
Grade separator bridge : देश के मध्य हिस्से में स्थित कटनी लंबे समय से मालगाड़ियों के लिए एक अहम रेल जंक्शन रहा है। कोयला, सीमेंट, लौह अयस्क और दूसरी औद्योगिक सामग्री लेकर निकलने वाली ट्रेनों के दबाव ने यहां के रेल नेटवर्क को बेहद व्यस्त बना दिया था। अब इसी दबाव को जमीन से ऊपर उठाकर हल करने की कोशिश हो रही है। कटनी ग्रेड सेपरेटर ने भारतीय रेलवे के माल परिवहन को एक नई दिशा दी है।
कटनी में करीब 1800 करोड़ रुपए की लागत से 33.40 किलोमीटर लंबा ग्रेड सेपरेटर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य मालगाड़ियों को कटनी के व्यस्त रेल नेटवर्क से अलग मार्ग देना है। परियोजना के 15.85 किलोमीटर लंबे अप हिस्से को चालू किया जा चुका है, जबकि 17.52 किलोमीटर डाउन हिस्सा परियोजना का दूसरा प्रमुख भाग है। डाउन का हिस्सा सितंबर 2026 तक पूरा होने की संभावना है।
कटनी ग्रेड सेपरेटर की असली अहमियत इसकी लंबाई से ज्यादा उसके उद्देश्य में है। बिलासपुर और सिंगरौली की तरफ से आने वाली मालगाड़ियों को कटनी के भीड़भाड़ वाले रेल परिचालन से अलग करते हुए बीना और आगे के रूट की ओर निकालने की क्षमता इस परियोजना को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। रेलवे के अनुसार इससे फ्रेट ट्रेनों की आवाजाही आसान होने और कटनी, न्यू कटनी जंक्शन तथा कटनी मुड़वारा जैसे व्यस्त हिस्सों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। यानी जिस मालगाड़ी को पहले कटनी के व्यस्त रेल नेटवर्क में रास्ता मिलने का इंतजार करना पड़ सकता था, उसके लिए अब एक अलग रेल कॉरिडोर तैयार है।
पूरे प्रोजेक्ट में करीब 18 किलोमीटर लंबा रेल वायाडक्ट है। इसे भारतीय रेलवे के सबसे लंबे रेलवे वायाडक्ट के रूप में पहचान मिली है। 2026 के इंडिया बुक ऑफ रिकार्डमें भी कटनी परियोजना के 15.85 किलोमीटर अप हिस्से को भारत के सबसे लंबे रेलवे वायाडक्ट के रूप में दर्ज किए जाने का उल्लेख है। इसका निर्माण सामान्य रेल लाइन बिछाने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण रहा है। कई जगह काम चलती रेल लाइनों के ऊपर किया गया। एलएंडटी के अनुसार परियोजना में एक 91.4 मीटर लंबा और 565 टन वजनी ओपन वेब गर्डर भी व्यस्त चालू रेल लाइनों के ऊपर सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है।
ग्रेड सेपरेटर का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब रेल यातायात के दो स्तर दिखाई देते हैं। नीचे पुराना रेल नेटवर्क और उसके ऊपर एलिवेटेड रेल मार्ग। ऊपर से गुजरती लंबी मालगाड़ी जब वायाडक्ट पर आगे बढ़ती है तो यह सिर्फ कटनी के इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव नहीं दिखाती, बल्कि यह बताती है कि भारतीय रेलवे भीड़भाड़ वाले रेल मार्गों को मल्टी-लेवल नेटवर्क में बदलने की दिशा में बढ़ रहा है।
कटनी से गुजरने वाले माल परिवहन का संबंध केवल रेलवे से नहीं है। सिंगरौली क्षेत्र से निकलने वाला कोयला बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। इसी तरह सीमेंट, खनिज और अन्य औद्योगिक सामग्री की आवाजाही मध्य भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में मालगाड़ियों की आवाजाही में होने वाला हर सुधार आगे चलकर बिजलीघरों, उद्योगों और निर्माण क्षेत्र की सप्लाई चेन पर असर डाल सकता है। यही वजह है कि रेलवे इस परियोजना को केवल कटनी की यातायात समस्या का समाधान नहीं, बल्कि फ्रेट क्षमता बढ़ाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर देख रहा है।
कटनी लंबे समय से देश के महत्वपूर्ण रेल जंक्शनों में शामिल रहा है, लेकिन यही स्थिति इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बनी। कई दिशाओं से आने-जाने वाली यात्री और मालगाड़ियों के कारण रेल नेटवर्क पर दबाव बढ़ता रहा। ग्रेड सेपरेटर इसी दबाव को अलग करने की कोशिश है। परियोजना पूरी क्षमता से संचालित होने के बाद कटनी के व्यस्त रेल नेटवर्क में मालगाडिय़ों के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होगा। इसका फायदा मालगाड़ियों की गति, संचालन की नियमितता और यात्री ट्रेनों की लाइनिंग में भी मिलने की उम्मीद है।
जबलपुर रेलवे के सीपीआरओ हर्षित श्रीवास्तव कटनी में भारतीय रेलवे का सबसे लंबा पुल (वायाडक्ट) कटनी ग्रेड सेपरेटर बनाया जा रहा है। यह परियोजना पश्चिम मध्य रेलवे की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है। इस ग्रेड सेपरेटर के पूरा होने पर यह भारतीय रेलवे का सबसे लंबा रेलवे वायाडक्ट बन जाएगा। अप ट्रेक का निर्माण पूरा हो चुका है और डाउन ट्रेक पर निर्माण तेजी से चल रहा है।