
Gramdani System in 196 Villages: ‘सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी’, उस समय के दुनिया के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने कहा था। ग्रामदान पूरब की ओर से आने वाला यह सबसे अधिक रचनात्मक विचार है। जिसे हमारे देश ने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के रूप में करीब 75 साल पहले अपनाया। प्रदेश में इसके लिए भूदान-ग्रामदान बोर्ड तक बने है। परन्तु बोर्ड भंग होने के बाद से इसकी गतिविधियां प्रदेश स्तर पर ठप पड़ी है।
केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में भले ही धारा 370 व 35ए हटा दी है, लेकिन राजस्थान के 196 गांव आज भी ऐसे हैं, जहां बाहरी व्यक्ति को जमीन खरीदने की अनुमति नहीं है। यहां राजस्व से जुड़े मामलों में सरकार के राजस्व विभाग की भी कोई ‘पंचायती’ नहीं चलती है। यहां ग्रामीणों की ओर से निर्वाचित ग्राम सभा ही जमीन खरीद-फरोख्त से लेकर जमीन के नामांतरण, नक्शा जारी करने, गिरदावरी नकल देने जैसे सभी काम करती है। ग्राम सभा में एक अध्यक्ष व एक सचिव का तथा कुछ सदस्य होते हैं। जो राजस्व रिकॉर्ड संधारण का काम देखते हैं।
प्रदेश के जयपुर, उदयपुर, चित्तौडगढ़़, नागौर, जैसलमेर, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, सीकर, सिरोही व बांरा जिले के 196 गांव ग्रामदानी हैं। जैसलमेर में कई तो ऐसे गांव है जहां 50-50 हजार बीघा से ज्यादा भूमि ग्रामदान में दर्ज है। बीकानेर जिले में छतरगढ़ में भूदान की कुछ जमीन है, लेकिन इस पर कब्जे हो रखे है। साथ ही राजस्व विभाग ने दोहरे आवंटन तक कर रखे है।
नागौर जिले की लाडनूं तहसील के श्रीकृष्णपुरा, त्रिलोकपुरा व भामास, डीडवाना के श्रीरघुनाथपुरा व रायसिंहपुरा, नागौर के सुखवासी व पिथोलाव, मकराना के चांवडिया, बांसड़ा व कालवा छोटा गांव ग्रामदानी हैं। सुखवासी, चांवडिया, बांसड़ा में पटवारी का पद ही नहीं है।
संत विनोबा भावे सन् 1951 में भूदान आंदोलन चला रहे थे। संत विनोबा की पदयात्रा में 24 मई 1952 को एक अनोखी घटना हुई। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मंगरोठ गांव के लोगों ने पूरे गांव की जमीन ही दान कर दी। इस तरह भूदान से एक कदम आगे ग्रामदान के विचार का जन्म हुआ। मंगरोठ गांव के लोगों ने कहा कि हमारा गांव अब एक परिवार है। इसलिए पूरे गांव का लगान ग्रामसभा एक साथ जमा कर देगी। 1969 तक देशभर में लगभग सवा लाख ग्रामदानी गांव बन चुके थे। राजस्थान में 1971 में राजस्थान ग्रामदान अधिनियम-1971 पारित किया गया।बाद में समय से साथ इस परिकल्पना का फैलाव थमता गया।
ग्रामदानी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह है कि गांव के लोग अपनी व्यवस्था को स्वयं संभालें एवं जो भी भूमि है उसको सबसे पहले गरीब को देते हुए शेष अन्य को प्रदान करें। सब मिलजुलकर गांव का विकास करें। ग्रामीणों को जमीन के नामांतरण व हस्तारण के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़े। न ही रजिस्ट्री का पैसा देना पड़ता है। गांव में भूमि सम्बन्धी विवाद नहीं होने से लड़ाई-झगड़े नहीं होते। राजस्व गांवों में वर्तमान में सबसे ज्यादा विवाद जमीनों से जुड़े हैं।
ग्रामदानी गांवों के लिए नुकसान सिर्फ एक ही है। बाहरी व्यक्ति चाहकर भी ग्रामदानी गांव में जमीन नहीं खरीद सकते।
ग्रामदानी गांव सुखवासी के सचिव ओप्रकाश ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि भूदान आंदोलन के तहत सुखवासी सन 1960 से ग्रामदानी गांव बना था, जहां जमीन से जुड़े सभी मामले ग्राम सभा देखती है। गांव की पूरी जमीन की मालिक ग्राम सभा ही है। पिछले 60 सालों में हमारे गांव का जमीन से जुड़ा एक भी विवाद कहीं पर भी लम्बित नहीं है। सबसे खास बात यह है कि राजस्व के मामले में एक पैसा खर्च नहीं होता।
राजस्थान राज्य भूदान यज्ञ (ग्रामदान) बोर्ड को प्रदेश सरकार ने 18 जून 2024 को बोर्ड भंग कर अध्यक्ष लक्ष्मण कड़वासरा को अध्यक्ष पद से हटा दिया। इसके बाद पिछले साल कोर्ट ने आदेश जारी कर बोर्ड भंग करने के आदेश पर रोक लगी और कड़वासरा ने फरवरी 2026 तक अपना कार्यकाल पूरा कर लिया। इसके बाद से बोर्ड अब नाम का रह गया है। दूसरी तरफ विपक्ष के यह आरोप भी लग रहे है कि राज्य सरकार मल्टीनेशन कंपनियों को सोलर आदि के लिए जमीनें देने के लिए बोर्ड को समाप्त कर इस व्यवस्था को ही समाप्त करना चाहती है।
राज्य भूदान यज्ञ (ग्रामदान) बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मण कड़वासरा ने पत्रिका को बताया, भूदान यज्ञ (ग्रामदान) बोर्ड के अधीन अब बहुत कम जमीनें बची है। ग्रामदान की वास्तविक परिकल्पना और भावना डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले में ही देखने को मिलती है। वहां आज भी 80-90 साल के बुजुर्ग इस व्यवस्था को मन से आगे बढ़ा रहे है। जैसलमेर में सर्वाधिक जमीनें ग्राम सभाओं के अधीन है लेकिन धरातल पर वास्तविकता अलग है। कुछ जगह कब्जा धारियों ने जमीनें बाहरी लोगों को आवंटित होने से रोकने के लिए ग्रामदानी में डलवाई। असल में यह परिकल्पना गांव के प्रत्येक ग्रामीण को खेती के लिए समान भूमि मिले और सामूहिक कृषि की व्यवस्था है। परन्तु जिन गांवों में जमीनें नहीं बची वह अपनी पंचायत को भूदान या ग्रामदानी से बाहर निकलवा रहे है। प्रदेश में भूदान बोर्ड के पुराने नियुक्त छह-सात क्षेत्रीय कार्यकर्ता बचे है। जो इसके लिए काम करते है।