CG News: परंपरागत तरीके से मसाले पीसने के लिए सील-लोढ़ा का उपयोग किया जाता है, जिसमें हाथों की मेहनत के साथ मसालों की खुशबू और स्वाद भी बरकरार रहता है।
CG News: आधुनिक रसोई में जहां मिक्सर-ग्राइंडर और इलेक्ट्रिक मशीनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, वहीं पारंपरिक रसोई उपकरण धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। ऐसे समय में सोरी परिवार अपनी पुरखों की विरासत को संजोते हुए आज भी सील-लोढ़ा, जांता और मुसर जैसी पारंपरिक वस्तुओं को संभालकर रखे हुए है और इनके उपयोग की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहा है।
इसी बदलते दौर में एक परिवार ऐसा भी है जो इन पारंपरिक उपकरणों की विरासत को संजोकर रखने का प्रयास कर रहा है। सोरी परिवार अपनी रसोई में आज भी सील-लोढ़ा, जांता और मुसर का उपयोग करता है और नई पीढ़ी को इनके महत्व से परिचित करा रहा है। परिवार का मानना है कि इन उपकरणों से तैयार होने वाला मसाला और अनाज का स्वाद अलग ही होता है, जो आधुनिक मशीनों से संभव नहीं हो पाता।
परंपरागत तरीके से मसाले पीसने के लिए सील-लोढ़ा का उपयोग किया जाता है, जिसमें हाथों की मेहनत के साथ मसालों की खुशबू और स्वाद भी बरकरार रहता है। वहीं जांता में अनाज पीसने की परंपरा कभी गांवों की पहचान हुआ करती थी। इसी तरह मुसर में धान कूटना या मसाले तैयार करना भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा है।
सोरी परिवार का कहना है कि ये उपकरण सिर्फ रसोई के साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा की पहचान हैं। इन्हें सहेजकर रखने से आने वाली पीढ़ियों को भी अपने पूर्वजों के जीवन और खान-पान की परंपराओं को समझने का अवसर मिलेगा। आज जब तेज रफ्तार जीवन में सुविधाजनक मशीनों का चलन बढ़ गया है, ऐसे में सोरी परिवार का यह प्रयास पारंपरिक रसोई संस्कृति को बचाने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल माना जा रहा है।
महेंद्र कुमार सोरी बताते हैं कि सील और लोढ़ा को मां-बेटे का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इन्हें एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग दिया जाता है। मेहनत भरी निर्माण प्रक्रिया सील बनाने के लिए विशेष प्रकार का पत्थर मंगवाया जाता है, जो महासमुंद और डोंडी लोहारा क्षेत्र से आता है. पहले पत्थर को काटा जाता है, फिर छैनी-हथौड़े से तराशकर आकार दिया जाता है।
विवाह संस्कार में विशेष महत्व
छत्तीसगढ़ी परंपरा में सील- लोढ़ा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. विवाह संस्कार में टीकावन के रूप में सील देना शुभ माना जाता है. स्थानीय पुजारी पं. सुरेश सावर्णी के अनुसार, बड़े विवाह संस्कारों में भांवर की रस्म के दौरान भी सील का प्रतीकात्मक उपयोग किया जाता है।
एक सील तैयार करने में लगभग एक से दो घंटे का समय लगता है। इसकी कीमत 1000 से 1500 रुपए तक होती हैं। फेरी लगाकर बेचते हैं उत्पाद महेंद्र गांव-गांव फेरी लगाकर अपने उत्पाद बेचते हैं। पाटन के अलावा अभनपुर, रायपुर, भिलाई और धमतरी सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में भी उनकी पहुंच है।