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Monsoon Asthma Triggers: मानसून में क्यों बढ़ जाता है अस्थमा का अटैक ? पल्मोनोलॉजिस्ट से जानिए बचाव के उपाय

Asthma Trigger in Monsoon : मानसून का मौसम अस्थमा के मरीजों के लिए बेहद संवेदनशील होता है। जानिए पल्मोनोलॉजिस्ट के अनुसार इस मौसम में अस्थमा ट्रिगर होने के मुख्य कारण और असरदार बचाव के उपाय।
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Jul 11, 2026
Asthma Asthma Triggers Monsoon Thunderstorm Asthma
क्यों मानसून में बढ़ जाता है अस्थमा का खतरा? (Photo : AI)

Monsoon Asthma Triggers : गर्मी के लंबे और उमस भरे दिनों के बाद मानसून की पहली बारिश हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आती है। मौसम सुहाना हो जाता है और चारों तरफ हरियाली छा जाती है। लेकिन, जहां यह मौसम आम लोगों को राहत देता है, वहीं अस्थमा (Asthma) या दमा के मरीजों के लिए मुश्किलें भी खड़ी कर देता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बारिश के महीनों में अस्थमा के अटैक और सांस से जुड़ी अन्य बीमारियों के मामलों में अचानक 30 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी देखी जाती है।

अगर आप या आपके परिवार में कोई अस्थमा से पीड़ित है, तो यह जानना बेहद जरूरी है कि इस मौसम में फेफड़े क्यों कमजोर पड़ने लगते हैं और इनसे बचने के लिए कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए।

डॉ.शुभ्रांशु के साथ पत्रिका की खास बातचीत

मानसून आते ही ओपीडी में अस्थमा और सांस के मरीजों की संख्या अचानक क्यों बढ़ जाती है? इस मौसम में हवा में ऐसा क्या बदल जाता है?

  • हवा में नमी + फफूंद (सबसे बड़ा इनडोर ट्रिगर) : बारिश के दिनों में घरों की दीवारों, पर्दों, सोफों और कालीनों में लंबे समय तक सीलन बनी रहती है। इस अत्यधिक नमी के कारण घरों के अंदर फफूंद (Mould) और धूल के सूक्ष्म कीड़े (Dust Mites) बहुत तेजी से पनपते हैं। इनके बारीक बीजाणु (Spores) हवा में तैरते रहते हैं और सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर अचानक अस्थमा अटैक को ट्रिगर कर देते हैं।
  • वायरल इन्फेक्शन का बढ़ता प्रकोप: मानसून का मौसम आते ही तापमान में बदलाव के कारण सर्दी-जुकाम, फ्लू और वायरल बुखार का ग्राफ तेजी से ऊपर जाता है। जब कोई अस्थमा का मरीज इस वायरल इन्फेक्शन की चपेट में आता है, तो उसकी संवेदनशील सांस की नली (Airways) में गंभीर सूजन आ जाती है। इसके परिणामस्वरूप लगातार खांसी, छाती में घरघराहट (Wheezing) और सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले लेती है।
  • परागकण से एलर्जी और 'थंडरस्टॉर्म अस्थमा': आमतौर पर माना जाता है कि बारिश से प्रदूषण कम होता है, लेकिन तेज आंधी और भारी बारिश के दौरान हवा में मौजूद परागकण (Pollen grains) नमी सोखकर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाते हैं। हवा में फैले ये सूक्ष्म कण सांस लेते ही सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं, जिसे मेडिकल साइंस में 'थंडरस्टॉर्म अस्थमा' (Thunderstorm Asthma) कहा जाता है। इसके अलावा, बंद कमरों में एसी या कूलर की ठंडी और नम हवा भी सांस की नली में अचानक ऐंठन (Bronchospasm) पैदा कर देती है।

इस मौसम में वातावरण में क्या बदलता है?

  • नमी (Humidity) 70% से अधिक होना: हवा में अत्यधिक नमी होने के कारण फेफड़ों में बनने वाला बलगम (Mucus) काफी गाढ़ा और चिपचिपा हो जाता है, जिससे मरीजों के लिए इसे बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है।
  • तापमान का उतार-चढ़ाव: दिन में तेज उमस और रात में अचानक होने वाली ठंडक के कारण शरीर का तापमान असंतुलित होता है। यह थर्मल चेंज (Thermal Change) सांस की नली को सिकोड़ देता है।
  • वेंटिलेशन की कमी (बंद कमरे): बारिश के पानी और कीड़े-मकोड़ों से बचने के लिए लोग अक्सर खिड़की-दरवाजे बंद रखते हैं। क्रॉस-वेंटिलेशन (Cross Ventilation) न होने के कारण घर के अंदर मौजूद एलर्जन (Allergen) बाहर नहीं निकल पाते और हवा में ही जमा रहते हैं।

आम तौर पर लोग सोचते हैं कि बाहर बारिश में भीगने से दमा बढ़ता है, लेकिन घर के अंदर मौजूद 'सीलन (Mold)' और 'डस्ट माइट्स' कितने खतरनाक हैं? इनसे कैसे बचें?

