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करियर की अंधी दौड़ और टूटते दिल का दर्द? 15-24 साल की उम्र में मेंटल हेल्थ प्रॉबल्म्स से जूझ रहे आपके बच्चे

Youth Depression: देश में सिर्फ गर्मी का पारा नहीं बल्कि युवाओं में मानसिक तनाव का ग्राफ भी तेजी से चढ़ रहा है। एक अकेले ग्वालियर के आरोग्य अस्पताल में ओपीडी में 20 फीसदी तक मरीज बढ़े हैं। इनमें बड़ी संख्या 24 साल की उम्र के आसपास के युवाओं की है। ये वे युवा हैं, जो ब्रेकअप, लव अफेयर या परीक्षा का पैनिक प्रेशर झेल रहे हैं। जानिए क्या कहते हैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आंकडे़

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Youth Depression in India (AI Generated Creative)

Youth Depression in India: मानसिक आरोग्यशाला में सिर्फ गर्मी का पारा ही नहीं, बल्कि युवाओं के मानसिक तनाव का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है। अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या में 20 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है और इन नए आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली हकीकत सामने ला दी है। आज की युवा पीढ़ी में लव अफेयर का टूटना और प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव ही उनके डिप्रेशन और एंग्जायटी (Youth Depression in India) का सबसे बड़ा ट्रिगर बन रहा है। हर दिन ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में से 20 प्रतिशत से अधिक लोग इन्हीं कारणों से मानसिक उलझनों से जूझ रहे हैं।

अस्पतालों की ओपीडी में पैर रखने पर जो हकीकत सामने आ रही है, वह वाकई चौंकाने वाली है। देश का भविष्य कही जाने वाली युवा पीढ़ी आज टूटी और मानसिक उलझनों में फंसी हुई है। NEET परीक्षा कैंसिल होने के बाद देशभर से आत्महत्या के तीन मामले सामने आ चुके हैं। जो बताते हैं कि युवा कैसे टूट रहे हैं। डिप्रेशन-एंग्जाइटी के मामलों पर पढ़ें patrika.com की रिपोर्ट...

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24 की उम्र में अकेलापन और टूटते प्रेम प्रसंग

ग्वालियर की मानसिक आरोग्यशाला पहुंच रहे युवाओं में एक बड़ी संख्या उन युवक युवतियों की है, जिनकी लव लाइफ में विवाद हुए या रिश्ते टूट गए। साथी से अलग होने के बाद ये युवा खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन, लगातार उदासी, मन का गुमसुम रहना और यहां तक कि खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर लक्षण (Youth Depression in India) देखे जा रहे हैं।

Break Up a reason for depression (photo:freepik)

चिंता की बात यह है कि इनमें ज्यादातर युवक और युवतियां 24 साल के आसपास के हैं, जो अपने परिजनों के साथ इलाज और काउंसलिंग के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं।

करियर की अंधी दौड़ में पैनिक अटैक

एक तरफ जहां रिश्तों का बिखराव है, वहीं दूसरी तरफ करियर की भागदौड़ है। इसे अंधी दौड़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। जैसे-जैसे प्रतियोगी परिक्षाओं की तारीख करीब आती है, स्टूडेंट्स के बीच पैनिक अटैक और गंभीर एंग्जाइटी (Youth Depression in India) के मामले बढ़ जाते हैं।

नींद और भूख हो रही प्रभावित

दिनरात पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीदें और असफल होने का डर उनके मानसिक संतुलन को इस कदर बिगाड़ रहा है कि उनकी नींद और भूख प्रभावित (Youth Depression in India) हो रही है।

Panic Attack due to depression (photo:freepik)

माता-पिता का प्रेशर

ओपीडी में ऐसे छात्र भी आ रहे हैं जिन्हें माता-पिता के दबाव में अपनी पसंद के विरुद्ध विषय चुनने पड़े। यह आंतरिक दबाव उनकी मानसिक टेंशन को और बढ़ा रहा है। संभ्रांत और अच्छे परिवारों के बच्चे भी इस तनाव को झेल नहीं पा रहे हैं और काउंसलिंग का सहारा ले रहे हैं।

किसी एक वर्ग की नहीं हर किसी की समस्या है

ऐसा नहीं है कि ये मामले (Youth Depression in India) किसी एक वर्ग के स्टूडेंट्स में ही देखे जा रहे हैं। बल्कि ये मामले हर वर्ग के परिवारों में सामने आए हैं। संभ्रांत और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के बच्चे भी इस आंतरिक तनाव को झेल नहीं पा रहे हैं। उन्हें भी मनोचिकित्सकों का सहारा लेना पड़ रहा है।

क्या कहते हैं नेशनल और ग्लोबल आंकड़े

यह मामला अकेले ग्वालियर का है। लेकिन असल में मध्य प्रदेश और देश की तस्वीर और भी चिंताजनक है।

