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क्या नई पीढ़ी सच में बच्चे नहीं चाहती? UNFPA की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

UNFPA Report 2026: UNFPA की सर्वे रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा, कहीं हम गलतफहमी में तो नहीं थे, कि नई पीढ़ी शादी नहीं करना चाहती है न ही परिवार बढ़ाने के सपने देख रही... क्योंकि भारत समेत 73 देशों के एक लाख से ज्यादा युवाओं पर हुए सर्वे में सामने आई अलग ही सामाजिक तस्वीर
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Jul 10, 2026
UNFPA Report 2026
UNFPA Report 2026: Worl Population Day 2026 पर पत्रिका की खास पेशकश। (photo:AI Generated)

UNFPA Report 2026: ''आजकल की पीढ़ी शादी नहीं करना चाहती, न ही उसके सपने हैं कि उसके भी अपने बच्चे और परिवार हो… इस पीढ़ी को करियर और बंधनों से आजादी देखने से फुर्सत मिले तब ना...।''

अगर आप भी ऐसी ही सोच रखते हैं, तो शायद आपको एक बार सोचने की जरूरत है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया, टीवी चैनल्स से लेकर आपसी बहस तक में यही बात बार-बार दोहराई जाती है। यहां तक कि दुनिया भर के कई देशों में गिरती जन्मदर का कारण भी लोग इसी सामाजिक धारणा को मान रहे हैं। लेकिन क्या वाकई नई पीढ़ी शादी और बच्चों से दूर भाग रही है, पारिवारिक जिम्मेदारियों और बंधनों को बोझ मानकर इस सामाजिक परम्परा से पल्ला झाड़ रही है। या फिर इसके पीछे कोई ऐसा कारण है, जिसे समझने में हम भूल कर रहे हैं।

patrika.com पर World Population Day 2026 के उपलक्ष्य में संजना कुमार के साथ पढ़ें केवल जनसंख्या नहीं, रिश्तों, परिवार, युवाओं की मह्त्वाकांक्षाओं और बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर बात करती 'बदलती दुनिया, बदलता परिवार' सीरीज का पहला भाग… सवाल अहम है- नई पीढ़ी बच्चे क्यों नहीं चाहती?

दुनिया के 73 देशों के 1 लाख से ज्यादा युवाओं पर सर्वे

विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई से पहले संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 'नई लाइव्ज, चॉइसेस एंड फ्यूचर: डेमोग्राफिक फीचर्स सर्वे' (Lives, Choices And Futures: Demographic Survey) रिपोर्ट में दुनियाभर के बीच चल रही इस बहस से कुछ अलग ही तस्वीर नजर आई है। 73 देशों में 18-39 साल के एक लाख से ज्यादा युवाओं पर किए गए इस सर्वे से खुलासा हुआ है कि समस्या यह नहीं है कि लोग शादी नहीं करना चाहते या फिर परिवार बढ़ाने के बारे में क्यों नहीं सोच रहे, बल्कि दुनिया के हालात उन्हें अपनी पसंद और परिवार के सपनों को देखने से रोक रहे हैं।

उम्मीदें बहुत हैं, लेकिन निराशा भी कम नहीं

रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि 58 फीसदी युवा खुद को उम्मीदों से भरा हुआ महसूस करते हैं, लेकिन दुनिया के हालात उतना ही निराश भी करते हैं। रिपोर्ट बताती है कि सर्वे में शामिल हुए करीब 60 फीसदी युवाओं का मानना है कि उनके देश में युवाओं के बीच गहरी असमानता देखने को मिलती है। यानी अवसर तो बहुत हैं, लेकिन वे समान रूप से लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। ऐसे में नये अवसर जहां उनकी आंखों की चमक बढ़ा देते हैं, वहीं असमानता उनकी महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर देती है। वास्तव में यह कोई विरोधाभास की कहानी भर नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी की मनोस्थिति है, जिसमें उम्मीद और निराशा दोनों साथ-साथ चल रही हैं।

सरकार और सिस्टम से खोता भरोसा

सर्वे रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दुनिया भर के युवाओं में बड़ा तबका यह मानता है कि उसे अपने देश की सरकार और सिस्टम पर भरोसा नहीं है। जबकि केवल 39 फीसदी युवा ही ऐसे हैं, जो यह सोचते हैं कि उनकी सरकार युवाओं को बेहतर और पर्याप्त सहयोग दे रही है। वहीं बहुत कम संख्या ऐसे वर्ग की है जिन्होंने यह माना कि सरकार मासूम बच्चों वाले माता-पिता की जरूरत के हिसाब से मदद भी करती है। हालांकि रिपोर्ट में इस संख्या को सबसे कम माना गया है। उन युवाओं की संख्या भी बहुत कम है जो जिन्हे लगता है कि उनके देश में नियोक्ता काम और परिवार के बीच संतुलन बनाने में सहयोग करते हैं। सर्वे रिपोर्ट का यह चिंताजनक पहलू है कि इतनी बड़ी युवा आबादी मानती है कि शादी या परिवार बढ़ाने के सपने देखना अब केवल उनका नीजि निर्णय या इच्छा नहीं रह गई। यह सामाजिक परम्परा सीधे तौर पर करियर या नौकरी, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की नीतियों और सरकारी सहयोग से जुड़ गई है।

badalti Dunia Badalta Pariwar Series part 1 world population day 2026: (infographic by AI)

बड़ा सवाल, तो क्या यह सिर्फ विकासशील देशों की कहानी?

