
Weight lifting : अक्सर जब हम 50 या 60 की उम्र पार कर चुके किसी व्यक्ति को फिटनेस रूटीन की सलाह देते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहला ख्याल आता है- पार्क में टहलना (Walking), योग या हल्की साइकलिंग। बेशक, ये एक्टिविटीज दिल की सेहत के लिए बेहतरीन हैं, लेकिन ये आपके शरीर के एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्से को नजरअंदाज कर देती हैं और वो हैं आपकी मांसपेशियां (Muscles) और हड्डियां (Bones)। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारा शरीर अंदर से कमजोर होने लगता है। लेकिन मेडिकल साइंस ने दावा किया है कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने, हड्डियों को फौलाद बनाने और बुढ़ापे में भी आत्मनिर्भर रहने का सबसे अचूक नुस्खा वेट लिफ्टिंग (Weight Lifting या Strength Training) है। आइए ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मिहिर थानवी से समझते हैं कि आखिर क्यों बढ़ती उम्र में डंबल्स उठाना आपके लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है।
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में वो पहली जैसी ताकत नहीं रहती? डिब्बे का ढक्कन खोलना या भारी सामान उठाना मुश्किल होने लगता है। इसे मेडिकल साइंस में सार्कोपेनिया (Sarcopenia) कहा जाता है। 30 साल की उम्र के बाद मानव शरीर हर दशक (10 साल) में 3% से 5% तक मांसपेशियां खोने लगता है। 50-60 की उम्र तक आते-आते यह रफ्तार और तेज हो जाती है। जब मांसपेशियां घटती हैं, तो शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है और कमजोरी हावी हो जाती है। वेट लिफ्टिंग ही एकमात्र ऐसा तरीका है जो इस प्रक्रिया को न सिर्फ रोकता है, बल्कि नई मांसपेशियों को बनाने में मदद करता है।
वेट लिफ्टिंग का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको पहले ही दिन 50 किलो का बारबेल उठाना है। इसकी शुरुआत बेहद आसान हो सकती है:
समाज में आम धारणा है कि 50 या 60 की उम्र के बाद भारी वजन उठाना खतरनाक हो सकता है और इससे जोड़ों या रीढ़ की हड्डी में चोट लग सकती है। इस बारे में आपकी क्या सलाह है?
इसका जवाब बहुत सीधा और सरल है। हमें बढ़ती उम्र के साथ विशेष रूप से 30 साल की उम्र के बाद से ही वजन उठाने (वेट लिफ्टिंग) का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए। वजन उठाने के इस अभ्यास को 'रेजिस्टेंस ट्रेनिंग' (Resistance Training) या 'वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज' (Weight Training Exercise) कहा जाता है। जब हम रेजिस्टेंस के खिलाफ काम करते हैं, तो इसके दो मुख्य फायदे होते हैं।
मैं यही सलाह दूंगा कि आपको 50 या 60 साल की उम्र के बाद भी वजन ज़रूर उठाना चाहिए। सही तरीके से ऐसा करने पर जोड़ों (joints) या रीढ़ की हड्डी (spine) में चोट लगने की आशंका बिल्कुल नहीं होती। इसके विपरीत, यदि आपकी मांसपेशियां पहले से कमजोर हैं और आप रेजिस्टेंस ट्रेनिंग नहीं कर रहे हैं, तो कमजोर मसल्स के कारण दैनिक कार्यों में भी खुद को चोट पहुंचाने का जोखिम कहीं ज्यादा बढ़ जाता है।
महिलाओं में मेनोपॉज (Menopause) के बाद बोन लॉस बहुत तेजी से होता है। उनके लिए वेट ट्रेनिंग कितनी अनिवार्य है और यह ऑस्टियोपोरोसिस को कैसे रिवर्स कर सकती है?
महिलाओं में 45 वर्ष की उम्र के बाद जब मेनोपॉज आता है, तो उनके शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन (Estrogen Hormone) का स्तर अचानक तेजी से गिर जाता है। इस हार्मोन की कमी के कारण हड्डियों की मजबूती कम होने लगती है और उनमें ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का खोखला और कमजोर होना) होने की आशंका बहुत बढ़ जाती है। अच्छी बात यह है कि वेट ट्रेनिंग (Weight Training) की मदद से इस स्थिति को काफी हद तक रिवर्स (ठीक) किया जा सकता है।
मांसपेशियों का विकास (Muscle Mass) और सुरक्षा
डायबिटीज (Type-2 Diabetes) और मेटाबॉलिक हेल्थ के मरीजों के लिए मांसपेशियां एक 'सिंक' (Glucose Sink) की तरह काम करती हैं। क्या वेट लिफ्टिंग से दवाइयों पर निर्भरता कम की जा सकती है?
