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नृत्य, संगीत और विद्रोह: इतिहास के पन्नों में दर्ज वो नाम जिन्होंने अपने गीतों और शायरी से अंग्रेजी हुकूमत को दी चुनौती

Tawaifs in Indian History: Tawaifs in Indian History: देश की आजादी की लड़ाई में कुछ के नाम तो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गए, वहीं कुछ गुमनानी के अंधेरों में खो गए। आज के इस आर्टिकल में में हम आपको कुछ ऐसी ही औरतों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी कला और हुनर के जरिये आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी।

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Jan 29, 2026
आजादी की लड़ाई की गुमनाम नायिकाएं। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

Tawaifs in Indian History: जब-जब भारतीय इतिहास और आजादी की कहानी याद की जाती है, तब-तब कुछ नाम सबकी जुबान पर आ जाते हैं, जिनमें महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्र शेखर आजाद, बाल गंगाधर तिलक और झांसी की रानी जैसे नाम शामिल हैं। देश को अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए हजारों, लाखों क्रंतिकारियों ने हंसते-हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इन क्रांतिकारियों में बहुत सी महिलाएं भी शामिल थीं। इन्हीं क्रांतिकारियों में कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जिनका ज्यादा जिक्र नहीं होता है। और वो थीं उस दौर की कुछ तवायफें। जी हां, जिनका जिक्र नहीं किया जाता है। ये वो तवायफें थीं जिन्होंने अपने कोठों, अपनी कमाई और अपनी जान तक को देश की आज़ादी के लिए दांव पर लगा दिया। ये औरतें बंदूक नहीं उठाती थीं, लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला देने वाली सूचनाओं की सबसे बड़ी कड़ी थीं।

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अजीजन बाई (कानपुर) - झांसी की रानी की सिपाही

अजीजन बाई, झांसी की रानी की सिपाही। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

अजीजन बाई शायद आजादी की लड़ाई में शामिल होने वाली सबसे चर्चित तवायफ थीं। कानपुर की मशहूर तवायफ अजीजन बाई ने 1857 की क्रांति के दौरान खुद को पूरी तरह आंदोलन को समर्पित कर दिया। वह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हुईं। घुड़सवारी, तलवारबाजी और बंदूक चलाने में निपुण थीं। अंग्रेजों के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ी और सैनिकों के लिए हथियार और रसद जुटाई। आज भी कई इतिहासकार मानते हैं कि अगर अजीजन बाई जैसी औरतें सामने न आतीं, तो 1857 की क्रांति का स्वरूप अलग होता।

महबूबन (लखनऊ) - शायरी में छुपी बगावत

महबूबन, शायरी में छुपी बगावत। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

लखनऊ की मशहूर तवायफ महबूबन अपने दौर की जानी-मानी शायरा और कलाकार थीं। उनका कोठा केवल महफिलों का केंद्र नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों की सुरक्षित बैठकगाह था। अंग्रेज अफसरों और नवाबों के बीच बैठकर वह गुप्त जानकारियां इकट्ठा करती थीं। उनकी शायरी में आजादी का दर्द और विद्रोह साफ झलकता था। कई क्रांतिकारियों को उन्होंने आर्थिक मदद भी दी। महबूबन जैसी तवायफें यह साबित करती हैं कि कला भी प्रतिरोध का हथियार बन सकती है।

हीरा देवी (पटना) - जब कोठा बना शरणस्थली

हीरा देवी, जब कोठा बना शरणस्थली। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

बिहार के पटना की हीरा देवी का नाम उन औरतों में लिया जाता है, जिन्होंने अपने कोठे को क्रांतिकारियों के लिए सुरक्षित ठिकाने में बदल दिया। अंग्रेजों की नजर से बचते हुए आंदोलनकारियों को छिपाया गया। गुप्त संदेशों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया गया। कई बार पुलिस की रेड के बावजूद हीरा देवी ने किसी का नाम उजागर नहीं किया। यह वो जंग थी, जो बिना शोर के लड़ी जा रही थी।

