
Birsa Gond Freedom Fighter: बैतूल की धरती पर 19 अगस्त 1942 का दिन शायद किसी आम दिन की तरह शुरू हुआ होगा। लेकिन शाम तक घोड़ाडोंगरी की जमीन स्वतंत्रता संग्राम के खून से रंग चुकी थी। भारत छोड़ो आंदोलन की आग पूरे देश में फैल चुकी थी। बड़े शहरों से लेकर जंगलों और आदिवासी गांवों तक एक ही भावना लोगों को जोड़ रही थी। अब अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देनी है।
बैतूल के घोड़ाडोंगरी-शाहपुर क्षेत्र में भी आदिवासी समाज आंदोलन के लिए संगठित हो रहा था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार विष्णु गोंड के नेतृत्व में बड़ी संख्या में आदिवासी आंदोलनकारी घोड़ाडोंगरी रेलवे स्टेशन के पास जुटे। उनका निशाना था अंग्रेजी शासन की वह व्यवस्था, जिसके सहारे सरकार दूर-दराज के इलाकों तक अपना नियंत्रण बनाए हुए थी। इस भीड़ में एक नाम था विरसा गोंड, जो आजादी के इतिहास की कहानियों में कहीं खो गया था।
आंदोलनकारियों ने रेलवे की पटरियां उखाड़ दीं और स्टेशन के पीछे मौजूद विशाल सरकारी लकड़ी डिपो में आग लगा दी। यह सिर्फ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटना नहीं थी। उस समय रेलवे अंग्रेजी शासन के लिए परिवहन और प्रशासन की महत्वपूर्ण धुरी थी। इसलिए घोड़ाडोंगरी की घटना ने स्थानीय प्रशासन को हिला दिया।
आंदोलनकारियों को शायद अंदाजा था कि अब पुलिस आएगी। लेकिन जो हुआ, वह इससे कहीं ज्यादा भयावह था। जंगल से पुलिस आई और गोलियां चल गईं। पुलिस और वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। बताया जाता है कि पुलिस ने बिना चेतावनी गोलीबारी शुरू कर दी थी। अचानक हुई गोलाबारी से भीड़ में भगदड़ मच गई। लेकिन उस अफरातफरी में एक युवा आंदोलनकारी गोली की चपेट में आ गया। और उसका नाम था बीरसा गोंड।
एक तरफ अंग्रेजी सत्ता की बंदूकें थीं। दूसरी तरफ अपने जंगल, अपनी जमीन और अपने देश के लिए खड़े आदिवासी और इसी टकराव में वीरसा गोंड ने अपनी जान गंवा दी। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
उस दिन सिर्फ बीरसा गोंड की जिंदगी नहीं गई। उनके साथी जीरा गोंड को भी गिरफ्तार किया गया और बाद में जेल में उनकी मृत्यु हो गई। उपलब्ध स्रोतों में दोनों का नाम घोड़ाडोंगरी के 1942 के आंदोलन और उसके बाद हुए दमन से जुड़ा मिलता है। एक ही घटनाक्रम में दो देशभक्त खो गए थे। एक गोली से, दूसरा जेल की दीवारों के भीतर। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत इसके बाद भी इस इलाके की आवाज पूरी तरह दबा नहीं सकी।
दरअसल स्वतंत्रता संग्राम की हमारी सामान्य तस्वीर में अक्सर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लाहौर और इलाहाबाद दिखाई देते हैं। लेकिन आजादी की लड़ाई बैतूल के जंगलों में भी लड़ी जा रही थी। वहां लड़ने वालों के पास बड़े मंच नहीं थे। उनके पास अखबारों की ताकत नहीं थी। उनके नाम बड़े राजनीतिक भाषणों में नहीं गूंजते थे।
लेकिन जब देश ने अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान किया, तो घोड़ाडोंगरी के आदिवासी भी पीछे नहीं रहे। वीरसा गोंड उसी संघर्ष की शहादत है।
विरसा गोंड शायद यह नहीं जानते थे कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें कितनी याद रखेंगी। शायद उनके सामने कोई स्मारक नहीं था। कोई कैमरा नहीं था। लेकिन उनके बलिदान की कहानी इतिहास के दस्तावेजों और स्थानीय स्मृतियों में बची रही। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा देखते हैं, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस तिरंगे तक पहुंचने का रास्ता केवल बड़े नेताओं के संघर्ष से नहीं लहराया गया, इस रास्ते में हजारों अनजान लोगों का खून भी शामिल था, वीरसा गोंड उनमें से एक थे।
विरसा गोंड की कहानी हमें किसी काल्पनिक संवाद की जरूरत नहीं देती। उनकी शहादत ही उनका संदेश है। 19 अगस्त 1942 को घोड़ाडोंगरी में गोली चली। एक युवा आदिवासी आंदोलनकारी गिर पड़ा। लेकिन जिस आजादी के लिए वह खड़ा हुआ था, वह भावना नहीं गिरी। कुछ वर्षों बाद अंग्रेजी शासन खत्म हुआ और भारत आजाद हुआ।