
Women Guest Editor: एक छोटी-सी पहल जब बड़े बदलाव का माध्यम बनती है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति या व्यवसाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के कई परिवारों की जिंदगी में नई संभावनाएं पैदा करता है। दुर्ग की महिला उद्यमी नीति बल्लेवार ने खादी को आधुनिक फैशन से जोड़कर इसी सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास किया है। कभी बुजुर्गों और औपचारिक वेशभूषा तक सीमित मानी जाने वाली खादी को उन्होंने नए रंग, आकर्षक डिजाइन और समकालीन अंदाज के साथ युवाओं की पसंद बनाने की दिशा में काम किया।
दुर्ग के इंदिरा मार्केट स्थित अपने प्रतिष्ठान के माध्यम से नीति बल्लेवार हैंडलूम और खादी वस्त्रों का कारोबार कर रही हैं। उनके यहां खादी के साथ आंध्रप्रदेश की प्रसिद्ध पोचमपल्ली, मंगलगिरी और छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कोसा वस्त्रों की विविध रेंज उपलब्ध है। इस कारोबार की खासियत यह है कि यहां पारंपरिक भारतीय वस्त्रों को केवल उनकी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि बदलते फैशन और ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप भी प्रस्तुत किया जाता है। यही सोच खादी को नए उपभोक्ताओं से जोड़ने और पारंपरिक बुनाई को व्यावसायिक अवसर में बदलने का माध्यम बन रही है।
परंपरा को आधुनिक फैशन से जोड़ने की सोच: नीति बल्लेवार का मानना है कि खादी महज पहनने का कपड़ा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और भारतीय कारीगरी की पहचान है। जरूरत इस बात की है कि इसे बदलते समय के साथ नए रूप में लोगों के सामने लाया जाए। आज फैशन के प्रति जागरूक युवा ऐसे परिधानों की तलाश में रहते हैं, जिनमें अपनी पसंद के साथ भारतीय संस्कृति और स्थानीय कारीगरी की झलक भी हो। खादी इस जरूरत को पूरा करने की क्षमता रखती है। नीति की कोशिश इसी संभावना को बाजार में पहचान दिलाने की है।
पुरुष प्रधान कारोबार में बनाई अलग पहचान: महिला उद्यमी के रूप में नीति बल्लेवार का सफर आसान नहीं रहा। कपड़ा कारोबार को लंबे समय तक पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत, व्यवहार कुशलता और गुणवत्ता पर ध्यान देकर इस क्षेत्र में अलग पहचान बनाई। व्यवसाय को आगे बढ़ाने में उनके पति अनिल बल्लेवार और परिवार का भी भरपूर सहयोग मिला। आज वे दुर्ग-भिलाई की उन महिला उद्यमियों में शामिल हैं, जिन्होंने कारोबार के साथ सामाजिक और व्यावसायिक संगठनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। महिला चेंबर ऑफ कॉमर्स में पदाधिकारी के रूप में उनकी पहचान है।
बुनकरों को मिल रहा बाजार: हथकरघा और खादी से जुड़े बुनकरों के सामने अपने उत्पादों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाना एक महत्वपूर्ण चुनौती रहती है। बदलते फैशन, मशीन से बने कपड़ों की प्रतिस्पर्धा और बाजार की मांग के बीच पारंपरिक बुनाई को पहचान दिलाना आसान नहीं है। ऐसे में नीति बल्लेवार का प्रयास पारंपरिक वस्त्रों के लिए नए ग्राहक तैयार करने पर केंद्रित है।
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Updated on:
11 Oct 2026 02:13 am
Published on:
11 Oct 2026 02:13 am
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