
Ground Report : इलाका… दक्षिण राजस्थान का वागड़। जिला बांसवाड़ा, गांव टामटिया। वक्त… दुपहरी के 12 बजकर 16 मिनट। हल्की बरसात हो रही है। करीब साढ़े तीन महीने से ज्यादा वक्त पहले गांव की 500 मीटर में फैली बस्ती ‘कटारा फला’ के घरों में लगाई आग बुझ चुकी है, मगर प्रतिशोध की कालिख जर्जर दीवारों पर जमी है, ‘खौफ की गंध’ अब भी हवा में तैर रही है। बिखरी बस्ती के तीन दर्जन घर पूरी तरह जर्जर-बर्बाद हो चुके हैं। उनमें रहना मुमकिन नहीं है। यहां करीब साढ़े तीन सौ लोग रहते थे, जिनके पलायन के बाद मरघट सा सन्नाटा पसरा है।
युवक बाबूलाल, 10वीं की छात्रा रमिला, मोतिया, रूपलाल, राजमल, धनजी, दो-तीन कुछ बुजुर्ग, पांच-सात बच्चे और इक्का-दुक्का महिलाएं यहां रहते हैं। बाकी लोगों के जेहन में वारदात की रात का डर इस कदर बैठा है कि वे लौटकर नहीं आ रहे। पुलिस और प्रशासन भले पूरी सुरक्षा का दावा और भरोसा देते हों, लेकिन लोग फिलहाल वापस नहीं आना चाहते।
एक किलोमीटर के इलाके में फैले गांव में आमने-सामने दो हिस्सों में बस्तियां, कटारा फला व मईड़ा फला में बंटी हुई हैं। मईड़ा फला बस्ती के युवक गोविन्द की 26 अप्रेल की शाम हत्या के तत्काल बाद सामने की कटारा फला से आक्रोशित भीड़ घुसी और एक के बाद एक कुल 35 घर, उनके बाहर खड़े चौपहिया, दुपहियान वाहन फूंक डाले थे। कई मवेेशी जिन्दा जलकर मर गए।
यह वारदात उस घटना के बदले में हुई, जिसमें कटारा फला के एक ही परिवार के पांच लोगों ने मिलकर पुरानी रंजिश की वजह से मईड़ा फला के गोविन्द की धारदार हथियार से हत्या कर दी थी। प्रतिशोध की आग में पूरी कटारा फला बस्ती फूंक दी गई। साढ़े तीन सौ लोग, जिनमें बच्चे, जवान, महिलाएं और बूढ़े तक शामिल थे, जान हथेली पर लेकर भाग खड़े हुए। आदिवासी अंचल वागड़ में यह अब तक का सबसे बड़ा ‘चढ़ोतरा’ था, जिसने दिल दहला दिए। इस वारदात ने कई सवाल छोड़ दिए हैं।
दशकों से यहां रह रहे आदिवासी परिवारों के घर उजड़ चुके हैं। ज्यादातर लोग पलायन कर गए। कोई अपने बच्चों व पत्नी को लेकर ससुराल में रह रहा है, तो कोई अन्य रिश्तेदारों के यहां चले गए। इक्का-दुक्का परिवारों ने खेतों में लकड़ी, पत्तों और साडिय़ों-कपड़ों को ढंककर अस्थायी झोंपड़़ा बनाया। गांव में लोगों ने इस बार फसल ही नहीं बोई। खेत बंजर पड़े हैं। वारदात के दिन अधिकांश पशुओं के खूंटे खोलने से वे बच भागे। कुछ भैंसें, बकरियां जिन्दा जल गई थीं। यहां खेती, पशुपालन, बच्चों की शिक्षा, रोजमर्रा की जिन्दगी और सबकुछ चौपट हो चुका है।
भीड़ की लगाई आग दूसरे दिन सुबह तक धधकती रही थी। बस्ती में पुलिस तक को जाने से रोक दिया, जिससे दमकलों को भी पहुंचाने में मुश्किल आई थी। 12 से 14 घंटे तक कच्चे-पक्के मकान जलते रहे, जिनमें कोठियों में रखा अनाज, पलंग-बिस्तर, कपड़े, बर्तन, बच्चों की किताबें और दस्तावेज व घर का तमाम सामान जलकर राख हो गया था।
बस्ती के लोग खेती व पशुपालन से गुजारा करते थे। उनके यहां न लौटने की तीन बड़ी वजहें हैं। पहली उनके लौटने पर फिर से दूसरे पक्ष की ओर से हमले का डर है। दूसरा कारण है रहने का घर नहीं बचा। घर बनाने का पैसा नहीं है। तीसरा खेती शुरू करने के लिए अनाज तक नहीं बचा।
एक पीड़त परिवार के युवक बाबूलाल ने कहा कि गोविन्द की हत्या के आरोपी हमारे रिश्तेदार एवं पड़ोसी हैं। केवल इसीलिए हमारे घर जला दिए। आरोपी एक ही परिवार के केवल पांच लोग थे, लेकिन सारे मकानों में आग लगा दी।
'कपड़े, पैसे, अनाज कुछ भी नहीं बचा'
