
Visakhapatnam Railway Station : समुद्र से उठने वाला चक्रवात जब तट से टकराता है तो हवाओं की रफ्तार के साथ तबाही का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि तेज रफ्तार चक्रवाती तूफान भी रेल यातायात की राह में बाधा न बन सके। ‘हुदहुद’ जैसे भीषण चक्रवात की मार झेल चुके इस शहर में नया स्टेशन भवन यू-शेप डिजाइन और खास तकनीक के साथ बनाया जा रहा है। स्टेशन की बनावट और निर्माण तकनीक में तटीय क्षेत्र की चुनौती को ध्यान में रखा गया है। चक्रवात की स्टेज-3 को ध्यान में रखकर इसका निर्माण हो रहा है।
देशभर में रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण के तहत विशाखापत्तनम स्टेशन का भी पुनर्निर्माण किया जा रहा है। करीब 800 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से बनने वाले इस स्टेशन में स्थानीय कला, संस्कृति और वास्तुकला की झलक भी देखने को मिलेगी।
विशाखापत्तनम को पहले भीषण चक्रवातों का सामना करना पड़ा है। इनमें हुदहुद चक्रवात सबसे ज्यादा याद किया जाता है। इसकी तेज हवाओं ने शहर को व्यापक रूप से प्रभावित किया था। रेलवे की कोशिश है कि मौसम कितना भी खराब हो, उत्तर-दक्षिण रेल संपर्क की यह महत्वपूर्ण कड़ी बाधित न हो।
विशाखापत्तनम स्टेशन राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के यात्रियों के लिए दक्षिण भारत का महत्वपूर्ण रेल संपर्क केंद्र है। यहां से उत्तर और दक्षिण के बीच चलने वाली यात्री ट्रेनें गुजरती हैं। ऐसे में स्टेशन का विस्तार केवल स्थानीय यात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि लंबी दूरी की रेल यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशाखापत्तनम स्टेशन पर फिलहाल प्रतिदिन औसत 90 हजार और अधिकतम 1.40 लाख यात्री रोज आते-जाते हैं। पुनर्निर्माण के बाद यह क्षमता बढ़कर करीब 2.6 लाख यात्री प्रतिदिन हो जाएगी। इससे भविष्य में बढ़ने वाले यात्री दबाव को संभालने में मदद मिलेगी।स्टेशन पर अभी आठ प्लेटफार्म हैं। पुनर्विकास के बाद इनकी संख्या बढ़ाकर 14 की जाएगी। ट्रेनों संख्या में 500 से ज्यादा करने की योजना है।
विशाखापत्तनम के डीआरएम ललित बोहरा और वरिष्ठ मंडल वाणिज्यिक प्रबंधक के. पवन कुमार ने बताया कि विशाखापत्तनम रेल मंडल पहले वाल्टेयर मंडल का हिस्सा था, गत 1 जून 2026 से ही विशाखापत्तनम ने नए मंडल के रूप में कार्य शुरू किया है। यहां दो पोर्ट हैं, इसलिए माल परिवहन खूब होता है। यात्री और माल यातायात से होने वाली आय में यह मंडल देश में टॉप राजस्व वाले रेल मंडलों में शामिल हैं।
विशाखापत्तनम में रेलवे का इतिहास 19वीं सदी के अंतिम दशक से जुड़ा है। ईस्ट कोस्ट स्टेट रेलवे के दौर में 8 अगस्त 1893 को विशाखापत्तनम से कोव्वूर के बीच पहली ट्रेन चली। इसके बाद रेल नेटवर्क का लगातार विस्तार हुआ और 1900 में मद्रास से हावड़ा तक का रेल संपर्क पूरा हुआ। आगे चलकर यह क्षेत्र बंगाल नागपुर रेलवे (बीएनआर) का हिस्सा बना। बंदरगाह और रेलवे का संबंध भी इसी दौर में मजबूत हुआ। रेलवे ने बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में पोर्ट अथॉरिटी के गठन के बावजूद दोनों के बीच मजबूत परिचालन संबंध बने रहे। विशाखापत्तनम की ऐतिहासिक रेल विरासत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1892 में निर्मित ऐतिहासिक भवन आज भी मौजूद है। कभी यहां डिविजनल ट्रैफिक सुपरिटेंडेंट का कार्यालय हुआ करता था, जो आगे चलकर डिविजनल सुपरिटेंडेंट और फिर डीआरएम कार्यालय के रूप में विकसित हुआ। वर्तमान डीआरएम कार्यालय भवन 1968 में तैयार हुआ था।
वाल्टेयर मंडल लंबे समय से भारतीय रेलवे के प्रमुख माल ढुलाई वाले क्षेत्रों में रहा है। क्षेत्र के बंदरगाह, स्टील प्लांट और खनिज आधारित उद्योग रेलवे की माल ढुलाई अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, उर्वरक सहित विभिन्न औद्योगिक वस्तुओं की बड़े पैमाने पर ढुलाई होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पूर्व वाल्टेयर क्षेत्र ने सालाना लगभग 45 से 50 मिलियन टन तक माल लोडिंग का स्तर हासिल किया है। इसके राजस्व का स्तर भी 11 हजार करोड़ रुपए से अधिक रहा है, जिससे यह भारतीय रेलवे के प्रमुख कमाई वाले मंडलों में शामिल रहा।
विशाखापत्तनम के डीआरएम ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि यह स्टेशन राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित अन्य उत्तरी भारत के लोगों को दक्षिण से जोड़ने वाला प्रमुख स्टेशन है। यहीं से ट्रेनें गुजरती हैं। चक्रवात में भी यातायात प्रभावित नहीं हो, इसलिए स्टेशन भवन के निर्माण में खास तकनीक का उपयोग किया रहा है।