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300 से ज्यादा पुलिसकर्मी जिस युवक को पकड़ने पहुंचे, उसे अंग्रेजों ने सुनाई थी फांसी की सजा

Avantilal Jain: प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से एक था अवंती, आज महाकाल की नगरी उज्जैन है, आजादी के लिए अपनी जान लुटाने वाला एक परवाना यहां भी था। देशभक्त को पकड़ने अंग्रेजी हुकूमत को इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल लगाना पड़ा था
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 11, 2026

Freedom fighter Avanti Lal Jain

Freedom fighter Avanti Lal Jain: AI Creative

Avantilal Jain Freedom Fighter India: उज्जैन की गलियों में आज हजारों लोग रोज गुजरते हैं। लेकिन इसी शहर में एक ऐसा नाम भी रहा, जिसके पीछे अंग्रेजी हुकूमत ने कभी 300 से ज्यादा सैनिक और पुलिसकर्मी लगा दिए थे। आजादी की लड़ाई में सहयोग देने वाला ये नाम था अवंती लाल जैन।

22 सितंबर 1921 को उज्जैन में जन्मे अवंती लाल ने महज 18 साल की उम्र में राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक उनके पिता का नाम रामलाल जैन था, जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से थे। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन की नहीं है। उनकी राजनीतिक सक्रियता इससे पहले ही शुरू हो चुकी थी।

18 साल की उम्र में हैदराबाद पहुंचे

अवंती लाल जैन शुरुआत में आर्य समाज के आह्वान पर हैदराबाद गए, जहां उन्होंने तत्कालीन रियासत में निजाम की नीतियों और अत्याचारों के खिलाफ सत्याग्रह में भाग लिया। वहां उन्हें गिरफ्तार किया गया और हिरासत के दौरान कई यातनाएं भी झेलनी पड़ी। बाद में उन्हें गुलबर्गा जेल ले जाया गया। यानी जिस उम्र में ज्यादातर युवा अपने भविष्य की दिशा तय कर रहे थे, अवंती लाल ब्रिटिश शासन और रियासती सत्ता के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय हो चुके थे।

300 से ज्यादा पुलिसकर्मी लेकर उज्जैन पहुंची अंग्रेजी पुलिस

उनकी गतिविधियों से ब्रिटिश प्रशासन इतना परेशान था कि दिसंबर 1940 में 300 से अधिक सैनिक और पुलिस अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने उज्जैन पहुंचे। लेकिन यहां एक दिलचस्प मोड़ आया।

पुलिस ने उनके घर से नगरपालिका तक कड़ी घेराबंदी कर रखी थी। इसके बावजूद तत्कालीन ग्वालियर राज्य के अधिकारियों ने अवंती लाल जैन को ब्रिटिश सरकार के हवाले करने से इनकार कर दिया। यानी अंग्रेजी पुलिस इतनी बड़ी संख्या में पहुंची, लेकिन गिरफ्तारी अपने मकसद तक नहीं पहुंच सकी।

1942 में छात्रों ने संभाली आंदोलन की कमान

फिर आया साल 1942। महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देशभर में बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई जगहों पर आंदोलन की जिम्मेदारी युवाओं और छात्रों के कंधों पर आ गई थी। उज्जैन और इंदौर में भी यही स्थिति बनी। अवंती लाल जैन और उनके साथियों ने उज्जैन में रोजाना जुलूस निकालना शुरू किया। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारे और विरोध लगातार बढ़ने लगे। लेकिन अंग्रेज प्रशासन अब उन्हें नजरअंदाज करने के मूड में नहीं था।

रेलवे पटरी और टेलीफोन तार काटने का आरोप

एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए अवंती लाल जैन गिरफ्तार कर लिए गए। ब्रिटिश सरकार ने उन पर रेलवे की पटरियां उखाड़ने और टेलीफोन के तार काटने जैसे आरोप लगाए। इसके बाद उन्हें सितंबर 1942 से नवंबर 1943 तक अलग-अलग जेलों में रखा गया। उनके जेल सफर में उज्जैन, इंदौर, मुंगावली और ग्वालियर शामिल थे। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा मोड़ अभी बाकी था।

अदालत ने सुनाई मौत की सजा

रेलवे पटरी से जुड़े मामले में सेशन कोर्ट ने अवंती लाल जैन को मौत की सजा सुना दी। एक युवा स्वतंत्रता सेनानी, जिसके खिलाफ अंग्रेजी शासन पहले ही सैकड़ों पुलिसकर्मियों को भेज चुका था, अब अदालत से फांसी की सजा पा चुका था। लेकिन यह सजा अंतिम नहीं रही। विशेष अदालत ने बाद में मौत की सजा को पलट दिया।

जेल से निकले तो कलम को बनाया हथियार

आजादी के बाद भी अवंती लाल जैन का सार्वजनिक जीवन खत्म नहीं हुआ। उन्होंने पत्रकारिता से जुड़कर भी काम किया। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे 1950 से जीवन के अंत तक इंदौर स्थानीय समाचार पत्र के जिला प्रतिनिधि रहे। उन्होंने 'Dramatic Jails of Central India' नाम की पुस्तक भी लिखी, जिसमें मध्य भारत की जेलों और अपने अनुभवों से जुड़े प्रसंग दर्ज किए गए थे। यानी जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी शासन की जेलों को भीतर से देखा था, उसने बाद में उन्हीं अनुभवों को शब्दों में दर्ज किया।

इतिहास में दर्ज, लेकिन लोगों की याद में कम

अवंती लाल जैन का नाम मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों पर प्रकाशित 'वंदन' पुस्तक के पृष्ठ 96 पर दर्ज है। भारत सरकार के डिजिटल रिकॉर्ड में भी उनकी पूरी स्वतंत्रता आंदोलन यात्रा दर्ज है। फिर भी आज आम लोगों के बीच उनका नाम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद या दूसरे बड़े क्रांतिकारियों जितना परिचित नहीं है।