
Indo-Pak Border Tourism: सरहद पर जवान वही। तारबंदी वही। सामने पाकिस्तान भी वही, लेकिन तस्वीर दो राज्यों में अलग-अलग है। पंजाब में शाम होते ही सीमा देखने वालों की भीड़ जुटती है। कदमताल करती जवानों की टुकड़ी के साथ कैमरे चमकते हैं और तिरंगा उतरते ही तालियों की गूंज होती है। राजस्थान में भी सरहद है, पंजाब से कहीं लंबी। फर्क इतना है कि यहां सरहद के साथ जुड़ी कहानियां तो अनगिनत हैं, लेकिन उन्हें एक मुकम्मल पर्यटन अनुभव में पिरोने का इंतजार अब भी है।
पंजाब ने अपनी सीमा को पर्यटन का डेस्टिनेशन बना दिया। राजस्थान के पास सीमा के साथ इतिहास, शौर्य, आस्था, युद्ध, लोकगाथा और रेगिस्तान सब कुछ है। दरअसल, पंजाब ने सीमा को सिर्फ सीमा नहीं रहने दिया। वाघा-अटारी बॉर्डर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रिट्रीट सेरेमनी ने यहां सीमा दर्शन को एक खास अनुभव बना दिया। लोग सिर्फ तारबंदी देखने नहीं आते। वे जवानों की कदमताल देखते हैं, तिरंगे के सम्मान का हिस्सा बनते हैं और भारत-पाक सीमा का रोमांच महसूस करते हैं। हुसैनीवाला में सीमा के साथ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की कहानी जुड़ जाती है।
सादकी में भी सीमा दर्शन और समारोह पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, लेकिन पंजाब की कहानी सिर्फ पुराने आकर्षणों तक सीमित नहीं है। नए निवेश से बॉर्डर टूरिज्म को और मजबूत करने की तैयारी भी चल रही है। अटारी में बॉर्डर टूरिज्म एक्सपीरियंस विकसित करने के लिए परियोजना मंजूर हो चुकी जबकि हुसैनीवाला बॉर्डर पर कल्चरल एंड हेरिटेज स्ट्रेच विकसित करने के लिए राशि मंजूर की गई है। कहने का सार यही है कि पंजाब अब सीमा पर आने वाली भीड़ को केवल रिट्रीट सेरेमनी तक सीमित नहीं रखना चाहता। सीमा को व्यवस्थित पर्यटन अनुभव में बदलने की दिशा में भी काम हो रहा है।
पाकिस्तान से राजस्थान की सीमा करीब 1070 किलोमीटर लंबी है। श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर चार जिले इस विशाल सीमा पट्टी से जुड़े हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां हर इलाके की अपनी कहानी है। श्रीगंगानगर जिले में हिंदुमलकोट सीमा और इतिहास का पड़ाव है। नग्गी 1971 के युद्ध की स्मृतियों से जुड़ा है। अनूपगढ़ क्षेत्र में लैला-मजनू की मजार प्रेम की लोकगाथा सुनाती है। बीकोनर जिले में सांचू पोस्ट सीमा दर्शन का रोमांच देती है।
जैसलमेर में तनोट आस्था और युद्ध इतिहास को एक साथ खड़ा करता है। लोंगेवाला भारतीय सैनिकों के शौर्य की गाथा है। वॉर म्यूजियम युद्ध इतिहास को व्यवस्थित रूप में सामने रखता है और बाडमेर जिले में गडरारोड व मुनाबाव सीमा, रेल और युद्ध के इतिहास से जुड़े हैं। यानी राजस्थान के पास केवल सीमा नहीं है। सीमा के साथ पूरी-की-पूरी कहानियों की श्रृंखला है।
राजस्थान में सीमा पर्यटन को विस्तार देने की संभावना को देखते हुए तनोट राय माता मंदिर परिसर में बीएसएफ की रिट्रीट सेरेमनी शुरू करने की योजना बनाई गई थी। वर्ष 2025 में इसके लिए आवश्यक संरचना भी तैयार करवाई गई थी। योजना के तहत शाम को बीएसएफ जवानों की परेड और तिरंगा उतारने की रस्म आयोजित करने पर विचार था। यह अटारी-वाघा की तरह नहीं होता। सामने पाकिस्तानी रेंजर्स की मौजूदगी नहीं रहती। इसके बावजूद जवानों की कदमताल और तिरंगे के सम्मान का कार्यक्रम तनोट आने वाले पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण बन सकता था। लेकिन सुरक्षा कारणों और ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली परिस्थितियों के चलते यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी।
राजस्थान को बॉर्डर टूरिज्म के लिए सिर्फ रिट्रीट सेरेमनी की जरूरत नहीं है। उसके पास उससे कहीं ज्यादा है। जहां पंजाब में सीमा समारोह सबसे बड़ा आकर्षण बनता है, राजस्थान में युद्ध, शौर्य, आस्था, लोकगाथा और रेगिस्तान एक साथ पर्यटन उत्पाद बन सकते हैं। हिंदुमलकोट से नग्गी। अनूपगढ़ से सांचू। तनोट से लोंगेवाला। गडरारोड से मुनाबाव। इन सभी को अलग-अलग जगहों के बजाय एक बड़े राजस्थान बॉर्डर टूरिज्म सर्किट के रूप में देखा जा सकता है।
बॉर्डर टूरिज्म का लाभ केवल पर्यटक संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होगा। सीमावर्ती गांवों में होम-स्टे विकसित किए जा सकते हैं। स्थानीय भोजन, लोक संगीत, हस्तशिल्प और रेगिस्तानी जीवन को पर्यटन पैकेज में जोड़ा जा सकता है। ऊंट सफारी और सीमा दर्शन को एक साथ जोड़ा जा सकता है। स्थानीय युवाओं को गाइड, परिवहन और आतिथ्य सेवाओं से जोड़ा जा सकता है। यानी सीमा पर आने वाला पर्यटक सिर्फ सीमा नहीं देखेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी पैसा छोड़ेगा।