गांव के निवासी शंकर की बेटी रमिला जो छात्रा है, उसका कहना है कि न रहने का घर है, न खाने को अनाज और बर्तन हैं। कपड़े तक नहीं हैं। पैसे भी नहीं हैं। कपड़े औरों से मांगकर पहन रहे हैं। लोग यहां अब क्यों आएंगे, जब कुछ बचा ही नहीं।
वहीं एक पीड़ित परिवार के मुखिया मोतिया का कहना है कि उनका झगड़ा नानूलाल और गोविन्द से था। हमें दौड़ा-दौड़ाकर भगाया। सब जान बचाकर भागे, वर्ना सबको मार डालते। मेरे घर में 10 बोरी गेहूं, 5 क्विंटल मक्का, एक क्विंटल चना और बेची गई फसल से आए 20 हजार रुपए नकद थे। सब जल गए। अब खाने के ही लाले पड़े हुए हैं।
बस्ती के वासी रूपलाल ने कहा, 'यह परम्परा बहुत गलत है। विवाद पर पंच-समाज बैठकर फैसला करे। प्रशासन, पुलिस व सरकार बैठी हुई है, लेकिन सीधे घरों पर हमला, आगजनी, मारपीट, जिन्दा पशु जला देना, यह सब अपराध है।'
वहीं पीड़ित राजमल का कहना है कि गेहूं, पैसे, गहने सबकुछ जल गया। खाने-पीने का भी कुछ नहीं बचा। झोंपड़ा भी गिर गया। अब रहने का कोई ठिकाना नहीं है। मैं कपड़े भी दूसरों से मांगकर पहन रहा हूं।
बस्ती के ही पीड़ित परिवार की महिला बबली ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि 25 साल पहले मैं शादी करके यहां आई थी, तब हमने घर बनाया। वह जलकर खत्म हो गया है। कुछ नहीं बचा।
पुरानी रंजिश के चलते गोविन्द मईड़ा की हत्या कटारा फला के नानूराम कटारा, विजय उर्फ रामेश्वर, अनिल, गणेश व कालूराम ने मिलकर कर दी थी। हत्या की त्वरित प्रतिक्रिया में मईड़ा फला के सैकड़ों लोग कटारा फला बस्ती में घुस गए और एक के बाद एक करीब 35 घर, दुकानें और बाड़ों को आग के हवाले कर दिया था।
हत्या के पांच, आगजनी के 48 आरोपी गिरफ्तार, सभी जेल में
गोविन्द की हत्या के आरोप में एक परिवार के पांच सदस्य व सगे-सम्बंधी और लूटपाट-आगजनी के आरोप में दूसरे पक्ष के करीब 48 लोगों की अलग-अलग गिरफ्तारियां हुईं। ये तमाम आरोपी अब भी जेल में बंद हैं।
बांसवाड़ा के कलक्टर डॉ. इन्द्रजीत सिंह यादव ने कहा कि आगजनी से हुए नुकसान का मामला प्राकृतिक आपदा का नहीं है। यह आपराधिक घटना थी, जिसमें आमतौर पर सरकारी आर्थिक मदद का प्रावधान नहीं होता है। अगर सहायता को लेकर कोई अदालती आदेश जारी होता है तो मदद सम्भव है। जहां तक पुनर्वास की बात है, हम लोगों से लौटने की अपील कर रहे हैं। हरसम्भव प्रयास जारी हैं।
बांसवाड़ा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नरपत सिंह रावल का कहना है कि पुनर्वास को लेकर दो बार दोनों पक्षों में दो बार वार्ता करवाई है, लेकिन उनमें सहमति नहीं बन पाई है। यदि परिवार लौटकर आत हैं, पुनर्वास होता है तो संबंधित पक्ष को पुलिस की ओर से पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में प्रचलित एक पुरानी सामाजिक कुप्रथा है, जो मुख्यत: मौताणा से जुड़ी है। बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में इसका असर है। किसी व्यक्ति की हत्या, दुर्घटना या अप्राकृतिक परिस्थितियों में मौत पर मृतक पक्ष किसी दूसरे व्यक्ति या परिवार को जिम्मेदार मान लेता है। घटना की प्रतिक्रिया में या मौताणे की रकम वसूली के तौर पर लोग बड़ी संख्या में आरोपी पक्ष के घर या गांव पर सामूहिक चढ़ाई करते हैं, जिसे चढ़ोतरा कहा जाता है।
सामाजिक तर्क है कि पुराने समय में जब औपचारिक न्याय-व्यवस्था और पुलिस-प्रशासन की पहुंच सीमित थी, तब समुदाय अपनी पंचायत के जरिए हत्या या अप्राकृतिक मौत से पैदा विवाद को सुलझाता था। मृतक के परिवार को आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए आरोपी पक्ष से मुआवजा दिलाने की व्यवस्था विकसित हुई। शुरुआती दौर में मुआवजे में पशुधन और बाद में नकद राशि का चलन हुआ। कई जगह यह सामाजिक न्याय परंपरा बदलकर आर्थिक दबाव और हिंसा का जरिया बन गई।
