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Tribal Story: बांसवाड़ा के इस आदिवासी इलाके में आज भी बनते हैं तीर-कमान, गोफण और गुलेल

Tribal Story : राजस्थान के बांसवाड़ा के आदिवासी इलाके में आज भी तीर और कमान बनाए जाते हैं। इस समाज को तीरगर समाज के नाम से पहचाना जाता है। इनके बनाए तीर और कमान से सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, नेता भी निशाना साधते हैं। रईस लोग घर की दीवारों पर इसे सजावट के तौर पर इस्तेमाल में लाते हैं। जितेंद्र पालीवाल अपनी खास रिपोर्ट में यह बता रहे हैं कि इन्हें सरकारी मदद की क्यों दरकार है।
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Oct 12, 2026
Banswara Tribal
बांसवाड़ा के आदिवासी आज भी तीर-कमान बनाकर किसी तरह जीवनयापन करते हैं। (Photo: Rajasthan Patrika, Designed: ChatGpt)

Tribal Story : तीर-कमान, गोफण-गुलेल… ये वे पारम्परिक हथियार हैं, जिन्हें इंसान ने सदियों पहले ईजाद किया, युद्धों और आत्मरक्षा में इस्तेमाल करते रहे, मगर हैरतअंगेज कि ये प्राचीन हथियार आज भी आदिवासी अंचल वागड़ के बांसवाड़ा जिले में बनते हैं, बिकते और इस्तेमाल भी हाेते हैं। ये प्राचीन हथियार कला का उम्दा नमूना भी हैं।

इनके बनाए हथियार प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति को किए जा चुके भेंट

बांसवाड़ा शहर से करीब 15 किमी दूर उदयपुर रोड पर चंदूजी का गढ़ा में तीरगर समाज के करीब 20 परिवारों की रोजी-रोटी इसी से चलती है। पूरी तरह परम्परागत ढंग से लकड़ी से बने ये तीर-कमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं को वागड़ आगमन पर भेंट किया जा चुके हैं।

तीर-कमान बनाने की कलात्मक निपुणता ने चंदूजी का गढ़़ा को पहचान तो दी है, लेकिन सरकारी प्रोत्साहन न मिलने का मलाल यहां के कारीगरों को है। बांस और अन्य प्रकार की लकडिय़ों से तीर-कमान बनाए जाते हैं।

सुरक्षा, शिकार और सजावट में होता इस्तेमाल

जंगलों में रहते आदिवासी जानवरों और इंसानी हमलों से सुरक्षा के लिए तीर-कमान का इस्तेमाल करते रहे हैं। आज भी उनके घरों में यह भीली हथियार मिल जाता है। मौजूदा दौर में एलीट क्लास के लोग आलीशान घर की दीवार पर सजाने के लिए भी इसे खरीदते हैं।

विद्यार्थी सीखते हैं आर्चरी, कई ओलंपियन-राष्ट्रीय तीरंदाज निकले

बांसवाड़ा-डूंगरपुर के शहर, गांव-कस्बों में जनजाति विद्यार्थी परम्परागत तीर-कमानों से सीखतें हैं। दक्षिण राजस्थान से ओलंपियन लिम्बाराम, धूलचंद डामोर, श्यामलाल मीणा, नंदकिशोर रावत, धनेश्वर मईड़ा, वकीलराज डिंडोर, सुरेश खडिय़ा, लालसिंह निनामा, नरेश डामोर, जयंतीलाल ननोमा जैसे कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज निकले।

100 से 3000 रुपए तक कीमत

बनावट व गुणवत्ता के मुताबिक धनुष-बाण 100 रुपए से लेकर 3000 रुपए तक की कीमत के होते हैं। बच्चों के लिए छोटे धनुष, फैशनेबल सजावटी व तीरंदाजी प्रशिक्षण के लिए अच्छी गुणवत्ता के धनुष-बाण बनाए जाते हैं। बाण भी कई तरह के बनते हैं।

युवा कारीगरों का रुझान कम

युवा कारीगर हिमांशु व मणिलाल तीरगर बताते हैं कि 300 परिवार हैं, लेकिन मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम होने से आज कल के युवा इस कला से विमुख हो रहे हैं। अब केवल 15-20 परिवार रह गए, जो इस कला को जिन्दा रखे हुए हैं।

क्या कहते हैं कारीगर

चंदूजी का गढ़ा के कारीगर शंकरलाल तीरगर ने पत्रिका से बातचीत अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हथियार बनाने के बाद बेचने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है। वागड़ के परम्परागत मेलों बेणेश्वर धाम, घोटिया आम्बा मेला, गौतमेश्वर मेला आदि में जाकर बेचते हैं। घर पर एवं सड़क किनारे भी दुकान लगाते हैं।

Updated on:
12 Oct 2026 11:36 am
Published on:
12 Oct 2026 11:36 am