25 लाख रुपए वार्षिक व्यवसाय हो रहा है।
वे बताते हैं कि पॉलिथीन से समझौता नहीं करने की सोच ने उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ाया। कुछ वर्ष पहले चीन दौरे में पराली के उपयोग की जानकारी मिली थी। इसके बाद एमपी में पराली से स्ट्रॉ बनाने की पहली यूनिट लगाई।
शुभम एक वर्ष में करीब 5 टन पराली से स्ट्रॉ निर्माण कर रहे हैं। 80 पैसे प्रति स्ट्रॉ की दर पर बाजार में सप्लाई करते हैं। हालांकि यह कीमत कागज की स्ट्रॉ से करीब 20 पैसे ज्यादा है, लेकिन इससे पर्यावरण सुरक्षा और रीयूज का बड़ा फायदा है। उपयोग के बाद इस स्ट्रॉ का नहीं गलना ही इसकी यूएसपी है। उपयोग के बाद पशुओं के भोजन भूसे के रूप में उपयोग किया जाता है। खेत से पराली 5-7 रु./किलो पर मिलती है। उपयोग हो चुकी स्ट्रॉ को भूसे के रूप में 8 रु./किलो बेचा जा सकता है।
इंदौर. कभी छतों तक सीमित रही सोलर ऊर्जा अब कैमरों, लाइटिंग और सुरक्षा सिस्टम तक पहुंच रही है। अक्षय ऊर्जा को आम जीवन का हिस्सा बनाने की इस कोशिश में इंदौर की उद्यमी इला बंसल (MP News on National Youth Day 2026) ने सोलर तकनीक को आसान, किफायती और व्यावहारिक रूप दे दिया है। उनके स्टार्टअप यूवीआइ टेक्नोलॉजी के सोलर प्रोडक्ट्स अब सिर्फ इंदौर या भारत ही नहीं, बल्कि मल्टीनेशनल कंपनियों तक पहुंच रहे हैं।
इला बंसल पहले लाइटिंग इंडस्ट्री से जुड़ी थीं और स्ट्रीट लाइट व लैंप निर्माण का काम करती थीं। कोरोना काल ने इस सेक्टर को लगभग ठप कर दिया। मांग खत्म हो गई, स्टॉक रुका और पूंजी फंस गई। लंबे समय तक बाजार में सुधार नहीं दिखा। इसी संकट ने उन्हें नया रास्ता खोजने के लिए प्रेरित किया।
इला ने तकनीकी अनुभव के आधार पर सोलर आधारित प्रोडक्ट्स पर काम शुरू किया। जब बाजार बड़े सोलर प्लांट्स पर केंद्रित था, तब उन्होंने छोटे सोलर पैनल और सोलर एनर्जी से चलने वाले उत्पाद डिजाइन किए। इसी सोच से यूवीआइ टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई। उनके प्रमुख उत्पादों में बिना वायरिंग के चलने वाले सोलर सीसीटीवी कैमरे और ऐसे सोलर पैनल शामिल हैं, जिन्हें एसी या केबल कनेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती। शुरुआत के दो साल संघर्ष भरे रहे। 2023 के बाद सोलर सेक्टर में तेजी आई तो उत्पादों की मांग बढऩे लगी।
अनूपपुर. गोंडी कलाकृतियों का निर्माण कर पुष्पराजगढ़ बेलॉक के ग्रामबीजापुरी क्रमांक 1 के युवा दुर्गेश सिंह मरावी ने अपनी पहचान बनाई है। 25 वर्षीय दुर्गेश के अनुसार गांव के कलाकारों को देख कलाकृतियां बनाने की प्रेरणा मिली। वर्धा में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह काम करने लगे। धीरे-धीरे हुनर निखरता गया।
दुर्गेश आइटीआइ तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद 20 वर्ष की उम्र से 2020 से यह कलाकृतियां बना रहे हैं। अभी तक 500 से ज्यादा कलाकृतियों का निर्माण कर चुके हैं। इन्हें बेचने के लिए मध्यप्रदेश में भोपाल, खजुराहो के अलावा दिल्ली, हरियाणा में लगाई जाने वाली प्रदर्शनी में शामिल हुए।
दुर्गेश ने बताया कि वह मुखेय रूप से गोंडी और ट्राइबल आर्ट से संबंधित मूर्ति, मुखौटा, नक्काशी, दीवारों पर आदिवासी संस्कृति और संबंधित कहानियों को उकेरते हैं। इससे उन्हें हर महीने 15 हजार रुपए तक की राशि प्राप्त हो जाती है।
