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Winter snowfall reduced: हिमालय में कम बर्फबारी से सूख रही चोटियां, 2 अरब लोगों पर मंडराया खतरा, एक्सपर्ट्स ने पत्रिका को क्या बताया, पढ़िए

Snowfall Reduced in Himalaya: हिमालय में बर्फबारी कम होने से पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों से 12 नदी बेसिनों को पानी मिलता है। इनमें पानी खत्म होने से जीवन खतरे में पड़ सकता है। इस बारे में पत्रिका ने कई एक्सपर्ट्स से बात की। आइए पढ़ते हैं विस्तृत रिपोर्ट।

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Shortage of Snowfall in Himalaya

हिमालय में हिमपात की लगातार कमी दर्ज की जा रही है।

Winter snowfall reduced in Himalaya : हिमालय की चोटियां इस साल जनवरी के महीने में अब तक बर्फ से मुक्त रही हैं। यह एक जलवायु विसंगति का संकेत है और यह चिंता का कारण बन सकती हैं। उत्तर पश्चिमी हिमालय में हिमपात (Snowfall Shortage in North West Himalaya) पिछले पांच वर्षों में 40 वर्षों के दीर्घकालिक औसत (1980-2020) की तुलना में 25% कम हो गया है। नेपाल (No Snowfall in Nepal Himalaya) में अक्टूबर से लेकर अब तक बिल्कुल भी बारिश (हिमपात) नहीं हुई है।

Environment Report : इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024-2025 की सर्दियों में बर्फ की निरंतरता सामान्य से लगभग 24% कम रही, जो पिछले 23 वर्षों का रिकॉर्ड है।

इसमें कहा गया है कि 2020 और 2025 के बीच पिछली पांच सर्दियों में से चार में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में सामान्य से कम बर्फबारी (Reduced Snowfall in Hindukush Himalaya) हुई।

उत्तराखंड के निवासी राजेश डोबरियाल का कहना है कि सिर्फ गढ़वाल में ही नहीं बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र के पहाड़ों में बर्फबारी कम हो रही है। उनका कहना है कि यह इस साल की बात नहीं है। ऐसा लगातार हो रहा है। पिछले साल ओम पर्वत पर बर्फ से बनी 'ऊं' की आकृति गायब हो गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि हमारे गांवों के कई बुजुर्ग बताते हैं कि जिन पहाड़ों पर अपनी जवानी और दो-तीन दशक पहले बर्फ देखी, अब वो गंजे हो चले हैं।

पांच सालों में औसत हिमपात में आई कमी

मौसम विज्ञानियों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में अधिकांश सर्दियों में औसत हिमपात में गिरावट देखी गई है और यह 1980 और 2020 के बीच के औसत हिमपात की तुलना में कम है। भारतीय मौसम विभाग ने दिसंबर में उत्तरी भारत के लगभग सभी हिस्सों में वर्षा और हिमपात जैसी कोई घटना दर्ज नहीं की। मौसम विभाग का कहना है कि उत्तर-पश्चिमी भारत के कई हिस्सों, जिनमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं, में जनवरी से मार्च के बीच लंबी अवधि के औसत (Long Period Average) वर्षा और हिमपात से 86% कम बारिश होने की संभावना जताई है।

क्या होता है एलपीए?

एलपीए किसी क्षेत्र में 30 से 50 वर्षों में दर्ज की गई वर्षा या बर्फबारी है और इसके औसत का उपयोग वर्तमान मौसम को सामान्य, अधिक या कम के रूप में वर्गीकृत करने के लिए किया जाता है। मौसम विभाग के अनुसार, 1971 से 2020 के बीच उत्तर भारत में एलपीए (LPA) में औसत वर्षा 184.3 मिलीमीटर थी।

'हिमालय क्षेत्र में बारिश की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी'

नेटवर्क साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल, एसएनडीआरपी से जुड़े हिमांशु ठाकुर ने पत्रिका से बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसके चलते हिमालय के ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है। इसके साथ ही हिमपात में काफी कमी दर्ज की जा रही है। वह बताते हैं कि एक और चीज हिमालय क्षेत्र में यह देखी जा रही है कि बारिश की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

बर्फबारी कम होने से क्या नुकसान होगा?

हिमांशु इस सवाल के जवाब देते हुए कहते हैं, 'बर्फबारी कम होने से हिमालय में बर्फ के स्टॉक में लगातार कमी आ रही है। इसका असर यह होगा कि गर्मी के दिनों की संख्या में लगातार इजाफा होगा। गर्मी की तीव्रता में भी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी। इसके साथ ग्लेशियर पिघलने की दर कम होती चली जाएगी और नतीजा यह होगा कि गर्मियों में नदियों को जल मिलना बंद हो जाएगा। इसका नतीजा यह होगा कि भूजल संकट से लेकर खेतों को सींचने के लिए पानी कम पड़ जाएगा। पानी की कमी पेयजल संकट को बढ़ाने का काम करेगा। इसका असर पनबिजली पर पड़ेगा। इसका असर हिमालय की जैव विविधता पर पड़ेगा। भविष्य में यह बढ़ता ही जाएगा।