यह बिल्कुल सच है। एक्सरसाइज करने से हमारी स्केलेटल मसल्स (कंकाल मांसपेशियां) एक्टिवेट होती हैं, जिससे मसल मास बढ़ता है और बोन डेंसिटी में सुधार होता है। हमारी मांसपेशियां 'ग्लूकोज सिंक' की तरह काम करती हैं क्योंकि वे ब्लड में से अतिरिक्त ग्लूकोज को सोख लेती हैं। इससे रक्त में शुगर की मात्रा कम और नियंत्रित रहती है। नियमित वेट लिफ्टिंग करने से शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है, जो डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है। जैसे-जैसे शरीर का ब्लड शुगर लेवल प्राकृतिक रूप से सामान्य होने लगता है, वैसे-वैसे मरीज की डायबिटीज की दवाइयों और इंसुलिन पर निर्भरता भी काफी हद तक कम हो जाती है।
क्या दिल के मरीजों (जैसे जिन्हें माइनर अटैक आया हो या जिनका ब्लड प्रेशर हाई रहता हो) के लिए वजन उठाना सुरक्षित है? उन्हें क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
ऐसे मरीजों के लिए वेट ट्रेनिंग सुरक्षित है। जिन मरीजों को दिल की मामूली समस्या है, उन्हें बहुत ज्यादा इंटेंस या एरोबिक एक्सरसाइज (जैसे तेज दौड़ना) करने से बचना चाहिए। इसके मुकाबले वेट ट्रेनिंग ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि इसमें आमतौर पर सांस नहीं फूलती।
जोड़ों के दर्द (Arthritis) से जूझ रहे बुजुर्गों के लिए क्या वजन उठाना दर्द को बढ़ाएगा या उसे ठीक करने में मदद करेगा?
यह सवाल अक्सर बुजुर्गों को असमंजस में डालता है, लेकिन इसका सीधा जवाब यह है कि वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज जोड़ों के दर्द को बढ़ाने के बजाय उसे कम करने में मदद करती है। इससे मांसपेशियां (Muscle Mass) मजबूत होती हैं। जब मसल्स मजबूत होती हैं, तो वे जोड़ों के लिए एक 'शॉक एब्जॉर्बर' का काम करती हैं, जिससे जोड़ों पर पड़ने वाला शरीर का सीधा दबाव कम हो जाता है। साथ ही हड्डियों के घनत्व (Bone Density) को भी बढ़ाती है, जिससे हड्डियां अंदर से मजबूत होती हैं और आर्थराइटिस के कारण होने वाली कमजोरी दूर होती है। इसलिए, अर्थराइटिस या जोड़ों के दर्द से पीड़ित बुजुर्गों को रेजिस्टेंस या वेट ट्रेनिंग से निश्चित रूप से बहुत फायदा मिलेगा।
उम्र बढ़ने के साथ रिकवरी धीमी हो जाती है। वर्कआउट के बाद मांसपेशियों की मरम्मत के लिए डाइट में प्रोटीन और न्यूट्रिशन का कैसा तालमेल रखना चाहिए?
आमतौर पर 30 साल की उम्र तक मानव शरीर पूरी तरह युवा और मजबूत रहता है। लेकिन 30 की उम्र पार करते ही (31 वर्ष में प्रवेश करते ही) शरीर के अंग और मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। वर्कआउट के बाद प्रभावित हुई मांसपेशियों की मरम्मत (Muscle Repair) के लिए प्रोटीन सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। इसलिए बढ़ती उम्र में प्रोटीन लेना बहुत जरूरी हो जाता है।
| पोषक तत्व (Nutrients) | सही अनुपात (%) | महत्व |
| प्रोटीन (Protein) | 70% | डाइट का सबसे बड़ा हिस्सा प्रोटीन होना चाहिए, जो मांसपेशियों की मरम्मत के लिए सबसे जरूरी है। |
| फैट (Healthy Fat) | 20% | भोजन में फैट की अपनी निश्चित जगह है, इसे 20% तक बनाए रखना चाहिए। |
| कार्बोहाइड्रेट (Carbs) | 10% | कार्बोहाइड्रेट को न्यूनतम (कम से कम) रखना चाहिए, क्योंकि उम्र बढ़ने पर यह बहुत अधिक फायदेमंद नहीं होता। |