
BJP Congress : राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2028 की तैयारियों का पहला बड़ा राजनीतिक अभ्यास पूरा होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस अब चुनाव परिणामों से आगे बढ़कर अपने नेताओं के कामकाज का हिसाब-किताब जुटाने में लग गई हैं। दोनों दल नगरीय निकाय चुनाव को शहरी क्षेत्रों में संगठन और नेताओं की पकड़ परखने के एक महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देख रहे हैं। अब चुनाव के नतीजों के साथ यह भी देखा जा रहा है कि किस नेता ने पार्टी प्रत्याशी के लिए कितनी सक्रियता दिखाई, किस क्षेत्र में संगठन मजबूत रहा, कहां अंदरूनी खींचतान सामने आई और किन नेताओं की भूमिका को लेकर शिकायतें मिलीं।
भाजपा में निकायवार गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने की कवायद चल रही है, जबकि कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व के स्तर से चुनाव में नेताओं की सक्रियता और परिणामों को लेकर जानकारी मांगे जाने के बाद प्रदेश संगठन ने रिपोर्ट तैयार करना शुरू किया है। दोनों दलों की रिपोर्ट का अगला इस्तेमाल संगठनात्मक जिम्मेदारियों, आगामी पंचायत चुनाव की रणनीति और 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी में हो सकता है।
निकाय चुनाव के अंतिम परिणामों में 309 नगरीय निकायों में भाजपा करीब 148 निकायों में सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई, जबकि कांग्रेस लगभग 104 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही। 10 निकायों में करीब दोनों दल बराबरी पर रहे। ऐसे में दोनों पार्टियों के लिए यह चुनाव केवल बोर्ड बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से संगठन की ताकत और कमजोरियों को समझने का मौका भी बन गया है।
निकाय चुनाव के बाद भाजपा संगठन ने अब परिणामों की माइक्रो लेवल पर समीक्षा शुरू कर दी है। प्रदेश स्तर से निकायवार रिपोर्ट तैयार कराए जाने की चर्चा है, जिसे केंद्रीय नेतृत्व तक भेजा जा सकता है। रिपोर्ट में केवल यह नहीं देखा जाएगा कि भाजपा ने कितने निकायों में जीत दर्ज की, बल्कि चुनाव के दौरान स्थानीय नेताओं, जनप्रतिनिधियों और संगठन पदाधिकारियों की भूमिका भी जांची जाएगी।
जिला और स्थानीय संगठन से फीडबैक जुटाकर यह पता लगाया जा रहा है कि किस नेता ने पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में सक्रियता दिखाई और कौन नेता चुनावी गतिविधियों से दूरी बनाए रहा। जिन निकायों में पार्टी को जीत की उम्मीद थी लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए, वहां विशेष समीक्षा की जा रही है। ऐसे निकायों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण, टिकट वितरण के बाद पैदा हुई नाराजगी, बागी प्रत्याशी, नेताओं के बीच खींचतान और संभावित भितरघात जैसे पहलुओं को भी रिपोर्ट का हिस्सा बनाया जा सकता है।
भाजपा में इस समीक्षा का असर आगे संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर भी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पहले ही चुनावों में नेताओं के कामकाज का आकलन परिणामों से जोड़ने की बात कह चुके हैं। वहीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ भी राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक भूमिका में नेताओं की सक्रियता को महत्वपूर्ण मानते रहे हैं।
कांग्रेस में भी निकाय चुनाव के बाद समीक्षा का काम शुरू हो गया है। केंद्रीय नेतृत्व की ओर से प्रदेश संगठन से चुनाव परिणाम, नेताओं की सक्रियता, पार्टी के प्रदर्शन और चुनाव के दौरान सामने आई शिकायतों से जुड़ी जानकारी मांगे जाने के बाद प्रदेश स्तर पर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। इसमें विधानसभा वार निकाय परिणामों को देखा जाएगा। साथ ही यह भी दर्ज किया जा रहा है कि संबंधित विधानसभा क्षेत्र में पार्टी के विधायक, पूर्व विधायक, प्रमुख नेता और संगठन पदाधिकारी चुनाव के दौरान कितने सक्रिय रहे।
चुनाव के दौरान कई जगह टिकट वितरण को लेकर नाराजगी, बागी प्रत्याशियों और नेताओं के बीच मतभेद की शिकायतें सामने आई थीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने निकाय चुनाव से पहले भी जिला इकाइयों से आंतरिक विवादों की रिपोर्ट मांगी थी। अब चुनाव परिणाम के बाद इन शिकायतों को परिणामों से जोड़कर देखा जा रहा है। जिला और ब्लॉक इकाइयों के अलावा चुनाव में लगाए गए पर्यवेक्षकों से भी फीडबैक लिया जा रहा है। खास तौर पर उन विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान रहेगा, जहां पार्टी के बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद प्रदर्शन कमजोर रहा या जहां बागियों और निर्दलीयों ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के सामने चुनौती खड़ी की।