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'भूस्खलन जैसी घटनाओं में होगा इजाफा'

उनका कहना है कि ग्लेशियरों के लुप्त होने और हिमपात में कमी से पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं क्योंकि वे बर्फ और हिम खो देते हैं जो उन्हें एकाग्र रखने वाले सीमेंट की तरह काम करते हैं। हिमपात में कमी आने से चट्टान गिरने, भूस्खलन, हिमनदी झीलों के फटने और विनाशकारी मलबा प्रवाह जैसी आपदाएं पहले से ही अधिक आम होती जा रही हैं।

'हिमपात की कमी ने अगर मानसून को प्रभावित किया तो मचेगी तबाही'

एक रिपोर्ट के अनुसार हिमालय ग्लेशियर से तर होने वाले एक दर्जन से ज्यादा नदी बेसिन से 2 अरब लोगों का जीवन आबाद है। क्या हिमपात कम होने से इतनी बड़ी आबादी का जीवन संकट में पड़ जाएगा, इस सवाल के जवाब में दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय ने पत्रिका से बताया कि हिमपात में कमी आना गंभीर चिंता की बात है लेकिन इससे 25-50 सालों में फर्क नहीं पड़ने वाला। लेकिन, हिमपात की कमी मानसून पर प्रभाव डालती है तो तबाही मचेगी। धरती पर मानसून ही पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। करीब 80 फीसदी पानी मानसून से हासिल होता है।

गंगा से ब्रह्मपुत्र तक की नदियों में पानी कहां से आता है?

पर्यावरण के जानकार सोपान जोशी ने पत्रिका से बताया कि हिमालय में बर्फ पिघलने से नदियां सदानीरा बनती हैं। ग्लेश्यिर पिघलने से नदियों में गर्मी के मौस में भी पानी रहता है। हिमपात कम होने से गर्मी में नदियों में पानी कम होगा। दक्षिण की नदियों में पानी बारिश और जंगल के प्रभाव से आता है, इसलिए उनमें गर्मी में पानी कम हो जाता है। छोटी नदियां गर्मी में सूख जाती हैं, बारिश में तर होती हैं। वहीं दक्षिण की नदियों में पानी बारिश और जंगल के प्रभाव से आता है, इसलिए उनमें गर्मी में पानी कम हो जाता है। छोटी नदियाँ गर्मी में सूख जाती हैं, बारिश में तर होती हैं।

राजस्थान विश्वविद्यालय में भू-विज्ञान विभाग से रिटायर हो चुके प्रो. मनोज पंडित ने हिमालय में हिमपात की कमी को रेखांकित करते हुए कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के सतह का तापक्रम बढ़ गया है जिसके चलते हिमालय के ग्लेशियर सिकुड़ते चले जा रहे हैं। ग्लेशियर सिकुड़ने का मतलब समझाते हुए वह बताते हैं कि 500 मीटर ऊंचे पहाड़ में अगर पहले आपको 100 मीटर पर बर्फ दिखाई देता था और अब 150 मीटर पर बर्फ दिख रहा है तो इसका मतलब ग्लेशियर 50 ​मीटर सिकुड़ चुका है।

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'जंगल की आग का खतरा भी बढ़ता जाएगा'

वह बताते हैं कि हिमपात में कमी से जल आपूर्ति प्रभावित होगीं। इसके चलते सर्दियों में कम वर्षा (मैदानी इलाकों में बारिश और पहाड़ों पर बर्फबारी) का मतलब यह भी है कि शुष्क परिस्थितियों के कारण इस क्षेत्र में जंगल की आग लगने का खतरा भी बढ़ता जाएगा।

इस साल क्यों हुई हिमपात की कमी?

हिमालय क्षेत्र में हिमपात में इस साल कमी ​क्यों दर्ज की गई? इस सवाल के जवाब में वह पत्रिका से बताते हैं कि पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर की ओर से पानी लाता है। वह इस साल कमजोर रहा जिसके चलते सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है। दरअसल, सर्दियों में बर्फबारी भी वर्षा का ही एक रूप है। बारिश का जल ही जलवाष्प बनकर ऊपर उठता है सर्दियों में हिमपात का कारण बनता है। उन्होंने बताया कि नेपाल, जिसके भीतर मध्य हिमालय स्थित है, में भी शीतकालीन वर्षा में उल्लेखनीय कमी देखी जा रही है।

'सर्दियों में घटती बर्फबारी पर्यावरणीय संकट को और बदतर बनाएगी'

वैश्विक तापमान वृद्धि के चलते ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भारत के हिमालयी राज्यों और इस क्षेत्र के अन्य देशों के लिए लंबे समय से एक गंभीर संकट रहा है। पत्रिका से बातचीत में विशेषज्ञों ने बताया कि सर्दियों में घटती बर्फबारी इस समस्या को और भी बदतर बना रही है। उनका कहना है कि बर्फ और हिम में कमी से न केवल हिमालय का स्वरूप बदलेगा, बल्कि इससे इस क्षेत्र में करोड़ों लोगों के जीवन और कई पारिस्थितिक तंत्रों पर भी प्रभाव पड़ेगा।

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