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विरोध हुआ लेकिन रास्ता नहीं बदला, डॉक्टर बनकर समाज के लिए बनी मिसाल, जानें पूरी कहानी…

Motivational Story: रायपुर जिले के नवापारा की पहली लेडी डॉक्टर 81 वर्षीय डॉ. एम. कौर समर्पण, संघर्ष और संवेदनशीलता की मिसाल हैं।
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Updated: 22 Feb 2026, 12:49 PM IST
विरोध हुआ लेकिन रास्ता नहीं बदला, डॉक्टर बनकर समाज के लिए बनी मिसाल, जानें पूरी कहानी...(photo-patrika)
विरोध हुआ लेकिन रास्ता नहीं बदला, डॉक्टर बनकर समाज के लिए बनी मिसाल, जानें पूरी कहानी...(photo-patrika)

Motivational Story: ताबीर हुसैन. छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के नवापारा की पहली लेडी डॉक्टर 81 वर्षीय डॉ. एम. कौर समर्पण, संघर्ष और संवेदनशीलता की मिसाल हैं। ऐसे दौर में जब ग्रामीण क्षेत्रों में न तकनीक थी न संसाधन; उन्होंने केवल अनुभव, निरीक्षण और सेवाभाव से हजारों महिलाओं और नवजातों को सुरक्षित जीवन दिया।

सीमित पारिवारिक समर्थन, सामाजिक संकोच और भाषा-संस्कृति की बाधाओं को पार कर उन्होंने महिला स्वास्थ्य सेवा का मजबूत आधार खड़ा किया। वे पिछले 56 वर्षों से निरंतर चिकित्सकीय सेवा दे रही हैं।

Sunday Guest Editor: एक ही स्थान पर 50 साल का समर्पण

आज भी डॉ. कौर मानती हैं कि चिकित्सा का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा नहीं, सेवा है। पांच दशक से अधिक समय तक एक ही स्थान पर लगातार अभ्यास करते हुए उन्होंने दिखाया कि समर्पण, धैर्य और मानवीयता से बिना बड़े संसाधनों के भी उत्कृष्ट चिकित्सा सेवा दी जा सकती है। 81 वर्ष की आयु में भी उनका जीवन ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के इतिहास का प्रेरक अध्याय है।

तकनीक नहीं, अनुभव था आधार: 70 के दशक में ग्रामीण चिकित्सा बेहद चुनौतीपूर्ण थी। जांच उपकरण, अल्ट्रासाउंड या आधुनिक लैब सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। डॉ. कौर बताती हैं कि उस समय हाथ और आंखों की पहचान ही निदान का मुख्य साधन थी। उन्होंने प्रसूति और स्त्री-रोग सेवाओं में विशेष दक्षता विकसित की और रात-रातभर प्रसव कराने से लेकर जटिल मामलों में भी सेवा जारी रखी। उनका घर ही क्लीनिक बन गया, जहां 24 घंटे मरीजों का आना-जाना रहता था।

अशिक्षित परिवार से डॉक्टर बनने तक

डॉ. कौर का बचपन ऐसे परिवार में बीता जहां माता-पिता शिक्षित नहीं थे और बेटियों को घर से बाहर पढ़ाने का विरोध था। मां की बीमारी के कारण बचपन में अस्पतालों के चक्कर लगाते हुए उनके मन में डॉक्टर बनने का सपना जागा। रिश्तेदारों और समाज ने लडक़ी को बाहर भेजने का विरोध किया पर उन्होंने दोबारा प्रवेश परीक्षा दी और लखनऊ के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में चयन प्राप्त किया। यह उस समय की बड़ी उपलब्धि थी, जब मेडिकल शिक्षा में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी।

भाषा, भरोसा और जनसेवा से पहचान

ग्रामीण और छत्तीसगढ़ी बोलने वाली महिलाओं से संवाद प्रारंभ में कठिन था, पर उन्होंने स्थानीय भाषा और संवेदनशील व्यवहार से विश्वास जीता। एक प्रारंभिक घटना में जब एक महिला को गर्भ का भ्रम था उन्होंने स्थिति स्पष्ट कर उपचार किया। बाद में वही महिला कृतज्ञता से उनके चरणों में गिरी। ऐसे अनेक अनुभवों ने उन्हें अंचल की भरोसेमंद महिला चिकित्सक बना दिया। हजारों प्रसव कराने के बावजूद वे किसी एक उपलब्धि का दावा नहीं करतीं। उनके लिए हर सुरक्षित जन्म ही सफलता है।

सोच: समर्पण, धैर्य और मानवीयता से बिना बड़े संसाधनों के भी उत्कृष्ट चिकित्सा सेवा दी जा सकती है।

Updated on:
22 Feb 2026, 12:49 PM IST
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