जानकी देवी (इलाहाबाद) - आंदोलन की आर्थिक रीढ़

जानकी देवी, आंदोलन की आर्थिक रीढ़। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

इलाहाबाद की जानकी देवी ने आजादी की लड़ाई में आर्थिक सहयोग के जरिए अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा कांग्रेस और स्थानीय क्रांतिकारी समूहों को दान किया। कई आंदोलनों के दौरान गुप्त रूप से चंदा इकट्ठा किया गया। अंग्रेज अफसरों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इतिहास में बहुत कम लिखा गया है कि आजादी की लड़ाई को चलाने के लिए पैसे भी चाहिए थे, और वो पैसा कई बार की तरफ से भी आया था।

नूरजहां बेगम (लाहौर) - संगीत के सुरों में आज़ादी

नूरजहां बेगम, संगीत के सुरों में आज़ादी। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

लाहौर की तवायफ नूरजहां बेगम का जिक्र उन औरतों में होता है, जिन्होंने संगीत और मुजरे के जरिए आजादी के संदेश को फैलाया। उनकी महफिलों में क्रांतिकारी गीत गाए जाते थे। अंग्रेज अफसरों की मौजूदगी में भी इशारों-इशारों में विद्रोह की बात होती थी। कई नौजवान उन्हीं महफिलों से आंदोलन के लिए प्रेरित हुए।

गौहर जान - जिन्होंने राष्ट्रवाद को आवाज दी

गौहर जान, जिन्होंने राष्ट्रवाद को आवाज दी। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

गौहर जान भारत की पहली रिकॉर्डेड सिंगर थीं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि वह स्वदेशी आंदोलन की खुलकर समर्थक थीं। उन्होंने कांग्रेस के कई कार्यक्रमों में देशभक्ति गीत गाए। ब्रिटिश सरकार के सामने “माय नेम इज गौहर जान” कहने वाली यह महिला मंच से “वंदे मातरम्” गाने से नहीं हिचकी, उन्होंने अपने कार्यक्रमों की कमाई आजादी के आंदोलन के लिए दान की। गौहर जान ने साबित किया कि कला भी प्रतिरोध का हथियार हो सकती है।

आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाली तवायफों की कहानियों पर आधारित फिल्में और वेब सीरीज

आजादी की लड़ाई की गुमनाम नायिकाएं। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

अब अगर बात की जाए भारतीय सिनेमा की तो देश के महान क्रांतिकारियों की कहानी पर समय-समय पर कई फिल्में और वेबसीरीज बनाई जाती रहीं हैं। मगर इन औरतों की कहानी को दिखाने में अभिनय जगत थोड़ा पीछे रह गया। हालांकि, बीते कुछ सालों में भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाली तवायफों की कहानियों को अलग-अलग रूपों में पर्दे पर उतारा है। Heeramandi जैसी सीरीज लाहौर की उन असली तवायफों से प्रेरित मानी जाती है, जो अंग्रेज अफसरों और रईसों के बीच रहकर गुप्त सूचनाएं क्रांतिकारियों तक पहुंचाती थीं, वहीं बेगम जान बंटवारे के दौर की उन तवायफों की सामूहिक कहानी कहती है जिनके कोठे सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गए थे। श्याम बेनेगल की मंडी आजादी से पहले और बाद की राजनीति में फंसी तवायफ संस्कृति की सच्चाई दिखाती है, जबकि उमराव जान और पाकीज़ा जैसी फिल्मों में तवायफ के जरिये उस दौर की सामाजिक बेड़ियों और स्त्री-स्वतंत्रता की चाह को सामने रखा गया है। वहीं, अनारकली और मुग़ल-ए-आजम जैसी क्लासिक फिल्मों ने दरबारी तवायफ को सत्ता के खिलाफ खड़ी एक साहसी स्त्री के रूप में पेश किया।

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