
Inspirational Teacher Story: मो. इरशाद खान/सुबह का वक्त है। स्कूल जाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। रास्ता वही है, मंजिल वही है और जिम्मेदारी भी वही बच्चों को पढ़ाना। फर्क सिर्फ इतना है कि इस सफर में एक पैर उनका साथ नहीं देता। लेकिन जब इरादे मजबूत हों तो शरीर की कमजोरी भी रास्ता नहीं रोक पाती। बैसाखी के सहारे कदम बढ़ाते हुए प्रधानाध्यापक पलनी शेट्टी रोज स्कूल पहुंचते हैं और 32 बच्चों के भविष्य को संवारने में जुट जाते हैं।
यह कहानी सिर्फ एक शिक्षक की नौकरी करने की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जिसने तीन दशक से ज्यादा समय तक मुश्किलों के सामने हार नहीं मानी। एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद पलनी शेट्टी ने कभी खुद को कमजोर नहीं समझा। उनके लिए स्कूल सिर्फ नौकरी की जगह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का स्थान है।
पलनी शेट्टी वर्तमान में भोपालपटनम के उस ऐतिहासिक प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं, जिसे 1891 में स्थापित किया गया था। यह स्कूल क्षेत्र के सबसे पुराने स्कूलों में गिना जाता है। करीब 135 साल पुराने इस स्कूल की दीवारों ने कई पीढ़ियों को पढ़ते और आगे बढ़ते देखा है। आज इसी स्कूल में पलनी शेट्टी अपने अनुभव और समर्पण से बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। उनके लिए स्कूल की पुरानी इमारत केवल इतिहास नहीं है, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे हर दिन नए तरीके से निभाना है।
एक पैर से पूरी तरह दिव्यांग होने के बावजूद पलनी शेट्टी की दिनचर्या में उनकी दिव्यांगता कभी बाधा नहीं बनी। बारिश हो, गर्मी हो या मौसम खराब हो, उनकी कोशिश रहती है कि वे समय पर स्कूल पहुंचें। पहले वे लूना स्कूटर से स्कूल आया-जाया करते थे। समय के साथ सफर का तरीका बदला और अब वे ऑटोमैटिक कार से स्कूल पहुंचते हैं। इसके बाद कक्षा और कार्यालय तक पहुंचने के लिए बैसाखी उनका सहारा बनती है। लेकिन उनके कदमों की मजबूती बैसाखी में नहीं, उनके हौसले में है। वह कहते हैं, “मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं एक पैर से दिव्यांग हूं। बच्चों को पढ़ाना ही मेरा काम नहीं, मेरी जिम्मेदारी है। मौसम चाहे जैसा हो, हर हाल में समय पर स्कूल पहुंचने की कोशिश करता हूं।”
पलनी शेट्टी का शिक्षकीय सफर भी आसान नहीं रहा। वर्ष 1995-96 में उन्होंने पंचायत कर्मी के रूप में अपनी सेवा शुरू की। इसके बाद वर्ष 1998 में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के पद पर नियुक्ति हुई। उनकी पहली पोस्टिंग रामपेटा प्राथमिक स्कूल में हुई। स्कूल चिंतावागू नदी के दूसरी ओर था। रोजाना साइकिल से रास्ता तय करना और नदी-नालों को पार कर स्कूल पहुंचना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। करीब तीन साल तक उन्होंने इसी तरह बच्चों को पढ़ाया।
इसके बाद उनकी पदस्थापना उल्लूर प्राथमिक स्कूल में हुई। वर्ष 2003 के आसपास वे बालक आश्रम भोपालपटनम पहुंचे और करीब दो दशक तक वहां सेवाएं दीं। वर्ष 2022-23 में उन्हें प्रधानाध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके बाद उन्हें भोपालपटनम के 1891 में स्थापित पुराने प्राथमिक स्कूल की जिम्मेदारी सौंपी गई।
स्कूल के 32 बच्चों के लिए पलनी शेट्टी सिर्फ प्रधानाध्यापक नहीं हैं। उनकी जिंदगी और संघर्ष बच्चों के लिए किसी पाठ से कम नहीं है। वे बच्चों को किताबों का ज्ञान देने के साथ यह भी सिखाते हैं कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उनसे हारना जरूरी नहीं है। शायद यही वजह है कि उनके लिए शिक्षक होना केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों के भीतर विश्वास पैदा करना भी है। उनकी मौजूदगी बच्चों को यह एहसास दिलाती है कि परिस्थितियां इंसान की राह मुश्किल कर सकती हैं, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का हौसला उससे बड़ा हो सकता है।
तीन दशक से ज्यादा समय तक शिक्षा के क्षेत्र में सेवा देने वाले पलनी शेट्टी के समर्पण को अब सम्मान भी मिलने जा रहा है। शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें बीजापुर जिले से प्रधानाध्यापक श्रेणी में मुख्यमंत्री अलंकरण पुरस्कार के लिए चुना गया है। शुक्रवार को जगदलपुर में आयोजित होने वाले समारोह में मुख्यमंत्री उन्हें सम्मानित करेंगे। यह सम्मान केवल एक शिक्षक की उपलब्धि नहीं है। यह उस संघर्ष को सलाम है, जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया और बच्चों को पढ़ाना अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी माना।
पलनी शेट्टी की कहानी में कोई बड़ी सुविधा नहीं है, कोई आसान रास्ता नहीं है। है तो सिर्फ जिम्मेदारी, निरंतरता और हौसला। एक पैर उनका साथ नहीं देता, लेकिन दूसरा पैर और मजबूत इरादा उन्हें हर दिन स्कूल की ओर ले जाता है। बैसाखी उनके कदमों का सहारा है, लेकिन 32 बच्चों के सपने उनके सफर की असली ताकत हैं। शायद शिक्षक दिवस पर इससे बेहतर उदाहरण कम ही मिलेगा कि एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए कितना कुछ कर सकता है। पलनी शेट्टी ने साबित किया है कि शिक्षक केवल किताबों से नहीं पढ़ाता, कई बार उसकी जिंदगी ही बच्चों के लिए सबसे बड़ी किताब बन जाती है।