
भारत में करोड़ों किसानों की जमीन का रिकॉर्ड अब डिजिटल हो चुका है। किसान घर बैठे खसरा, खतौनी, जमाबंदी और भू-नक्शा देख सकते हैं। लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड के बावजूद एक बड़ी समस्या आज भी सामने आती है। खेत का नक्शा (भू-नक्शा) और राजस्व रिकॉर्ड (खसरा-खतौनी, जमाबंदी आदि) का आपस में मेल न खाना।
कई किसानों को इसका पता तब चलता है जब जमीन अधिग्रहण का मामला आता है, सड़क या नहर निर्माण की योजना बनती है, मुआवजा तय होता है या किसी सरकारी योजना का लाभ लेना होता है। ऐसे समय पर रिकॉर्ड में छोटी सी गलती भी आर्थिक नुकसान और लंबे विवाद का कारण बन सकती है।
भूमि से जुड़े दो महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। पहला, भू-नक्शा (Cadastral Map), जिसमें खेत की वास्तविक स्थिति, सीमाएं, रास्ते और आसपास की भूमि का विवरण दिखाया जाता है।
दूसरा, राजस्व रिकॉर्ड जैसे खसरा, खतौनी, जमाबंदी या रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RoR), जिनमें मालिक का नाम, खाता संख्या, खसरा संख्या, क्षेत्रफल और भूमि की श्रेणी दर्ज होती है। आदर्श स्थिति में दोनों रिकॉर्ड एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाने चाहिए। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता।
इस समस्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे आम कारण पुराने सर्वेक्षण और नए डिजिटल रिकॉर्ड के बीच अंतर है। कई राज्यों में दशकों पुराने कागजी नक्शों को डिजिटल रूप दिया गया, जिसके दौरान कुछ त्रुटियां भी दर्ज हो गईं।
इसके अलावा, भूमि बंटवारा, उत्तराधिकार, चकबंदी, सड़क निर्माण, नहर परियोजनाएं या प्राकृतिक बदलावों के बाद रिकॉर्ड समय पर अपडेट नहीं हो पाते।
कुछ मामलों में खेत का वास्तविक क्षेत्रफल और रिकॉर्ड में दर्ज क्षेत्रफल अलग-अलग दिखाई देता है। वहीं कई जगह नक्शे में रास्ता दिखता है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में उसका उल्लेख नहीं होता।
रिकॉर्ड में अंतर का सबसे बड़ा नुकसान जमीन मालिक को ही होता है। जब तक खेती सामान्य रूप से चल रही होती है, तब तक यह समस्या नजर नहीं आती। लेकिन जैसे ही जमीन से जुड़ा कोई कानूनी या सरकारी मामला सामने आता है, रिकॉर्ड की खामियां बड़ी परेशानी बन सकती हैं।
यदि सरकार किसी सड़क, रेलवे लाइन, औद्योगिक परियोजना, नहर या अन्य सार्वजनिक कार्य के लिए जमीन अधिग्रहित करती है, तो मुआवजा राजस्व रिकॉर्ड और सर्वेक्षण के आधार पर तय किया जाता है। यदि रिकॉर्ड में क्षेत्रफल कम दर्ज है या नक्शे में सीमा अलग दिखाई गई है, तो अधिग्रहण की वास्तविक स्थिति को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।
ऐसी स्थिति में किसान को यह साबित करने में कठिनाई हो सकती है कि वास्तव में उसकी कितनी जमीन प्रभावित हुई है। कई बार गलत रिकॉर्ड के कारण मुआवजा तय होने में देरी भी हो जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली लाइन, नहर और सिंचाई परियोजनाओं के दौरान अक्सर भूमि सीमाओं को लेकर विवाद सामने आते हैं। यदि नक्शे में खेत का रास्ता दिख रहा है लेकिन रिकॉर्ड में उसका उल्लेख नहीं है, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि रास्ता सार्वजनिक है या निजी। ऐसे विवाद परियोजनाओं को धीमा कर सकते हैं और कई बार किसानों तथा प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा कर सकते हैं।
आज अधिकांश कृषि योजनाएं डिजिटल भूमि रिकॉर्ड से जुड़ी हुई हैं। पीएम किसान सम्मान निधि, किसान रजिस्ट्री (Agristack), फसल बीमा, कृषि सब्सिडी और अन्य योजनाओं में भूमि रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाता है।
यदि खसरा संख्या, क्षेत्रफल, नाम या अन्य जानकारी में अंतर मिलता है, तो आवेदन लंबित हो सकता है या भुगतान रुक सकता है।कई किसान महीनों तक यह समझ नहीं पाते कि योजना का लाभ क्यों नहीं मिल रहा, जबकि असली समस्या रिकॉर्ड की त्रुटि होती है।
किसान समय-समय पर अपने खेत का भू-नक्शा और राजस्व रिकॉर्ड दोनों की जांच कर सकते हैं।
यदि कोई अंतर दिखाई देता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
यदि भू-नक्शा और रिकॉर्ड में अंतर दिखाई दे, तो संबंधित तहसील कार्यालय या राजस्व विभाग से संपर्क करना चाहिए। आमतौर पर किसान निम्न कदम उठा सकता है।
सुधार के लिए आवेदन करें : तहसीलदार या संबंधित राजस्व अधिकारी के समक्ष लिखित आवेदन दें।
संयुक्त सर्वेक्षण की मांग करें : यदि जमीन की सीमा या क्षेत्रफल को लेकर विवाद है, तो राजस्व विभाग से दोबारा सर्वेक्षण कराने का अनुरोध किया जा सकता है।