अक्सर माना जाता है कि मानसून में बाहर भीगने से अस्थमा बढ़ता है, लेकिन भीगने से सिर्फ अस्थायी सर्दी-जुकाम ही होता है। असली खतरा तो घर के अंदर छिपी सीलन (Mold) और डस्ट माइट्स हैं, जो मरीजों को 24 घंटे बीमार रखते हैं।

सीलन/फफूंद (Mold): नमी के कारण दीवारों और कोनों में 24-48 घंटे में पनप जाती है। इसके बारीक बीजाणु सांस के जरिए फेफड़ों में जाकर तुरंत सूजन और तेज खांसी पैदा करते हैं। एस्परजिलस (Aspergillus) जैसी फफूंद फेफड़ों में गंभीर इन्फेक्शन भी कर सकती है।

डस्ट माइट्स (Dust Mites): ये अदृश्य सूक्ष्म जीव गद्दों, सोफों और कालीनों में लाखों की संख्या में बढ़ते हैं और तेज एलर्जिक रिएक्शन का कारण बनते हैं।

बचाव के 5 क्विक टिप्स:

  • सीलन साफ करें: दीवार पर फफूंद दिखने पर 1 भाग ब्लीच और 3 भाग पानी के घोल से साफ करें।
  • नमी नियंत्रित रखें: कमरे में डी-ह्यूमिडिफायर चलाएं ताकि नमी 50% से कम रहे।
  • गरम पानी से धुलाई: बिस्तर पर बिछी चादरों और तकिये के कवर को हफ्ते में एक बार 60°C गर्म पानी में धोएं।
  • HEPA वैक्यूम: साधारण झाड़ू से धूल उड़ती है, इसलिए HEPA फिल्टर वाले वैक्यूम क्लीनर से ही सफाई करें।
  • गीली चीजें हटाएं: भीगे कपड़े, तौलिए या जूते घर के अंदर जमा न होने दें।

मानसून के दौरान नियमित रूप से इन्हेलर लेना क्यों जरूरी है?

अस्थमा के मरीजों में यह एक बहुत ही आम प्रवृत्ति है कि जैसे ही उनके लक्षण (खांसी या सांस फूलना) ठीक होते हैं, वे अपना प्रिवेंटिव इन्हेलर (Preventive Inhaler) लेना छोड़ देते हैं। मानसून के दौरान ऐसा करना एक गंभीर अस्थमा अटैक को बुलावा देने जैसा है। इसमें मौजूद स्टेरॉयड सांस की नली की अंदरूनी सूजन को रोज कम करता है, जिससे फेफड़े मजबूत रहते हैं। इनहेलर बंद करने के कुछ दिन बाद तक मरीज को पता नहीं चलता, लेकिन अंदरूनी सूजन वापस आने लगती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना इसे कभी बंद न करें।

मानसून डाइट चार्ट: क्या खाएं, किससे बचें?

  • इनसे पूरी तरह बचें: फ्रिज का ठंडा पानी, आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स (ये बलगम गाढ़ा करते हैं)। ठंडे भोजन को हमेशा सामान्य तापमान (Room Temperature) पर लाकर ही खाएं।
  • फफूंद (Mold) वाली चीजों से परहेज: 4 घंटे से ज्यादा पुराना बासी खाना, खमीर उठी चीजें (इडली-डोसा बैटर), चीज, मशरूम और सीलन भरे ड्राई फ्रूट्स बिल्कुल न लें। इनमें एस्परजिलस (Aspergillus) फफूंद का खतरा होता है।
  • क्या खाएं: ताजा गर्म भोजन (सूप, खिचड़ी), गुनगुना पानी (अदरक-तुलसी के साथ) और ओमेगा-3 व विटामिन-C से भरपूर चीजें लें।

यदि किसी मरीज को रात के समय अचानक गंभीर अस्थमा अटैक आ जाए, तो अस्पताल पहुंचने से पहले घर पर क्या 'फर्स्ट एड' या इमरजेंसी स्टेप्स उठाने चाहिए?