निकाय चुनाव के बाद भाजपा और कांग्रेस के पास शहरी क्षेत्रों का एक नया चुनावी डेटा सेट भी है। इसमें वार्ड स्तर के परिणाम, पार्टी प्रत्याशियों का प्रदर्शन, निर्दलीयों की भूमिका, बागियों का असर और विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के प्रदर्शन को मिलाकर आगे की रणनीति बनाई जा सकती है। इस चुनाव ने यह भी दिखाया कि केवल भाजपा-कांग्रेस का सीधा मुकाबला हर जगह नहीं रहा। कई क्षेत्रों में निर्दलीयों और छोटे दलों ने बोर्ड गठन के समीकरणों को प्रभावित किया। इसलिए 2028 की तैयारी में दोनों प्रमुख दलों के लिए स्थानीय नेतृत्व और तीसरे विकल्पों की भूमिका को समझना भी महत्वपूर्ण होगा।
विधानसभा की मौजूदा दलगत स्थिति में भाजपा के 118, कांग्रेस के 67, निर्दलीय 8, भारत आदिवासी पार्टी के 4, बहुजन समाज पार्टी के 2 और राष्ट्रीय लोक दल का 1 विधायक है। इससे साफ है कि 2028 की तैयारी के लिए भाजपा और कांग्रेस के लिए केवल एक-दूसरे के खिलाफ रणनीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा। आदिवासी क्षेत्र, कुछ सीमित सामाजिक-क्षेत्रीय प्रभाव वाले इलाके और निर्दलीय राजनीति भी विधानसभा चुनाव की तस्वीर में भूमिका निभा सकती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान की 25 सीटों में भाजपा ने 14 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 8 सीटें मिलीं, जबकि भारत आदिवासी पार्टी, माकपा और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने एक-एक सीट जीती। इस लिहाज से 2028 तक दोनों प्रमुख दल विधानसभा, लोकसभा और निकाय चुनावों के आंकड़ों को साथ रखकर मशक्कत की तैयारी में जुट सकते हैं।
निकाय चुनाव के बाद तैयार हो रही रिपोर्ट का अगला बड़ा इस्तेमाल पंचायत चुनाव की तैयारी में हो सकता है। दोनों दलों के लिए पंचायत चुनाव विधानसभा क्षेत्रों के ग्रामीण हिस्सों में संगठन की ताकत परखने का अवसर होंगे। राजनीतिक स्तर पर यह चर्चा है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में निकाय चुनाव के दौरान बड़े नेताओं के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन रहा। वहां पंचायत चुनाव में संगठन और उम्मीदवार चयन में उनकी भूमिका को अधिक महत्व मिल सकता है। इसके विपरीत कमजोर परिणाम वाले क्षेत्रों में पार्टी नेतृत्व स्थानीय संगठन की स्थिति की दोबारा समीक्षा कर सकता है।
निकाय चुनाव में भाजपा कई निकायों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन सभी क्षेत्रों में प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा। कुछ जगह निर्दलीयों और स्थानीय समीकरणों ने पार्टी के लिए चुनौती पैदा की। इसलिए भाजपा की समीक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह हो सकता है कि जहां पार्टी मजबूत मानी जाती थी, वहां कमजोर प्रदर्शन क्यों हुआ। विशेषकर टिकट वितरण के बाद बगावत, स्थानीय नेताओं की नाराजगी और प्रत्याशियों को संगठन का पूरा समर्थन नहीं मिलने जैसे मुद्दे आगे की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव की समीक्षा का फोकस केवल जीते हुए निकायों की संख्या नहीं, बल्कि मतदान प्रतिशत के हिसाब से संगठन की जमीनी सक्रियता पर भी रहेगा। पार्टी यह भी फीडबैक लेगी कि निकायों में विधानसभा स्तर के नेताओं और स्थानीय संगठन के बीच कितना समन्वय रहा। कांग्रेस में चुनाव के दौरान सामने आए गुटीय विवादों और टिकट वितरण से जुड़ी शिकायतों की रिपोर्ट पहले ही केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचने लगी थी। अब परिणाम आने के बाद इन विवादों का चुनावी असर भी आकलन का हिस्सा बन सकता है।
निकाय चुनाव के बाद दोनों दलों के सामने अगला चरण केवल समीक्षा बैठकों का नहीं, बल्कि उस समीक्षा को संगठनात्मक फैसलों में बदलने का है। 2028 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन दोनों पार्टियां अब क्षेत्रवार डेटा, नेताओं की सक्रियता और स्थानीय संगठन को लेकर फीडबैक जुटाने में लग गई हैं। भाजपा के लिए सत्ता में रहते हुए संगठन की पकड़ बनाए रखना चुनौती होगी, जबकि कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव के अनुभवों से संगठन को मजबूत करना अहम रहेगा। अब पंचायत चुनाव इस प्रक्रिया का अगला बड़ा परीक्षण बनेगा। इस तरह निकाय चुनाव के बाद तैयार हो रही गोपनीय रिपोर्टें फिलहाल भले ही पार्टी कार्यालयों और नेतृत्व के बीच सीमित रहें, लेकिन इनके आधार पर आने वाले महीनों में संगठनात्मक जिम्मेदारियों, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और उम्मीदवार चयन को लेकर फैसलों में बदलाव दिखाई दे सकता है।