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खामोश हुई गोलियां, गूंज रहा निर्माण का शोर… बंदूक छोड़ ईंट-गारा से सपने गढ़ रहे पूर्व नक्सली

Surrender Naxal Story: छत्तीसगढ़ के बस्तर में आत्मसमर्पित नक्सली अब हथियार छोड़कर राजमिस्त्री, आधुनिक खेती और कंप्यूटर जैसे कौशल सीख रहे हैं।

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हथियार छोड़ थामीं ईंटें (photo source- Patrika)

Surrender Naxal Story: बस्तर के घने जंगलों से एक ऐसी कहानी निकलकर सामने आ रही है, जो सिर्फ बदलाव की नहीं, बल्कि उम्मीद, पुनर्निर्माण और नई शुरुआत की मिसाल बन रही है। कभी जिन हाथों में बंदूकें थीं और जो बारूद से घर-आंगन उजाड़ने के लिए जाने जाते थे, आज वही हाथ ईंट और मिट्टी से भविष्य की मजबूत नींव रख रहे हैं। सुकमा जिले के पुनर्वास केंद्रों में आत्मसमर्पित नक्सलियों के जीवन में आया यह बदलाव पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत बन चुका है।

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हिंसा से विकास की राह

वर्षों तक जंगलों में सक्रिय रहे ये लोग अब हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए हैं। यह परिवर्तन आसान नहीं था—लेकिन सुरक्षा बलों के दबाव, सरकार की पुनर्वास नीति और बेहतर जीवन की उम्मीद ने इन्हें नई दिशा दी। आज ये पूर्व नक्सली अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक सम्मानजनक जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि बंदूक से डर पैदा किया जा सकता है, लेकिन भविष्य नहीं बनाया जा सकता।

राजमिस्त्री: सबसे बड़ा सहारा

पुनर्वास केंद्रों में चल रहे कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा रुचि राजमिस्त्री के काम में देखी जा रही है।

  • 218 लोग इस काम में प्रशिक्षित हो चुके हैं
  • 161 लोग वर्तमान में प्रशिक्षण ले रहे हैं
  • इनमें से 72 राजमिस्त्री कोर्स में हैं

यह सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव है। ईंट बनाने से लेकर दीवार खड़ी करने तक की बारीकियां सीखकर ये लोग न केवल अपना घर बना सकेंगे, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार का जरिया बनेंगे।

महिलाएं भी निभा रहीं अहम भूमिका

इस बदलाव की सबसे खास बात यह है कि इसमें महिलाएं भी बराबरी से भागीदारी निभा रही हैं। जो महिलाएं पहले जंगलों में संघर्ष का हिस्सा थीं, आज वही महिलाएं निर्माण कार्य सीखकर अपने परिवार और समाज के विकास में योगदान देने के लिए आगे आ रही हैं। उनका सपना सिर्फ खुद का घर बनाना नहीं, बल्कि अपने गांवों को कच्ची झोपड़ियों से पक्के मकानों में बदलना है।

रोजगार के विविध अवसर

राजमिस्त्री के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि हर व्यक्ति अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम चुन सके:

  • 25 लोग कृषि कार्य सीख रहे हैं
  • 14 लोग ड्राइविंग का प्रशिक्षण ले रहे हैं

इसके अलावा, युवाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए कंप्यूटर शिक्षा भी दी जा रही है। आठवीं और दसवीं पास युवाओं को लाइवलीहुड कॉलेज के माध्यम से डिजिटल स्किल्स सिखाई जा रही हैं, जिससे वे रोजगार के नए अवसर तलाश सकें।

अपने घर का सपना

प्रशिक्षण ले रहे मड़कम सेमरू जैसे कई युवाओं के लिए यह पहल सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि अपने घर का सपना पूरा करने का माध्यम भी है। वे बताते हैं कि गांव में उनकी झोपड़ी है, लेकिन अब वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपना पक्का घर खुद बना सकेंगे। यह आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की दिशा में एक बड़ा कदम है।

नई पहचान, नई शुरुआत

आत्मसमर्पण करने वाले इन लोगों के पास पहले कोई आधिकारिक पहचान नहीं थी।
लेकिन अब पुनर्वास केंद्रों में उनके लिए जरूरी दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं:

  • आधार कार्ड
  • राशन कार्ड
  • बैंक खाता
  • श्रम पंजीयन
  • आयुष्मान कार्ड

इन दस्तावेजों के जरिए वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे और समाज की मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल हो पाएंगे।

सकारात्मक माहौल और मानसिक बदलाव

पुनर्वास केंद्रों में सिर्फ कौशल ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक बदलाव पर भी जोर दिया जा रहा है।
केंद्र की प्रभारी मोनिका श्याम के अनुसार, दिन की शुरुआत भजन और स्थानीय देवी-देवताओं की प्रार्थना से होती है। इसके अलावा खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बाजार भ्रमण जैसी गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे समाज के साथ सहज रूप से जुड़ सकें।

बस्तर में लौटती शांति

यह पूरा बदलाव बस्तर में लौटती शांति और विकास का संकेत दे रहा है। जहां कभी हिंसा और डर का माहौल था, वहां अब निर्माण, रोजगार और उम्मीद की बातें हो रही हैं। यह दिखाता है कि अगर सही दिशा, अवसर और सहयोग मिले, तो कोई भी क्षेत्र अपने अतीत को पीछे छोड़कर आगे बढ़ सकता है।

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Published on:
26 Apr 2026 01:27 pm
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