ट्रीटमेंट गैप

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश में मानसिक समस्याओं से जूझ रहे 83% से 85% लोगों को सही समय पर उचित इलाज या काउंसलिंग नहीं मिल पाती। यही स्थिति ट्रीटमेंट गैप कहलाती है। मेट्रो शहरों और शहरी इलाकों में यह दर 8.1 फीसदी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

रिपोर्ट्स में दिखा साइलेंट पेंडेमिक ट्रेंड

NCRB रिपोर्ट 2025 के मुताबिक एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड्स इन इंडिया की हाल ही की रिपोर्ट बताती है कि भारत में युवाओं खास तौर पर 15-29 साल के युवाओं में सुसाइड का ट्रेंड दिखता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा परीक्षाओं का दबाव, करियर की चिंता और पारिवारिक रिश्तों के विवादों जैसे लव अफेयर या ब्रेकअप (Youth Depression in India)से जुड़ा है।

IPSOS ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 2024-25 के मुताबिक भारत में करीब 31 फीसदी लोग यानी हर तीसरा भारतीय दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक लगातार उदासी, निराशा और डिप्रेशन से जूझता है। यह आंकड़ा वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है।

रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में शामिल है, जहां लोग काम या पढ़ाई से मानसिक तनाव और डिप्रेशन के कारण छुट्टियां लेते हैं।

ग्लोबल माइंड हेल्थ प्रोजेक्ट के तहत 84 देशों में सर्वे किया गया था। 2024-25 की इस सर्वे रिपोर्ट में 18-34 साल के युवाओं के मानसिक सूचकांक के मामले मे बारत का स्थान 60वां है। यह दिखाता है कि भारत की युवा पीढ़ी मानसिक रूप से कितनी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।

UNICEF और NCERT द्वारा स्टूडेंट्स पर किए गए एक सर्वे 2022 की रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में हर 7 में से 1 किशोर (10-19 साल के) डिप्रेशन और एंग्जाइटी से पीड़ित है। NCERT के एक सर्वे में सामने आया था कि 43 फीसदी स्टूडेंट्स पढ़ाई और परीक्षा के कारण गंभीर मूड स्विंग्स और एंग्जाइटी का सामना कर रहे हैं।

जबकि NIMHANS के ऐतिहासिक नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में 85 फीसदी लोगों में ट्रीटमेंट गैप है। जो हाल के वर्षों में IPSOS (2024) और सरकार के टेली मानस हेल्पलाइन (2026) के आंकड़ों के अनुसार युवाओं में भयावह रूप ले चुका है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और डॉक्टर्स की कमी

WHO के मानक के मुताबिक प्रति 1 लाख की आबादी पर कम से कम 1 साइकियाट्रिस्ट (Youth Depression in India) होना चाहिए। लेकिन भारत की स्थिति पर नजर डालें तो यहां प्रति 1 लाख की आबादी पर केवल 0.3 से 0.75 साइकियाट्रिस्ट हैं। यह जरूरत से कहीं ज्यादा कम है। चौंकाने वाली यह जानकारी तब सामने आई जब 2023-2025 के बीच संसद में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा लिखित जवाब दिए गए।

टेली मानस (TELE MANAS) बना सहारा

बढ़ते संकट को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से शुरू की गई राष्ट्रीय हेल्पलाइन TELE MANAS (1416) देश के युवाओं के लिए सहारा बना हुआ है। इस राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर पर अब तक 28 लाख से ज्यादा कॉल्स आ चुकी हैं। इससे यह तो साफ है कि युवा अब अपनी मानसिक हालत और उलझनों पर बात करना चाहता है। उसे किसी सहारे किसी मदद की तलाश है।

Tele manas helpline number (photo: representation image)

डॉक्टर्स की सलाह

अब तक सामने आए कई मामलों में यह भी ट्रेंड दिखता है कि लोग अपने बच्चों या परिवार के सदस्य को इस तरह की स्थिति में डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय झाड़-फूंक करवाते हैं। बाबाओं और ओझा के चक्कर में पड़ते हैं। जबकि अगर आपके परिवार या आसपास के किसी भी व्यक्ति के स्वभाव में अचानक चिड़चिड़ापन, लगातार उदासी, नींद न आना या बिना किसी वजह के घबराहट जैसे लक्षण दिखें तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें। इस मौसम में शरीर को पूरी तरह से हाइड्रेट रखें और पर्याप्त नींद लें। तनाव बढ़ने पर घरेलू नुस्था या झाड-फूंक का सहारा लेने के बजाय मनोचिकित्सक (Youth Depression in India)की सलाह लें।

-डॉ. संजय लहारिया, संचालक, मानसिक आरोग्यशाला, ग्वालियर।

नोट- अगर आपका कोई अपना भी मानसिक तनाव या डिप्रेशन से गुजर रहा है, तो भारत सरकार के टॉल फ्री राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर टेली-मानस पर 14416 या 1800 पर कॉल करें, काउंसलिंग लें। मानसिक स्वास्थय सही रहना जरूरी है इससे कतई समझौता न करें।

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Updated on:
16 May 2026 04:35 pm
Published on:
17 May 2026 07:00 am
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