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भूतनाथ और पहेली जैसी प्रोडक्शन डिजाइनर मुनीश सप्पल बोले- AI से निखरेगी कला, रचनात्मकता को कोई नुकसान नहीं…

CG News: छत्तीसगढ़ के रायपुर फिल्में जब परदे पर अपनी दुनिया रचती हैं तो उसके पीछे सिर्फ कलाकार ही नहीं, बल्कि एक ऐसा पेंटर भी होता है जो कहानी को रंग, रूप और माहौल देता है। प्रोडक्शन डिजाइनर मुनीश सप्पल उन्हीं चंद लोगों में हैं, जिन्होंने सिनेमा को सजाने और डिजाइन करने की कला को […]

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Feb 03, 2026
भूतनाथ और पहेली जैसी प्रोडक्शन डिजाइनर मुनीश सप्पल बोले- AI से निखरेगी कला, रचनात्मकता को कोई नुकसान नहीं...(photo-patrika)

CG News: छत्तीसगढ़ के रायपुर फिल्में जब परदे पर अपनी दुनिया रचती हैं तो उसके पीछे सिर्फ कलाकार ही नहीं, बल्कि एक ऐसा पेंटर भी होता है जो कहानी को रंग, रूप और माहौल देता है। प्रोडक्शन डिजाइनर मुनीश सप्पल उन्हीं चंद लोगों में हैं, जिन्होंने सिनेमा को सजाने और डिजाइन करने की कला को नई पहचान दी। लखनऊ से निकलकर मुंबई तक का उनका सफर जुनून, मेहनत और कला के प्रति गहरी निष्ठा की कहानी कहता है। रायपुर प्रवास के दौरान उन्होंने पत्रिका से खास बातचीत की।

CG News: फिल्मी सफर कैसे शुरू हुआ?

मैंने पहला काम डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ 1989 में चाणक्य किया था। उसके बाद लगातार सिनेमा से जुड़ा रहा। पिंजर, पहेली, रब ने बना दी जोड़ी, भूतनाथ, डोर, तेरी मेरी कहानी, यमला पगला दीवाना जैसी कई फिल्मों में काम किया। काम को एंजॉय करता हूं, मजा लेता हूं।

आज एआई का दौर चल रहा है। टेक्नोलॉजी कला को किस तरह प्रभावित करेगी?

मुझे नहीं लगता कि यह कला को नुकसान पहुंचाएगी। ये सब टूल्स होते हैं। जैसे पहले मोटा ब्रश था, फिर पतला ब्रश आया, रंगों में ज्यादा डिटेलिंग आई। ये सब चीजें आपके काम को और निखारने में मदद करती हैं।

फिल्म इंडस्ट्री में लॉबी की बहुत चर्चा होती है। क्या आप कभी इसका शिकार हुए?

लॉबी जैसी चीज मुझे समझ में नहीं आती। मैं लखनऊ से हूं, पूरी तरह लखनवी हूं और अपने मन के लिए काम करता हूं। अपने स्वांत: सुखाय के लिए काम करता हूं। पैसा अपने आप आ जाता है। जिंदगी बहुत अच्छी चल रही है। लॉबी से मेरा कोई वास्ता नहीं रहा।

फिल्मी दुनिया बाहर से ग्लैमर से भरी लगती है, लेकिन मेहनत बहुत होती है। रात-रात भर काम करना पड़ता है। क्या इसका असर सेहत पर पड़ता है?

बिल्कुल पड़ता है। ये एक तरह का पागलपन है, एक तरह का पैशन है। लोग दिन-रात, पूरा जीवन इसमें लगा देते हैं। फिर भी संतुष्टि नहीं मिलती, क्योंकि कला का कोई अंत नहीं होता। ऐसा कोई बिंदु नहीं आता जहां लगे कि अब सब पूरा हो गया। हमेशा और बेहतर करने की चाह बनी रहती है।

मुंबई में रायपुर के जयंत देशमुख का बड़ा नाम है। उनके बारे में क्या कहेंगे?

जयंत मेरे बहुत करीबी हैं। हम लगातार मिलते रहते हैं। वो थिएटर वर्कशॉप्स करते हैं और मुझे भी कई बार इनवाइट करते हैं। मैं भी ड्रामा स्कूल से हूं, लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी से, इसलिए हमारी अच्छी बॉन्डिंग है।

आपने और जयंतजी ने साबित किया कि छोटे शहर के लोग भी बॉम्बे में सफल हो सकते हैं। छोटे शहर के युवाओं को क्या संदेश देंगे?

शुरुआत में थोड़ा डर लगता है, लेकिन अगर आपको अपना काम आता है और आपका मन उसमें लगता है, तो बड़ा या छोटा शहर मायने नहीं रखता। अपनी कला को अपने ढंग से करें। अगर लोगों को पसंद आती है तो बात आगे जाती है, वरना इंसान अपने शहर लौट भी सकता है, इसमें कोई बुरी बात नहीं।

Updated on:
03 Feb 2026 04:11 pm
Published on:
03 Feb 2026 03:12 pm
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