इस तरह की मानसिकता और धारणा को अक्सर लोग आर्थिक चुनौती वाले यानी विकासशील देशों की ही समस्या है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि UNFPA के सर्वे में यह धारणा भी टूटती नजर आई है। एक सकारात्मक तस्वीर यह है कि कम आय वाले देशों के युवा ज्यादा आशावान नजर आते हैं। इसके उलट विकसित या उच्च आय वाले देशों में युवा ज्यादा निराश हैं। लेकिन दोनों ही देशों में युवा असमानता की भावना से भरे हैं। यानी देश अमीर हो गरीब युवाओं की चिंता समान है कि क्या अपने भविष्य और परिवार को लेकर वे सुरक्षित महसूस करते हैं? शादी या बच्चों के सपने देखने से पहले वे कई बार सोचते हैं…

  • क्या उनकी नौकरी स्थायी है?
  • क्या वे अपना घर खरीद पाएंगे?
  • बच्चों या परिवार का खर्च कैसे चलेगा?
  • क्या उनके नियोक्ता उन्हें परिवार के लिए समय देंगे

कहना होगा कि अब शादी-बच्चों या परिवार के सपने दिखाने वाली सामाजिक धारणा अब भावनाओं के साथ-साथ आर्थिक गणित पर आ टिकी है।

रील की दुनिया और रियल लाइफ हकीकत

आजकल युवा वर्ग अपना ज्यादातर टाइम सोशल मीडिया पर बिताता है। लेकिन सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि रील लाइफ या सोशल मीडिया पर वे एंटरटेनमेंट, काम या कोई जानकारी देने वाले कंटेट, वीडियो पर ज्यादा समय बिताते हैं। डेटिंग या पार्टनर खोजने के लिए इंटरनेट का यूज सबसे कम किया जाता है। एक लाख से ज्यादा युवाओं पर किए गए इस सर्वे में आधे से ज्यादा युवाओं का कहना था कि वे शादी या बच्चों के सपने संजोने के लिए ऑनलाइन समय नहीं बिताते।

भारत के युवा क्या कहते हैं?

दुनियाभर के देशों में भारत को सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश माना जाता है। वहीं अभी भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति जापान या दक्षिण कोरिया जैसी नहीं है। लेकिन दुनियाभर में नजर आने वाले बदलावों से हमारा देश भी अछूता नहीं है। इस सर्वे में भारत के युवाओं ने जो कहा वो भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। दरअसल अगर उन्हें स्थिर रोजगार, किफायती आवास, सामाजिक सुरक्षा और बेहतर कार्य-जीवन संतुलन नहीं मिलेगा, तो आने वाले सालों में परिवार और बच्चों से जुड़े फैसले यहां भी बदल सकते हैं। ऐसे में जनसंख्या पर चर्चा को केवल जन्मदर तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अब वो समय आ गया है, जब इसे बेहतर शिक्षा, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने का नजरिया विकसित करना होगा। क्यों कि अब सवाल जनसंख्या से कहीं ज्यादा विकल्पों का हो चला है।

badalti Dunia Badalta Pariwar Series on world population day 2026: नई पीढ़ी की नई दुनिया को समझना होगा। (patrika: Photo AI Generated)

UNFPA की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां अब रिश्तों का गणित बदल रही हैं। भावनाओं के साथ आगे बढ़ने वाला जीवन अब आर्थिक स्थिति पर आ टिका है। नई पीढ़ियां सपने तो देख रही हैं, लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, अस्थाई नौकरियां, बढ़ती असमानता और कमजोर सामाजिक सुरक्षा जैसी समस्याएं बदलती नजर आएं, सुलझती दिखें, तो उन्हें इच्छाएं मारकर अकेले जीवन जीने का फैसला नहीं लेना पड़ेगा।

रिपोर्ट पर एक नजर

संस्था और रिपोर्ट- UNFPA- Lives, Choices and Futures

सर्वे- Demographic Futures Survey 2025-26

कितने देश- भारत समेत कुल 73 देश

कितने युवा और उनकी उम्र- 1 लाख से ज्यादा- 18-39 साल

रिपोर्ट की 5 बड़ी बातें

  • पारिवारिक और भावनात्म फैसलों पर आर्थिक परिस्थितियों का भार ज्यादा
  • 58 फीसदी युवाओं को अवसर देखकर खुशी
  • 60 फीसदी युवाओं को महसूस होती है अवसरों में असमानता, जो बढ़ाती है निराशा
  • केवल 39 फीसदी सरकार के पक्ष में और मानते हैं सरकार करती है सहयोग
  • काम के साथ जीवन में संतुलन पर भी भरोसा बहुत कम
Updated on:
10 Jul 2026 06:15 pm
Published on:
10 Jul 2026 04:33 pm
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