झाबुआ. संकल्प मजबूत हो और सही मार्गदर्शन मिले, तो परंपरा भी प्रगति का रास्ता बन सकती है। जिले की युवा भारती चौहान आज विलुप्त होती जनजातीय 'पिथौरा' लोक कला को न केवल संजो रही हैं, बल्कि उसे अपनी पहचान और आजीविका का मजबूत आधार भी बना चुकी हैं।
आजीविका मिशन के तहत 'बैंक मित्र' के रूप में कार्यरत भारती का कला के प्रति रुझान उन्हें एक अलग राह पर ले आया। पिथौरा पेंटिंग की बारीकियां सीखने के बाद उन्होंने कला को कैनवास और कागज पर उतारना शुरू किया। उनकी बनाई एक-एक पेंटिंग बाजार में 3 हजार से 4 हजार रुपए तक में बिक रही है। इससे आमदनी के नए स्रोत खुले हैं।
भारती झाबुआ की सैकड़ों युवतियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। पिथौरा कला झाबुआ और आसपास के जनजातीय क्षेत्रों की प्राचीन दीवार चित्रकला है। घोड़ों, मवेशियों, देवी-देवताओं और प्रकृति का प्रतीकात्मक चित्रण किया जाता है। समय के साथ कला विलुप्त होती जा रही थी। अब भारती इसे आधुनिक स्वरूप देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा रही हैं।
सतना. जिले के छोटे से कस्बे बिरसिंहपुर निवासी प्रिया अग्रवाल (29) (MP News on National Youth Day 2026) ने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई की। लगन और आत्मविश्वास से मुकाम हासिल किया है। नारियल और प्रसाद की छोटी-सी दुकान से परिवार का खर्च चलाने वाले विजय अग्रवाल की बेटी प्रिया 8 नवंबर 2025 को महिला वर्ग में फस्र्ट रैंक के साथ डिप्टी कलेक्टर बनी हैं। कुछ माह बाद ट्रेनिंग होने वाली है।
पत्रिका को प्रिया ने बताया कि बचपन संघर्षों से भरा रहा। हालात ऐसे थे कि पढ़ाई के लिए दीया और चिमनी का सहारा लेना पड़ता था। पिता ने बेटी के सपनों को कभी बुझने नहीं दिया। प्रिया ने पहले ही प्रयास में श्रम अधिकारी की परीक्षा पास की। लक्ष्य और ऊंचा रख प्रशासनिक सेवा की तैयारी जारी रखी। अंतत: डिप्टी कलेक्टर बन परिवार का नाम रोशन किया।
अशोकनगर. कहानी एक ऐसी जिद्दी लड़की की है, जिसने अपनी नाकामियों को सीढ़ी बनाया। आज सफलता के उस शिखर पर हैं, जहां लोग उन्हें सलाम करते हैं। सुरभि नामदेव महज 10 साल की उम्र में एक खेल प्रतियोगिता में आखिरी स्थान पर आई थीं। उस हार ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि तराश दिया। जब सहेलियां त्योहारों और छुट्टियों का आनंद लेती थीं, तब सुरभि मैदान पर पसीना बहाती थीं। त्याग रंग लाया। 2012 में नेशनल गोल्ड मेडल जीता।
भावुक कर देने वाली घड़ी तब आई जब 2014 में एक प्रतियोगिता के दौरान उनका हाथ फ्रैक्चर हो गया। उस स्थिति में भी गोल्ड जीता, बल्कि उसी टूटे हाथ के साथ 10वीं की परीक्षा शानदार अंकों से पास की। घर की जिम्मेदारी के बीच सुरभि ने घर पर एमपीपीएससी की तैयारी की। अब वे खेल अधिकारी हैं।
ये सक्सेस स्टोरीज (MP News on National Youth Day 2026) कहती हैं गर हिम्मत है...तो कुछ कर गुजर... मिसाल बन जाओ और हर जरूरतमंद के लिए प्रेरणा की ऐसी दासतान जो उन्हें भी अपनी सफलता की कहानी लिखने को मजबूर कर दे। स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती पर एमपी के युवाओं की जिंदगी बदलने वाली ये कहानियां आपको कैसी लगीं... कमेंट करके हमें जरूर बताएं।