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Weight lifting : क्या बढ़ती उम्र में में ‘वेट लिफ्टिंग’ करना सुरक्षित है? ऑर्थोपेडिक सर्जन से विस्तार से समझिए

Weight Lifting Benefits After 50: क्या आप भी बढ़ती उम्र में सिर्फ वॉक या योग पर निर्भर हैं? जानिए क्यों 50 की उम्र के बाद वेट लिफ्टिंग (Strength Training) आपके शरीर को बूढ़ा होने से बचा सकती है।

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Jun 18, 2026
Weight lifting Strength Training Healthy Aging Sarcopenia Brain-Derived Neurotrophic Factor
50 की उम्र में वेट लिफ्टिंग? (Photo: AI Generated)

Weight lifting : अक्सर जब हम 50 या 60 की उम्र पार कर चुके किसी व्यक्ति को फिटनेस रूटीन की सलाह देते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहला ख्याल आता है- पार्क में टहलना (Walking), योग या हल्की साइकलिंग। बेशक, ये एक्टिविटीज दिल की सेहत के लिए बेहतरीन हैं, लेकिन ये आपके शरीर के एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्से को नजरअंदाज कर देती हैं और वो हैं आपकी मांसपेशियां (Muscles) और हड्डियां (Bones)। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारा शरीर अंदर से कमजोर होने लगता है। लेकिन मेडिकल साइंस ने दावा किया है कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने, हड्डियों को फौलाद बनाने और बुढ़ापे में भी आत्मनिर्भर रहने का सबसे अचूक नुस्खा वेट लिफ्टिंग (Weight Lifting या Strength Training) है। आइए ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मिहिर थानवी से समझते हैं कि आखिर क्यों बढ़ती उम्र में डंबल्स उठाना आपके लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है।

Sarcopenia : 30 के बाद शुरू होता है मांसपेशियों का 'डिक्लाइन'

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में वो पहली जैसी ताकत नहीं रहती? डिब्बे का ढक्कन खोलना या भारी सामान उठाना मुश्किल होने लगता है। इसे मेडिकल साइंस में सार्कोपेनिया (Sarcopenia) कहा जाता है। 30 साल की उम्र के बाद मानव शरीर हर दशक (10 साल) में 3% से 5% तक मांसपेशियां खोने लगता है। 50-60 की उम्र तक आते-आते यह रफ्तार और तेज हो जाती है। जब मांसपेशियां घटती हैं, तो शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है और कमजोरी हावी हो जाती है। वेट लिफ्टिंग ही एकमात्र ऐसा तरीका है जो इस प्रक्रिया को न सिर्फ रोकता है, बल्कि नई मांसपेशियों को बनाने में मदद करता है।

शुरुआत कैसे करें? (घबराएं नहीं, जिम जाना जरूरी नहीं)

वेट लिफ्टिंग का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको पहले ही दिन 50 किलो का बारबेल उठाना है। इसकी शुरुआत बेहद आसान हो सकती है:

  • बॉडीवेट एक्सरसाइज: शुरुआत अपने शरीर के वजन से करें। जैसे कुर्सी पर उठना-बैठना (Chair Squats), दीवार के सहारे पुश-अप्स (Wall Push-ups)
  • हफ्ते में सिर्फ 2-3 दिन: शुरुआत में केवल 20 से 30 मिनट का सेशन ही काफी है। मांसपेशियों को रिकवर होने के लिए बीच में एक दिन का गैप जरूर दें।
  • प्रोग्रेसिव ओवरलोड: जब शरीर को आदत हो जाए, तो पानी की भरी बोतलें या 1-2 किलो के हल्के डंबल्स का इस्तेमाल शुरू करें।

पत्रिका के सवाल-जवाब डॉ. मिहिर थानवी के साथ

समाज में आम धारणा है कि 50 या 60 की उम्र के बाद भारी वजन उठाना खतरनाक हो सकता है और इससे जोड़ों या रीढ़ की हड्डी में चोट लग सकती है। इस बारे में आपकी क्या सलाह है?

