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अनोखा बाजार : पैदल आने वाला ग्राहक भूतल, घोड़ेवाला दूसरी और हाथी- ऊंट वाला तीसरी मंजिल से करता था शॉपिंग

अजीत शुक्ला की पत्रिका स्पेशल रिपोर्ट : भारत के एक अनोखे बाजार की कहानी पढ़िए। जहां घोड़े-हाथी पर बैठकर होती थी खरीदारी, बहुमंजिला दुकानों में आज भी इतिहास जिंदा है।
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Sep 28, 2026
sironj madhya pradesh history
सिरोंज बाजार | Credit- Patrika

विदिशा. जिले के सिरोंज नगर का मुख्य बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि नगर की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और बीते समय की जीवंत कहानी है। कहा जाता है कि सदियों पूर्व ग्राहकों की सुविधा को ध्यान में रखकर इस बाजार का निर्माण किया गया था। उस दौर में जब बड़े शहरों में बहुमंजिला दुकानों की कल्पना भी आधुनिकता का प्रतीक मानी जाती थी, सिरोंज के इस प्राचीन बाजार में तीन मंजिला दुकानों की अनूठी व्यवस्था देखने को मिलती थी। आज भी इन ऐतिहासिक दुकानों के अवशेष अतीत की भव्यता की झलक दिखाते हैं। हालांकि बदलते समय और आधुनिक निर्माण के बीच इस बाजार का स्वरूप अब काफी बदल गया है। लेकिन इनसे जुड़ी विरासत आज भी सिरोंज की पहचान को जीवंत बनाए हुए है।

बही खातों में चलती थी उधारी, अब डिजिटल भुगतान

कभी यहां बाजार में कारोबार नकद और बही-खातों में दर्ज उधारी से चलता था, वहीं आज मोबाइल की घंटी के साथ डिजिटल भुगतान की रसीद निकलती है। खरीदारी के तौर-तरीके बदले, व्यापार आधुनिक हुआ, लेकिन दुकानदार और ग्राहक के बीच पीढ़ियों से चला आ रहा भरोसा आज भी बाजार की सबसे बड़ी पूंजी है। कपड़ा, सराफा सहित विभिन्न कारोबार की सैकड़ों दुकानों वाले इस बाजार में कई प्रतिष्ठान ऐसे हैं, जहां कारोबार की कमान एक ही परिवार की चौथी-पांचवीं पीढ़ी संभाल रही है। कपड़ा कारोबारी और सिरोंज व्यापार महासंघ के अध्यक्ष अर्पित मित्तल भी पांचवीं पीढ़ी के कारोबारी हैं। वे बताते हैं कि यहां केवल दुकानदारों की पीढ़ियां नहीं बदलीं, ग्राहक भी पीढ़ियों से वही हैं। जिस दुकान पर दादा, परदादा खरीदारी करते थे, वहीं आज पोते भी पहुंचते हैं। पुराने बही-खातों में दर्ज उधारी के पन्ने इस भरोसे की कहानी कहते हैं। अब हिसाब मोबाइल में दर्ज होता है, भुगतान ऑनलाइन होता है, मगर संबंध अब भी दिल में दर्ज हैं। यही भरोसा सिरोंज के बाजार को सिर्फ व्यापार की जगह नहीं, बल्कि शहर की जीवंत कारोबारी विरासत बनाए हुए है।

सदियों की कहानी कहता सिरोंज का प्राचीन बाजार

सिरोंज का प्राचीन बाजार केवल दुकानों की कतार नहीं, बल्कि शहर के इतिहास की वह जीवंत तस्वीर है, जिसकी दीवारों में सदियों की व्यापारिक परंपराएं आज भी सांस लेती हैं। समय बदला, आवागमन के साधन बदले और बाजार का स्वरूप भी बदलता गया, लेकिन इस ऐतिहासिक बाजार की पहचान आज भी कहीं न कहीं उसी दौर की याद दिलाती है। सिरोंज व्यापार महासंघ के पूर्व अध्यक्ष पदम ताम्रकार बताते हैं कि कभी यहां तीन मंजिला दुकानें व्यापारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं। पैदल आने वाला ग्राहक भूतल से, घुड़सवार दूसरी मंजिल से और हाथी या ऊंट की सवारी करने वाला ग्राहक ऊपरी मंजिल से सवारी पर बैठे-बैठे ही सामान खरीद सकता था। आज यह बात सुनने में भले ही किसी कहानी जैसी लगे, लेकिन बाजार की पुरानी बनावट इसके पीछे छिपे इतिहास की गवाही देती है।

नव ​निर्माण से बदल गई है तस्वीरें, झलक आज भी कायम

समय के साथ कई दुकानों का नव निर्माण हुआ और बाजार की मूल तस्वीर कुछ स्थानों पर बदल गई। शहर की सड़कें ऊंची होती गईं तो पुरानी दुकानों के भूतल जमीन के भीतर दबते चले गए। कहीं ये हिस्से तहखाने जैसे दिखाई देते हैं, तो कहीं केवल ऊपर की दो मंजिलें ही नजर आती हैं। लेकिन आज भी इन पुरानी दुकानों के सामने से गुजरना मानो इतिहास की गलियों में कदम रखना है। ये इमारतें सिरोंज से सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि उसकी विरासत और बीते समय की अनमोल कहानी कहती हैं।

एक ही बाजार, मंजिलें अलग व कारोबार भी अलग

सिरोंज का ऐतिहासिक बाजार आज भी अपने भीतर व्यापार की एक अनोखी परंपरा समेटे हुए है। यहां कई दुकानों की ऊपरी और निचली मंजिलों पर अलग-अलग कारोबार होते हैं। इतना ही नहीं, कुछ दुकानों की अलग-अलग मंजिलों का स्वामित्व भी अलग-अलग लोगों के पास है। यानी एक ही इमारत, मगर हर मंजिल की अपनी पहचान और अपनी कहानी अलग हो गई है। इन पुरानी दुकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिरोंज का बाजार अपने समय से कितना आगे रहा होगा। आज बड़े शहरों में बहुमंजिला व्यावसायिक इमारतें आधुनिक व्यापार की पहचान मानी जाती हैं, लेकिन सिरोंज में ऐसी व्यापारिक व्यवस्था की झलक कई दशक पहले ही दिखाई देती थी। बदलते समय ने बाजार की शक्ल जरूर बदली है। कई पुराने दुकानदार अब आधुनिक दुकानों का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन कुछ पुरानी मंजिलें आज भी अतीत की तस्वीर संभाले खड़ी हैं। इन दुकानों में सिर्फ सामान नहीं बिकता, यहां सिरोंज की व्यापारिक विरासत आज भी सांस लेती है।

Updated on:
28 Sept 2026 06:24 pm
Published on:
28 Sept 2026 06:23 pm