Sonam Wangchuk's Laddakh Struggle Story: सोनम वांगचुक की छह महीने बाद जोधपुर जेल से रिहाई हो गई है। उन्होंने यह संकेत दिया कि वह लद्दाख के लिए स्वायत्तता की मांग को लेकर सरकार के साथ सुलह का रुख अपनाने के लिए तैयार हैं। आइए जानते हैं कि वह लद्दाख को बचाने के लिए किन मुद्दों को लेकर संघर्षरत हैं।
Sonam Wangchuk's Struggle : सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) की छह महीने की हिरासत के बाद रिहाई हो चुकी है। सोनम वांगचुक ने जेल से बाहर आने के बाद यह संकेत दिया कि वह लद्दाख के लिए स्वायत्तता की मांग को लेकर सरकार के साथ सुलह का रुख अपनाने के लिए तैयार हैं। वांगचुक की रिहाई केंद्र द्वारा एनएसए आदेश को रद्द करने के बाद हुई, जिसके प्रावधानों के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था। आइए जानते हैं कि वांगचुक किस मुद्दे को लेकर संघर्ष कर रहे हैं?
सोनम वांगचुक लद्दाख के एक प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्र की पहचान, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी गंभीर समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। उनका आंदोलन केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं बल्कि लद्दाख के भविष्य, संस्कृति और पारिस्थितिकी से जुड़ा व्यापक सवाल बन चुका है।
What is Sixth Schedule? सोनम वांगचुक प्रमुख रूप से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता मिलती है, जिससे वहां के स्थानीय लोग अपने संसाधनों, भूमि और संस्कृति की रक्षा के लिए कानून बना सकते हैं। वांगचुक का मानना है कि लद्दाख की भौगोलिक, सांस्कृतिक और जनजातीय विशेषताओं को देखते हुए यह सुरक्षा बेहद आवश्यक है।
लद्दाख की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा जनजातीय समुदायों से संबंधित है। छठी अनुसूची लागू होने से इन समुदायों को अपनी परंपराओं, भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने में मदद मिलेगी। वांगचुक का कहना है कि अगर यह सुरक्षा नहीं मिली, तो आधुनिक विकास के दबाव में ये परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो सकती हैं।
भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने (Article 370 abrogation) के बाद जम्मू व कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा छिन गया। राज्य के दो हिस्से कर दिए गए। जम्मू कश्मीर को विधानसभा के साथ और लद्दाख को बगैर विधानसभा के अलग कर दिया गया। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। उस समय स्थानीय लोगों को यह उम्मीद जगी थी कि उन्हें जल्द ही संवैधानिक सुरक्षा मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद से ही स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ा और वांगचुक इस मांग के प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
लद्दाख का दूसरा बड़ा मुद्दा पर्यावरण संरक्षण का है। लद्दाख एक अत्यंत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र है, जहां जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दर्ज किया जा रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं और जिनके चलते जल स्रोत कम हो रहे हैं। इन सबके चलते पारंपरिक जीवनशैली पर खतरा बढ़ रहा है। वांगचुक विकास को गैरजरूरी नहीं बताते हैं। उनका कहना है कि बिना योजना के बड़े पैमाने पर विकास जैसे खनन, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पर्यटन का अत्यधिक विस्तार - इस नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकता है।
सोनम वांगचुक का मानना है कि लद्दाख को एक 'कार्बन-न्यूट्रल' और 'इको-फ्रेंडली' क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। वे चाहते हैं कि यहां के विकास की दिशा स्थानीय जरूरतों और पारंपरिक ज्ञान के अनुरूप तय हो, न कि केवल बाहरी आर्थिक हितों के आधार पर।
उन्होंने कई बार यह चेतावनी दी है कि अगर लद्दाख को कानूनी सुरक्षा नहीं मिली, तो बाहरी कंपनियां और बड़े उद्योग यहां की जमीन और संसाधनों का दोहन कर सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान दोनों पर खतरा पैदा होगा।
वांगचुक के अनुसार, लद्दाख के लिए तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है- 'राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक अधिकार'। वर्ष 2019 में 370 के निरस्त किए जाने के बाद लद्दाख को एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, लेकिन यहां विधानसभा नहीं है। इससे स्थानीय लोगों की नीति-निर्माण में भागीदारी सीमित हो गई है। वांगचुक और अन्य सामाजिक संगठनों की मांग है कि या तो लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए या फिर कम से कम ऐसी व्यवस्था हो जिससे स्थानीय लोगों की आवाज शासन में प्रभावी रूप से सुनी जा सके।
इन मांगों को लेकर वांगचुक ने कई शांतिपूर्ण आंदोलन किए हैं, जिनमें उपवास और जागरूकता अभियान शामिल हैं। उनका आंदोलन अहिंसक और प्रेरणादायक रहा है, जिसमें वे शिक्षा और संवाद के माध्यम से लोगों को जोड़ते हैं। वे अक्सर युवाओं को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए प्रेरित करते हैं।
वांगचुक का संघर्ष केवल विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने 'क्लाइमेट फास्ट' जैसे अभियानों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। इसके अलावा उन्होंने लद्दाख में जल संकट को दूर करने के लिए आइस स्तूप (Ice Stupa) तकनीक को बढ़ावा दिया।
What is Climate Fasting? सोनम वांगचुक का क्लाइमेट फास्टिंग एक अहिंसक आंदोलन है। इसके जरिए वे और उनके समर्थक जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए उपवास करते हैं। यह पहल खासकर लद्दाख के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए शुरू की गई। इसका उद्देश्य सरकार और समाज पर नैतिक दबाव बनाकर टिकाऊ विकास, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह आंदोलन जागरूकता बढ़ाने और शांतिपूर्ण तरीके से बदलाव लाने का प्रयास है।
What is Ice Stupa? सोनम वांगचुक ने लद्दाख को जल संकट से बचाने के लिए आइस स्तूप तकनीक तैयार किया। यह बौद्ध धर्म के पारंपरिक स्तूपों से प्रेरित है। इसमें सर्दियों में पाइप के जरिए ग्लेशियर या झरने का पानी ऊंचाई से नीचे लाकर शून्य तापमान में शंकु (स्तूप) के आकार में जमाया जाता है। यह आकार धूप के कम संपर्क में रहता है, जिससे बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है। गर्मियों में यही पिघला पानी खेतों की सिंचाई के लिए उपयोग होता है, जब प्राकृतिक जल स्रोत कम हो जाते हैं। यह सस्ती, पर्यावरण-अनुकूल और स्थानीय रूप से उपयोगी तकनीक है। वांगचुक के इस अद्भुत आविष्कार ने न केवल स्थानीय समुदायों द्वारा सामना की जा रही पानी की गंभीर कमी की समस्या का समाधान किया है, बल्कि लद्दाख की पर्यावरणीय चुनौतियों और इस क्षेत्र से उभर रहे अनूठे समाधानों की ओर वैश्विक ध्यान भी आकर्षित किया है।