Holi Celebration in CG: जब पूरा देश होली की तिथि का इंतजार करता है, छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में तो पहले ही रंगों की बौछार और ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई देती है। यहां होली के जश्न की शुरुआत सात दिन पहले होती है और कुछ जगहों पर यह 13 दिनों तक अपने पूरे रंगों में खिलता रहता है। सदियों पुरानी ये परंपराएं दर्शाती हैं कि यह त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप है।
Unique Holi: पूरे देश में जहां होली की तैयारियां निर्धारित तिथि के अनुसार होती हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के कई गांव अपनी अनोखी परंपराओं के कारण इस पर्व को अलग अंदाज में मनाते हैं। कहीं सात दिन पहले होलिका दहन होता है, कहीं तिथि नहीं बल्कि दिन के अनुसार रंग खेला जाता है, तो कहीं 13 दिनों तक होली का उत्सव चलता है। आइए जानते हैं इन खास गांवों की रोचक परंपराएं…
बैकुंठपुर जिले से 10 किमी दूर ग्राम पंचायत अमरपुर में होली का पर्व इस बार भी परंपरा के अनुसार एक सप्ताह पहले धूमधाम से मनाया गया। बुजुर्गो द्वारा वर्षों पहले बनाई गई इस अनोखी परंपरा का आज भी गांव के लोग पूरी निष्ठा से पालन कर रहे है। 500 की आबादी वाले इस गांव में मान्यता है कि समय से पहले होली मनाने से गांव किसी भी अनहोनी, विपदा और महामारी से सुरक्षित रहता है। इसी विश्वास के चलते अमरपुर में पूरे पंचायत क्षेत्र में केवल इसी गांव में पहले होली मनाई जाती है।
परंपरा को बढ़ा रहे युवक
गांव के युवा भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जो सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का उदाहरण है। गांव के नरेश राजवाड़े, अर्जुन, यमन ने बताया कि वर्षों से इस परंपरा के पालन के कारण गांव में कभी कोई बड़ी अप्रिय घटना नहीं घटी।
गुलाल लगाकर झूमते रहे युवा
होली से पहले गांव में बैठक आयोजित कर विधिवत होलिका दहन किया गया। अगले दिन देवल्ला में पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीणों ने एक-दूसरे को गुलाल, अबीर लगाकर होली मनाई। बुधवार को ढोलक, मंजीरे, फाग गीतों और डीजे की धुन पर बुजुर्गों से लेकर युवा वर्ग तक झूमते नजर आए।
रायगढ़ जिले से करीब 45 किलोमीटर दूर तथा सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत साल्हेओना में होली तिथि के अनुसार नहीं, बल्कि दिन के अनुसार मनाई जाती है।
यहां के ग्रामीण होली के बाद आने वाले पहले मंगलवार या शनिवार को ही रंग खेलते हैं। करीब 100 वर्ष पुरानी इस परंपरा के पीछे एक मान्यता जुड़ी है। बताया जाता है कि पूर्व में होली के दिन गांव में लगातार आगजनी की घटनाएं होती थीं। कई वर्षों तक नुकसान झेलने के बाद ग्रामीणों ने स्थानीय बैगा से सलाह ली और निर्णय लिया कि अब तिथि के बजाय शुभ दिन पर ही होली मनाई जाएगी। तभी से यह परंपरा आज तक जारी है और गांव का हर व्यक्ति इसका पालन करता है।
धमतरी जिले से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम सेमरा अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां होली मुख्य तिथि से सात दिन पहले मनाई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, उनके आराध्य सियार देव ने पूर्वजों को स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया था कि गांव की सुरक्षा के लिए होली, दिवाली, पोला और हरेली जैसे सभी प्रमुख त्यौहार निर्धारित समय से एक सप्ताह पूर्व मनाए जाएं।
गांव के बीच स्थित सियार देव मंदिर से ही हर उत्सव की शुरुआत होती है। इस विशेष अवसर पर विवाहित बेटियां भी अपने मायके पहुंचती हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा के कारण गांव प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों से सुरक्षित रहता है।
कबीरधाम जिले के वनांचल क्षेत्र में निवासरत बैगा आदिवासी समुदाय 13 दिनों तक होली का पर्व मनाते हैं, जिसे ‘तेरस’ कहा जाता है। प्रदेश में जहां सामान्यतः एक या दो दिन होली मनाई जाती है, वहीं यहां 13 दिनों तक उत्सव का उल्लास बना रहता है।
इस दौरान युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में फागुन नृत्य करते हैं। पुरुष घेरदार घाघरा, सलूखा, काली जैकेट, पगड़ी और मोर पंख धारण करते हैं, जबकि महिलाएं विशेष श्रृंगार कर मुंगी धोती पहनती हैं। टेसू और पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं। सेमर की लकड़ी से बने विशेष वाद्य ‘खेकड़ा-खेकड़ी’ के साथ उत्सव मनाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी हर्बल रंगों से होली खेलने की परंपरा कायम है।
जगदलपुर से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित माड़पाल गांव में होली दशहरे जैसी रियासती परंपरा के साथ मनाई जाती है। बताया जाता है कि यह परंपरा वर्ष 1423 से चली आ रही है। सबसे पहले माड़पाल में होलिका दहन होता है, उसके बाद यहां से लाई गई अग्नि से जगदलपुर राजमहल परिसर स्थित मावली माता मंदिर में युगल होलिका दहन किया जाता है।
तेन्दू, पलाश, साल, खैर, धवड़ा, हल्दू और बेर सहित सात प्रकार की सूखी लकड़ियों से होलिका सजाई जाती है। मान्यता है कि इन लकड़ियों के दहन से उत्पन्न धुआं हानिकारक कीटों को नष्ट करता है और राख कीटनाशक की तरह उपयोगी होती है। राजपरिवार के सदस्य आज भी इस परंपरा में शामिल होते हैं। किंवदंती के अनुसार, यह परंपरा बस्तर रियासत के राजा पुरुषोत्तम देव के समय से चली आ रही है।
छत्तीसगढ़ की ये अनोखी होली परंपराएं दर्शाती हैं कि यहां यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक एकता का प्रतीक है। जहां देशभर में होली एक-दो दिन में सिमट जाती है, वहीं इन गांवों में यह पर्व आज भी अपनी विशिष्ट पहचान और पूरी जीवंतता के साथ कायम है।