इसका जवाब बहुत सीधा और सरल है। हमें बढ़ती उम्र के साथ विशेष रूप से 30 साल की उम्र के बाद से ही वजन उठाने (वेट लिफ्टिंग) का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए। वजन उठाने के इस अभ्यास को 'रेजिस्टेंस ट्रेनिंग' (Resistance Training) या 'वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज' (Weight Training Exercise) कहा जाता है। जब हम रेजिस्टेंस के खिलाफ काम करते हैं, तो इसके दो मुख्य फायदे होते हैं।

  • मांसपेशियों का विकास: हमारी मसल्स (muscles) मजबूत होती हैं और उनका आकार बढ़ता है।
  • हड्डियों की मजबूती: इससे हमारी बोन डेंसिटी (Bone Density) बढ़ती है, जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं।

मैं यही सलाह दूंगा कि आपको 50 या 60 साल की उम्र के बाद भी वजन ज़रूर उठाना चाहिए। सही तरीके से ऐसा करने पर जोड़ों (joints) या रीढ़ की हड्डी (spine) में चोट लगने की आशंका बिल्कुल नहीं होती। इसके विपरीत, यदि आपकी मांसपेशियां पहले से कमजोर हैं और आप रेजिस्टेंस ट्रेनिंग नहीं कर रहे हैं, तो कमजोर मसल्स के कारण दैनिक कार्यों में भी खुद को चोट पहुंचाने का जोखिम कहीं ज्यादा बढ़ जाता है।

महिलाओं में मेनोपॉज (Menopause) के बाद बोन लॉस बहुत तेजी से होता है। उनके लिए वेट ट्रेनिंग कितनी अनिवार्य है और यह ऑस्टियोपोरोसिस को कैसे रिवर्स कर सकती है?

महिलाओं में 45 वर्ष की उम्र के बाद जब मेनोपॉज आता है, तो उनके शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन (Estrogen Hormone) का स्तर अचानक तेजी से गिर जाता है। इस हार्मोन की कमी के कारण हड्डियों की मजबूती कम होने लगती है और उनमें ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का खोखला और कमजोर होना) होने की आशंका बहुत बढ़ जाती है। अच्छी बात यह है कि वेट ट्रेनिंग (Weight Training) की मदद से इस स्थिति को काफी हद तक रिवर्स (ठीक) किया जा सकता है।

मांसपेशियों का विकास (Muscle Mass) और सुरक्षा

  • वेट ट्रेनिंग से मांसपेशियों का द्रव्यमान (Muscle Mass) बढ़ता है।
  • मसल्स मजबूत होने से शरीर का संतुलन बेहतर होता है, जिससे अचानक गिरने की संभावना कम हो जाती है।
  • जब गिरने के चांस कम होंगे, तो फ्रैक्चर का खतरा, शारीरिक विकलांगता (disability) और हॉस्पिटल में भर्ती होने की नौबत भी कम आएगी। इससे आपकी ओवरऑल मॉर्टेलिटी (असमय मृत्यु का जोखिम) भी काफी घट जाती है।
  • बोन डेंसिटी (Bone Density) में सुधार : वेट ट्रेनिंग से हड्डियों का घनत्व (Bone Density) बढ़ता है। यह एक्सरसाइज हड्डियों के नए निर्माण (Bone Formation) की प्रक्रिया को उत्तेजित (stimulate) करती है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस रिवर्स होने लगता है।
  • बेहतर ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म (Glucose Metabolism) : हमारे शरीर में कुछ 'ग्लूकोज़ सिंक' (Glucose Sinks) होते हैं, जैसे हमारी स्केलेटल मसल्स (skeletal muscles), लिवर और फैटी टिश्यूज। ये सिंक शरीर में अतिरिक्त शुगर को सोखने का काम करते हैं। जब हम खाने के बाद वॉक या एक्सरसाइज करते हैं, तो हमारे ब्लड में बढ़ने वाला शुगर लेवल इन स्केलेटल मसल्स द्वारा तेजी से सोख लिया जाता है। इससे शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी (Insulin Sensitivity) बढ़ती है और डायबिटीज (मधुमेह) का खतरा बेहद कम हो जाता है।
  • बेली फैट और अन्य बीमारियों में कमी : पेट के आसपास जमा होने वाला फैट (बेली फैट) सेहत के लिए सबसे ज्यादा घातक होता है। वेट ट्रेनिंग इसे तेजी से कम करती है। बेली फैट घटने से दिल की बीमारियां (Heart Diseases), फैटी लिवर और कुछ खास तरह के कैंसर से बचाव (Prevention) होता है।
  • इन्फ्लेमेशन (Inflammation) को कम करना : वेट ट्रेनिंग का एक आखिरी और बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर के अंदरूनी इन्फ्लेमेशन (सूजन या जलन) को कम करती है, जो कई क्रॉनिक बीमारियों की जड़ है।

