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फोर्स नहीं तो इलेक्शन नहीं…जब टीएन शेषन ने चुनाव कराने से ही कर दिया था इनकार

1993 में टीएन शेषन ने सरकार से चुनाव कराने के लिए सेंट्रल फोर्स मांगी थी। लेकिन इनकार होने पर उन्होंने 31 सीटों के चुनाव टाल दिए।

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Aug 20, 2025
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की 1996 की यह तस्वीर वोट डालने के बाद की है। (फोटो सोर्स : ECI)

भारत के चुनावी इतिहास में जब भी चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता और सख्ती की चर्चा होती है तो एक नाम सबसे पहले सामने आता है, वह है देश के पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी रहे टीएन शेषन का। वह 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) भी रहे थे। उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग की साख सबसे ज्यादा मजबूत हुई और जनता का भरोसा बढ़ा।

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद चुनाव टले

1991 में पूर्व पीएम राजीव गांधी की हत्या के बाद चुनाव टल गए थे। जब चुनाव हुए तो शेषन ने इसे एक मौके की तरह लिया। उन्होंने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को सीधे चुनाव आयोग के अधीन कर दिया। उस चुनाव में करीब 35 लाख कर्मचारी 6 लाख मतदान केंद्रों पर 50 लाख से ज्यादा वोटरों के लिए तैनात किए गए थे। शेषन ने साफ कहा था कि एक बार चुनाव ड्यूटी पर लगाए जाने के बाद ये अधिकारी सिर्फ आयोग के जवाबदेह होंगे।

चुनाव में सख्ती टकराव का कारण बनी

टीएन शेषन की चुनाव में यही सख्ती टकराव की जड़ बनी। शेषन का मानना था कि उन्हें चुनाव ड्यूटी पर लगे अफसरों को अनुशासित करने, निलंबित करने या ट्रांसफर करने का अधिकार है। लेकिन केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं थी। उन्होंने 1994 में एक अंग्रेजी दैनिक को दिए इंटरव्यू में साफ कहा था कि सरकार मुझे रोके, यह बात मैं कभी बर्दाश्त करने वाला नहीं था।

Ranipet Byelections में उपजा संकट

जुलाई 1993 में तमिलनाडु के Ranipet Byelections ने इस टकराव को चरम पर पहुंचा दिया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता कांग्रेस कार्यकर्ताओं को क्षेत्र में घुसने से रोक रही थीं। विपक्ष ने केंद्रीय बलों की मांग की। शेषन ने यह मांग केंद्र तक पहुंचाई लेकिन सरकार ने साफ कह दिया कि आपको केंद्रीय बल बुलाने का कोई अधिकार नहीं। इसके बाद शेषन ने बड़ा फैसला लिया। 2 अगस्त 1993 को आदेश जारी कर दिया कि जब तक केंद्र सरकार के साथ गतिरोध खत्म नहीं होता, चुनाव आयोग कोई चुनाव नहीं कराएगा। इस एक आदेश से उन्होंने 31 सीट के चुनाव टाल दिए, जिनमें लोकसभा की 3 सीटें, राज्यसभा की 9, विधान परिषद की 2 और विधानसभा की 17 सीटें शामिल थीं।

सुप्रीम कोर्ट की शरण में चुनाव आयोग

सरकार और आयोग की इस जंग ने संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया था। 10 सितंबर 1993 को चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए आयोग के अधिकारों को मान्यता दे दी। साथ ही कहा कि चुनाव ड्यूटी में लगे अफसर आयोग के प्रति ही जवाबदेह होंगे। मुकदमा लंबा खिंचा और 1996 में टीएन शेषन के रिटायर होने के बाद भी चलता रहा। फिर सन 2000 में मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल के साथ समझौते के बाद मामला रफा-दफा हुआ।

2000 के समझौते के बाद बढ़ी आयोग की ताकत

2000 में सुप्रीम कोर्ट में सरकार और आयोग के बीच सहमति के बाद उसकी अनुशासनात्मक शक्तियां बढ़ गईं। इसके तहत आयोग को अधिकार मिला कि वह चुनाव ड्यूटी में लापरवाही करने वाले अफसरों को निलंबित कर सकता है, उन्हें बदल सकता है और उनके मूल विभाग को एक रिपोर्ट भेज सकता है। साथ ही आयोग की अनुशंसा पर 6 महीने में कार्रवाई करना संबंधित सरकार के लिए अनिवार्य होगा। केंद्र ने राज्यों को भी इसी नियम का पालन करने की सलाह दी और कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 7 नवंबर 2000 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश जारी किया।

पश्चिम बंगाल से जारी है टकराव

हालांकि इस समझौते के बावजूद आयोग और राज्य सरकारों के बीच टकराव खत्म नहीं हुआ है। कई बार राज्य सरकारें आयोग की अनुशंसा पर कार्रवाई से बचती रही हैं या अधिकारियों की सफाई स्वीकार कर लेती हैं। मौजूदा समय में पश्चिम बंगाल के साथ चल रहा विवाद भी इसी खींचतान का हिस्सा है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के 4 अफसरों को वोटर लिस्ट में गड़बड़ी करते पकड़ा था। इसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने 4 अफसरों को ईमानदार बताकर कार्रवाई से मना कर दिया। साथ ही दलील दी कि अभी कोई चुनाव की घोषणा नहीं हुई है।

आयोग को ताकतवर बनाने के लिए याद किए जाते हैं शेषन

टीएन शेषन ने अपने कार्यकाल में वह कर दिखाया जो पहले कभी नहीं हुआ। उनके मुताबिक चुनाव आयोग चाहे तो किसी भी सरकार के सामने झुकने की जरूरत नहीं। उन्होंने चुनावों को फ्री और फेयर बनाने की असली परिभाषा दी। उनकी सख्ती ने जनता का भरोसा आयोग पर बढ़ाया और आयोग को एक मजबूत संस्था की पहचान दिलाई।

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