  • मरीज को सीधा बैठाएं (लेटने न दें): मरीज को बिल्कुल सीधा बैठाएं। कुर्सी या बेड पर आगे की तरफ थोड़ा झुकाकर, हाथ घुटनों पर रखवाएं। इस पोजीशन से फेफड़ों को फैलने के लिए ज्यादा जगह मिलती है और सांस लेना आसान होता है। मरीज को लेटने बिल्कुल न दें, क्योंकि इससे सांस की नली पर दबाव बढ़ता है।
  • रिलीवर इन्हेलर या नेबुलाइज़र दें (2-2-2 का नियम) : मरीज को तुरंत नीले रंग का रिलीवर (Rescue) इन्हेलर दें।

'2-2-2' का नियम अपनाएं: पहले 2 पफ दें, 2 मिनट का इंतजार करें और देखें कि क्या सुधार है। आराम न मिलने पर 2 पफ और दें। आपातकाल में डॉक्टर की सलाह के अनुसार 20 मिनट के भीतर अधिकतम 10 पफ तक दिए जा सकते हैं।

नोट: यदि घर पर नेबुलाइजर (Nebulizer) मशीन उपलब्ध है, तो बिना देरी किए तुरंत 1 राउंड नेबुलाइजेशन शुरू कर दें।

  • कपड़े ढीले करें और वेंटिलेशन बढ़ाएं : मरीज के गले के बटन, टाई, दुपट्टा, चेस्ट के पास के कपड़े या बेल्ट को तुरंत ढीला करें। कमरे की खिड़की या पंखा खोलें ताकि ताजी हवा आ सके। मरीज के आसपास बिल्कुल भी भीड़ न लगाएं, क्योंकि इससे उनका पैनिक और दम घुटना बढ़ सकता है।
  • गुनगुना पानी दें (चाय-कॉफी से बचें) : यदि मरीज पानी पीने की स्थिति में है, तो उन्हें 1-2 घूंट गुनगुना पानी धीरे-धीरे पिलाएं। इससे गले की नली को आराम मिलता है और गाढ़ा बलगम थोड़ा ढीला होता है। इस दौरान मरीज को चाय, कड़क कॉफी या दूध जैसी चीजें बिल्कुल न दें।
  • तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं : यदि इन्हेलर के 2 राउंड (या 5 से 10 मिनट) के बाद भी मरीज को बिल्कुल आराम नहीं मिल रहा है, तो बिना समय गंवाए तुरंत नजदीकी हॉस्पिटल के लिए निकलें या एम्बुलेंस बुलाएं।

बच्चों और बुजुर्गों की इम्युनिटी कमजोर होती है। मानसून में उनके फेफड़ों को सुरक्षित रखने के लिए माता-पिता और तीमारदारों को किन विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए?

बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़े मानसून के दौरान मौसम और एलर्जी के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। उनकी कमजोर इम्युनिटी के कारण संक्रमण (Infections) बहुत तेजी से फैलता है। माता-पिता और तीमारदारों (Caregivers) को इन विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • थर्मल शॉक से बचाव: उन्हें एयर कंडीशनर (AC) की सीधी हवा से दूर रखें और कमरे का तापमान 24°C से 26°C के बीच ही मेंटेन करें। अचानक ठंडे कमरे से उमस या गर्मी में ले जाने से बचें।
  • हाइड्रेशन और न्यूट्रिशन: उन्हें पीने के लिए केवल गुनगुना पानी ही दें। फ्रिज का पानी, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम फेफड़ों में बलगम (Mucus) को गाढ़ा कर सकती हैं। डाइट में विटामिन-C (आंवला, संतरा) और ओमेगा-3 (अखरोट) शामिल करें।
  • इनडोर हाइजीन: बच्चे जमीन पर खेलते हैं और बुजुर्गों का समय कमरे में बीतता है। इसलिए कालीन हटा दें और रूम में सीलन व फंगस (Mold) बिल्कुल न पनपने दें। उनके बिस्तर की चादरों को हर हफ्ते गरम पानी में धोएं।
  • वैक्सीनेशन: पल्मोनोलॉजिस्ट की सलाह पर मानसून शुरू होने से पहले ही बुजुर्गों और बच्चों को फ्लू (Influenza) और न्यूमोकोकल वैक्सीन लगवाएं।

गोल्डन टिप: अगर बच्चे या बुजुर्ग को लगातार सूखी खांसी आ रही हो या सोते समय सांस फूल रही हो, तो इसे सामान्य मौसमी सर्दी न समझें और तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

Updated on:
11 Jul 2026 02:54 pm
Published on:
11 Jul 2026 02:54 pm