डायबिटीज (Type-2 Diabetes) और मेटाबॉलिक हेल्थ के मरीजों के लिए मांसपेशियां एक 'सिंक' (Glucose Sink) की तरह काम करती हैं। क्या वेट लिफ्टिंग से दवाइयों पर निर्भरता कम की जा सकती है?

यह बिल्कुल सच है। एक्सरसाइज करने से हमारी स्केलेटल मसल्स (कंकाल मांसपेशियां) एक्टिवेट होती हैं, जिससे मसल मास बढ़ता है और बोन डेंसिटी में सुधार होता है। हमारी मांसपेशियां 'ग्लूकोज सिंक' की तरह काम करती हैं क्योंकि वे ब्लड में से अतिरिक्त ग्लूकोज को सोख लेती हैं। इससे रक्त में शुगर की मात्रा कम और नियंत्रित रहती है। नियमित वेट लिफ्टिंग करने से शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है, जो डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है। जैसे-जैसे शरीर का ब्लड शुगर लेवल प्राकृतिक रूप से सामान्य होने लगता है, वैसे-वैसे मरीज की डायबिटीज की दवाइयों और इंसुलिन पर निर्भरता भी काफी हद तक कम हो जाती है।

क्या दिल के मरीजों (जैसे जिन्हें माइनर अटैक आया हो या जिनका ब्लड प्रेशर हाई रहता हो) के लिए वजन उठाना सुरक्षित है? उन्हें क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

ऐसे मरीजों के लिए वेट ट्रेनिंग सुरक्षित है। जिन मरीजों को दिल की मामूली समस्या है, उन्हें बहुत ज्यादा इंटेंस या एरोबिक एक्सरसाइज (जैसे तेज दौड़ना) करने से बचना चाहिए। इसके मुकाबले वेट ट्रेनिंग ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि इसमें आमतौर पर सांस नहीं फूलती।

  • हफ्ते में 2 से 3 बार: शुरुआत में सप्ताह में केवल दो से तीन बार ही वेट ट्रेनिंग करें।
  • शरीर के संकेत समझें: यदि एक्सरसाइज या वजन उठाते समय थोड़ी भी सांस फूले, तो तुरंत रुकें या गति धीमी कर लें।
  • समय सीमा तय करें: हर मरीज की क्षमता अलग होती है। अगर आपको आधे घंटे में थकान या सांस फूलने की शिकायत होती है, तो वर्कआउट का समय घटाकर 15 मिनट कर दें।
  • जरूरत से ज़्यादा एक्सरसाइज करना दिल के मरीजों के लिए हानिकारक हो सकता है, इसलिए हमेशा डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह पर ही इसे शुरू करें।

जोड़ों के दर्द (Arthritis) से जूझ रहे बुजुर्गों के लिए क्या वजन उठाना दर्द को बढ़ाएगा या उसे ठीक करने में मदद करेगा?