अगस्त, 2019 : बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ क्षेत्र के डूंगरा मार्ग पर सडक़ हादसे में बच्चे की मौत के बाद ग्रामीणों ने पथराव व आगजनी की। पुलिस पर भी हमला, हवाई फायर हुए। 32 नामजद समेत 100-150 लोगों पर केस।
मार्च, 2022 : बांसवाड़ा के टिमेड़ा बड़ा (कुशलगढ़) में आपसी मारपीट में युवक दलसिंह की मौत के बाद मृतक पक्ष ने आरोपियों के मकानों में तोडफ़ोड़ कर आग लगा दी। 25 लोग वारदात में शामिल थे।
10 अगस्त, 2023 : डूंगरपुर में एक युवक की मौत के बाद परिजनों ने आरोपी पक्ष के घर चढ़ोतरा किया। तोड़फोड़, सामान बाहर निकालकर आग लगा दी। परिवार ने खेत में छिपकर जान बचाई।
7 अगस्त, 2025 : बांसवाड़ा के पाटन क्षेत्र में युवक लक्ष्मण की मौत के बाद मौताणे को लेकर विवाद। 25-30 हथियारबंद लोगों पर घर में घुसकर तोड़फोड़, मारपीट और आगजनी की। 8 लोग को गिरफ्तार हुए।
26 अप्रेल, 2026 : बांसवाड़ा के कटारा फला में गोविन्द मईड़ा की हत्या के बाद करीब 35 घर व बाड़े जला दिए।
मई, 2026 में डूंगरपुर के हड़मतिया-दोवड़ा की युवती को एक युवक की ओर से साथ ले जाने से नाराज परिजनों ने रात में युवक के घर धावा बोल घर जला दिया। घर का सामान व अनाज जल गया। अधिकांश आरोपी पकड़ लिए गए।
जुलाई, 2020 : डूंगरपुर कराड़ा-डोली रोतवड़ा, सागवाड़ा क्षेत्र 100 से अधिक हथियारबंद ग्रामीणों ने कराड़ा गांव पर चढ़ोतरा किया। आरोपी बताए दो युवक नहीं मिले तो उनके पिता को बंधक बनाकर अपने गांव ले गए।
30, जून 2004 : गउपीपला (उदयपुर) में दीपू पारगी की मौत के बाद मृतक पक्ष की भीड़ ने आरोपी पक्ष के 16 घरों को लूटकर उनमें आग लगा दी। पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने गोली चलानी पड़ी। एक आदिवासी की मौत हो गई थी। उग्र भीड़ ने डीएसपी की जीप में आग लगा दी और थानाधिकारी पर तीर से हमला कर उसे घायल कर दिया था। घटना की गूंज संसद तक पहुंची थी।
चढ़ोतरा प्रथा सामूहिक तौर पर कोई बड़ा फैसला अब तक नहीं होने के कारण जिन्दा है। शिक्षा व जनजागृति इसके मूल कारण हैं। कानून तो सभी को पता है, मगर पुरानी मानसिकता के लोग न्याय व्यवस्था को नहीं स्वीकारते। एक जाजम पर लोग नहीं बैठ पा रहे हैं। मानवीय संवेदनाएं भी कमजोर पड़ी हुई हैं। - डॉ. लक्ष्मण परमार, प्रोफेसर, मामा बालेश्वर दयाल महाविद्यालय, कुशलगढ़, (बांसवाड़ा)
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के मानव विकास और पारिवारिक अध्ययन विभाग में एमेरिटस प्रोफेसर डॉ. गायत्री तिवारी ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि आदिवासियों का जीवन सदियों से जंगल के करीब रहा है। उन्हें चीजें आसानी से उपलब्ध नहीं हुई, संघर्षों या छीनने से मिली है। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने कानून बनाए। बस्तियों में सदियों तक उनका अपना कानून रहा, जिसकी झलक आज भी देखने को मिलती है। न्यायपालिकाएं हैं, लेकिन न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती है, जिससे कई बार उन्हें भरोसा कम होता है। ऐसे में लोग खुद ही न्याय करना चाहते हैं, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। अपराध के बाद उन्हें पछताना भी पड़ता है। शिक्षा और संवेदनशीलता का अभाव, न्याय में देरी तथा डर कायम करने की प्रवृत्ति ऐसी घटनाओं के पीछे बड़ी वजह होती है। हमें संवेदनशीलता विकसित करनी होगी। इंसान को इंसान समझने की भावना बढ़ानी होगी। उन्हें भी धैर्यवान व संवेदनशील बनाया जाए। सुधार के अवसर भी देने की व्यवस्था होनी चाहिए।