
Unique Offerings in Rajasthan Temples : भगवान के दरबार में आमतौर पर लड्डू, पेड़ा, मिठाई, नारियल या फल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन लोक आस्था की दुनिया भी कम दिलचस्प नहीं है। यहां अलग-अलग मनोकामनाओं से जुड़े अलग-अलग चढ़ावे की अपनी परंपराएं हैं। विदेश जाने की इच्छा पूरी हुई तो हवाई जहाज (खिलौना) चढ़ा दिया। पढ़ाई में सफलता मिली तो पेन-किताब भेंट कर दी। किसी बच्चे की बोलने की समस्या दूर होने की मनौती मानी तो तोता (खिलौना) चढ़ाया।
व्यापार में मुनाफा हुआ तो चांदी का ट्रैक्टर या दूसरी वस्तु भेंट कर दी। कहीं नमक-झाड़ू चढ़ाए जाते हैं, कहीं प्याज-चने, तो कहीं बंधन से मुक्ति की मन्नत पूरी होने पर हथकड़ी और बेड़ियां तक भगवान के दरबार में पहुंचती हैं। यानी जैसे अलग-अलग जरूरतों के लिए विशेषज्ञ होते हैं, वैसे ही लोक आस्था में भी कुछ देवस्थलों की पहचान खास मनोकामनाओं से जुड़ी हुई है। वहां मन्नत पूरी होने पर चढ़ावा भी उसी इच्छा या मान्यता से जुड़ा होता है। इन जगहों पर चढ़ने वाली चीजें महज वस्तुएं नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की पूरी हुई इच्छा से जुड़ी कहानी कहती हैं। किसी के सपनों ने पंख लगाए तो हवाई जहाज चढ़ा, किसी ने बंधन से मुक्ति की मन्नत मानी तो हथकड़ी-बेड़ियां भेंट कीं और किसी के कारोबार में बरकत हुई तो चांदी का ट्रैक्टर भगवान के दरबार में आ गया। इन अनूठे चढ़ावों के पीछे स्थानीय मान्यताएं और वर्षों से चली आ रही परंपराएं हैं, जो लोक आस्था के अलग-अलग रंग दिखाती हैं।
श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ क्षेत्र के ढाबां झलार गांव का पड़पाटा धाम आस्था की अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु नमक और झाड़ू चढ़ाते हैं। खासकर अमावस्या पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और तालाब के आसपास नमक-झाड़ू का चढ़ावा दिखाई देता है। धाम से जुड़े लोगों के अनुसार एक दिन में करीब दो क्विंटल तक झाड़ू एकत्र हो जाती हैं।
भीलवाड़ा-चित्तौड़गढ़ सीमा पर स्थित जोगणियां माता शक्तिपीठ में मन्नत पूरी होने पर हथकड़ी, बेड़ियां और लोहे की जेल जैसी आकृतियां चढ़ाने की अनूठी परंपरा है। स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ श्रद्धालु जेल से रिहाई, कानूनी परेशानी से मुक्ति अथवा अन्य मनोकामना के लिए माता से मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर हथकड़ी या बेड़ियां भेंट की जाती हैं।
हनुमानगढ़ के गोगामेड़ी स्थित लोकदेवता गोगाजी के मंदिर में प्याज और चने अथवा दाल चढ़ाने की अनूठी परंपरा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब एक हजार साल पहले गोगाजी के सैनिक जब गायों और क्षेत्र की रक्षा के लिए युद्ध करते थे, तब प्याज और चना उनका प्रमुख भोजन हुआ करता था। सैनिक और उनके साथ रहने वाले लोग यही सामग्री अपने साथ रखते और अर्पित करते थे। भाद्रपद के मेले में श्रद्धालु सैकड़ों क्विंटल प्याज और अनाज चढ़ाते हैं।
सिरोही जिले के पिंडवाड़ा के पास अजारी गांव के माकड़ेश्वर धाम स्थित मां सरस्वती मंदिर में बच्चों की वाणी, शिक्षा और बुद्धि के लिए मन्नत मांगने की परंपरा है। बोलने में परेशानी, हकलाने या पढ़ाई में कमजोरी से जूझ रहे बच्चों के लिए श्रद्धालु यहां मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर पेन, कॉपी, पुस्तक और पेंसिल चढ़ाई जाती है। वाणी संबंधी समस्या दूर होने की मान्यता के साथ कुछ श्रद्धालु चांदी की जीभ भी अर्पित करते हैं।
चित्तौड़गढ़ के मंडफिया में सांवलिया सेठ को व्यापारी अपना बिजनेस पार्टनर यानी व्यापारिक साझेदार मानते हैं। नए काम की शुरुआत या मुनाफा होने पर श्रद्धालु अपनी कमाई का तय हिस्सा या पहली कमाई श्रद्धा के रूप में मंदिर की हुंडी में समर्पित करते हैं। यहां व्यापार से जुड़े बिजनेस कार्ड, बायोडाटा, रेज्यूमे और भगवान के नाम लिखे पत्र भी चढ़ाए जाते हैं। इसके अलावा चांदी की हथकड़ी, चांदी का दिल और चांदी का ट्रैक्टर जैसी वस्तुएं भी भेंट की गई हैं।
जोधपुर जिले के बिलाड़ा क्षेत्र के हूण गांव स्थित महादेवजी यानी जोगेश्वर भगवान के मंदिर में हर सोमवार श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यहां ऐसी मान्यता है कि मंदिर की फेरी लगाने से शरीर के मस्से दूर हो जाते हैं। इसी मान्यता के चलते आसपास के गांवों के अलावा कई शहरों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। कुछ श्रद्धालु झाड़ू भी चढ़ाते हैं। मंदिर समिति की ओर से यहां दाना भंडार भी बनाया गया है, जहां लोग गेहूं, मक्का और बाजरा लेकर पहुंचते हैं। यह अनाज पक्षियों के लिए बनाए गए दाना पात्रों में डाला जाता है और जरूरत के अनुसार अन्य स्थानों पर भी भेजा जाता है।
राजस्थान के पड़ोसी पंजाब के जालंधर से करीब 12 किलोमीटर दूर तल्हण गांव का बाबा निहालसिंह गुरुद्वारा अपनी अनोखी परंपरा के लिए चर्चित है। यहां विदेश जाने की मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु खिलौना हवाई जहाज प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। दुकानदारों के अनुसार यहां रोजाना करीब 300 से 600 तक खिलौना हवाई जहाज चढ़ाए जाते हैं। बाद में इन्हें बच्चों को प्रसाद के रूप में दे दिया जाता है। इसी तरह पंजाब के मानसा-सिरसा रोड स्थित ‘तोते वाला डेरा’ बाबा भाई गुरदास की समाधि के रूप में प्रसिद्ध है। डेरे में बने एक पवित्र कुंड के पानी को लेकर मान्यता है कि इसे पीने से बोलने में परेशानी वाले बच्चों को लाभ होता है। इस मान्यता के तहत बच्चे के ठीक होकर साफ बोलने लगने पर लकड़ी या अन्य सामग्री से बने खिलौना तोते यहां चढ़ाए जाते हैं।