यह सवाल अक्सर बुजुर्गों को असमंजस में डालता है, लेकिन इसका सीधा जवाब यह है कि वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज जोड़ों के दर्द को बढ़ाने के बजाय उसे कम करने में मदद करती है। इससे मांसपेशियां (Muscle Mass) मजबूत होती हैं। जब मसल्स मजबूत होती हैं, तो वे जोड़ों के लिए एक 'शॉक एब्जॉर्बर' का काम करती हैं, जिससे जोड़ों पर पड़ने वाला शरीर का सीधा दबाव कम हो जाता है। साथ ही हड्डियों के घनत्व (Bone Density) को भी बढ़ाती है, जिससे हड्डियां अंदर से मजबूत होती हैं और आर्थराइटिस के कारण होने वाली कमजोरी दूर होती है। इसलिए, अर्थराइटिस या जोड़ों के दर्द से पीड़ित बुजुर्गों को रेजिस्टेंस या वेट ट्रेनिंग से निश्चित रूप से बहुत फायदा मिलेगा।

उम्र बढ़ने के साथ रिकवरी धीमी हो जाती है। वर्कआउट के बाद मांसपेशियों की मरम्मत के लिए डाइट में प्रोटीन और न्यूट्रिशन का कैसा तालमेल रखना चाहिए?

आमतौर पर 30 साल की उम्र तक मानव शरीर पूरी तरह युवा और मजबूत रहता है। लेकिन 30 की उम्र पार करते ही (31 वर्ष में प्रवेश करते ही) शरीर के अंग और मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। वर्कआउट के बाद प्रभावित हुई मांसपेशियों की मरम्मत (Muscle Repair) के लिए प्रोटीन सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। इसलिए बढ़ती उम्र में प्रोटीन लेना बहुत जरूरी हो जाता है।

  • प्राकृतिक आहार (Diet): इसके लिए दैनिक भोजन में दूध, सोयाबीन, पनीर और दालों जैसी चीजों को प्रमुखता से शामिल किया जा सकता है।
  • प्रोटीन पाउडर (Protein Powder): बुजुर्गों में अक्सर यह देखा जाता है कि वे बहुत अधिक मात्रा में भोजन नहीं कर पाते। कई बार भारी भोजन या हाई-प्रोटीन डाइट से उन्हें पेट फूलने (bloating), गैस या पेट दर्द जैसी पाचन संबंधी समस्याएं होने लगती हैं। ऐसे बुजुर्ग जो कम खाकर भी भरपूर पोषण चाहते हैं, उनके लिए प्रोटीन पाउडर एक बेहतरीन और सुरक्षित विकल्प है। इसके मात्र एक या दो स्कूप से ही शरीर को 'कंसंट्रेटेड प्रोटीन' (Concentrated Protein) मिल जाता है, जिसे पचाना भी आसान होता है।
  • बढ़ती उम्र में बेहतर रिकवरी और सार्कोपीनिया के असर को बेअसर करने के लिए भोजन में पोषक तत्वों (प्रोटीन, फैट और कार्बोहाइड्रेट) का संतुलन बेहद सटीक होना चाहिए।
पोषक तत्व (Nutrients)सही अनुपात (%)महत्व
प्रोटीन (Protein)70%डाइट का सबसे बड़ा हिस्सा प्रोटीन होना चाहिए, जो मांसपेशियों की मरम्मत के लिए सबसे जरूरी है।
फैट (Healthy Fat)20%भोजन में फैट की अपनी निश्चित जगह है, इसे 20% तक बनाए रखना चाहिए।
कार्बोहाइड्रेट (Carbs)10%कार्बोहाइड्रेट को न्यूनतम (कम से कम) रखना चाहिए, क्योंकि उम्र बढ़ने पर यह बहुत अधिक फायदेमंद नहीं होता।
Published on:
18 Jun 2026 03:43 pm