
Phoolchand gupta freedom fighter mp india: आजादी का ऐसा परवाना जिसने महज 17 साल की उम्र में ले लिया था आजादी का बड़ा फैसला (फोटो प्रतिकात्मक) (AI creative)
Phoolchand Gupta Freedom fighter mp india: भारत की आजादी की कहानी में कुछ नाम इतने बड़े हो गए कि वे इतिहास की पहचान बन गए। लेकिन इसी आंदोलन में हजारों ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने बिना किसी बड़े पद या प्रसिद्धि के अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाने में अपना योगदान दिया। उनका काम अक्सर पर्दे के पीछे था और आज उनकी कहानियां भी उसी पर्दे के पीछे कहीं छिपी हैं।
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के फूलचंद गुप्ता ऐसी ही एक कहानी हैं। भारत सरकार के आजादी के अमृत महोत्सव के डिजिटल डिस्ट्रिक्ट रिपोजिट्री में दर्ज जानकारी के मुताबिक फूलचंद गुप्ता का जन्म 19 सितंबर 1924 को नरसिंहपुर जिले के तेंदूखेड़ा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवान दास गुप्ता था। 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी, तब फूलचंद की उम्र महज 17 साल थी। यही वह उम्र थी, जब उन्होंने ऐसा रास्ता चुना, जिसमें हर दिन गिरफ्तारी का खतरा था।
भारत छोड़ो आंदोलन 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरे देश में शुरू हुआ था और इसका असर तेंदूखेड़ा जैसे छोटे गांवों तक भी पहुंचा। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार फूलचंद गुप्ता को गांव के मुखिया बाबूलाल जैन ने आंदोलन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी थी।
फिर 18 अगस्त 1942 को हालात अचानक बदल गए। DSP करतारनाथ अतिरिक्त पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे। पुलिस ने आंदोलन से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया, और फूलचंद गुप्ता तथा उनके साथी रामचंद्र राय की गिरफ्तारी के आदेश भी दिए गए।
लेकिन संगठन की ओर से दोनों को गिरफ्तारी से बचने और भूमिगत होकर आंदोलन का काम जारी रखने का निर्देश मिला। दोनों वहां से निकल गए। यहीं से फूलचंद गुप्ता की जिंदगी का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसने उन्हें एक सामान्य युवा से भूमिगत स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता में बदल दिया।
फूलचंद गुप्ता और रामचंद्र राय ने पुलिस की नजरों से बचते हुए बीना, बैतूल और चिचोली होते हुए नागपुर का रास्ता पकड़ा। नागपुर पहुंचने के बाद उनकी मुलाकात स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारी नेताओं, क्रांतिवीर बागड़ी, आवड़ी और पन्नालाल देशराज से हुई।
इसके बाद दोनों 'लाल कुर्सी दल' से जुड़े। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक यहीं से फूलचंद को आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। उनकी भूमिका किसी खुले राजनीतिक मंच पर भाषण देने वाले नेता की नहीं थी। उन्हें आंदोलन के उस नेटवर्क का हिस्सा बनाया गया, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को अलग-अलग इलाकों तक पहुंचाने में लगा था।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार फूलचंद गुप्ता को बिहार के दरभंगा और उत्तर प्रदेश के मेरठ से हथियार लाने-ले जाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा लाहौर, कराची और दूसरे स्थानों से आंदोलन के लिए धन जुटाने की व्यवस्था भी उनके काम का हिस्सा थी।
यह विवरण 1942 के आंदोलन की एक ऐसी तस्वीर सामने लाता है जिसे आमतौर पर स्वतंत्रता आंदोलन की सामान्य कहानियों में बहुत कम जगह मिलती है। भारत छोड़ो आंदोलन केवल सड़कों पर प्रदर्शन और नारों तक सीमित नहीं था। कई जगहों पर आंदोलनकारियों का भूमिगत नेटवर्क भी काम कर रहा था और संदेशों, संसाधनों और लोगों की आवाजाही में ऐसे युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जो पुलिस की नजर से बचकर काम कर रहे थे।
फूलचंद गुप्ता करीब 10 महीने तक भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय रहे। इस दौरान उनका सामान्य जीवन पूरी तरह बदल गया था। घर से दूर रहना, पहचान छिपाकर सफर करना और पुलिस की गिरफ्त से बचते हुए संगठन के निर्देशों पर काम करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था।
सोचिए, जिस समय उनकी उम्र केवल 17-18 साल के बीच थी, उस समय उनके सामने करियर या सामान्य भविष्य के बजाय ब्रिटिश शासन से आजादी का संघर्ष था। आखिरकार करीब दस महीने की भूमिगत गतिविधियों के बाद वह तेंदूखेड़ा वापस लौटे।
फूलचंद गुप्ता का योगदान केवल 1942 के भूमिगत दौर तक सीमित नहीं रहा। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक वापस लौटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और स्वतंत्रता सेनानी संघ में भी शामिल हुए। मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों पर प्रकाशित पुस्तक 'वंदन' में भी उनका नाम पृष्ठ 160-161 पर दर्ज होने की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दी गई है।
फूलचंद गुप्ता की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें आजादी की लड़ाई का एक अलग चेहरा दिखाती है। एक ऐसा चेहरा जिसमें कोई बड़ा पद नहीं था, कोई प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार नहीं था, कोई राष्ट्रीय स्तर की पहचान नहीं थी। लेकिन जो था, वो महज 17 साल की उम्र में लिया गया एक कठिन फैसला।
पुलिस गांव में पहुंची तो गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत होना, अलग-अलग रास्तों से नागपुर पहुंचना, क्रांतिकारी नेटवर्क से जुड़ना और फिर आंदोलन के लिए हथियारों तथा धन की व्यवस्था में भूमिका निभाना, ये घटनाएं बताती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं की भागीदारी कितनी गहरी थी।
क्योंकि आजादी केवल उन लोगों की देन नहीं थी जिनके नाम इतिहास की किताबों में बड़े अक्षरों में लिखे गए। आजादी उन अनगिनत गुमनाम हाथों की भी देन थी, जिन्होंने संदेश पहुंचाए, संसाधन जुटाए, पुलिस से बचते हुए आंदोलन को जिंदा रखा और अपने हिस्से का जोखिम उठाया।
नरसिंहपुर के फूलचंद गुप्ता भी उसी अनदेखी का एक नाम हैं। 17 साल का एक युवक, जो अंग्रेजों की गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत हुआ और करीब दस महीने तक आजादी की लड़ाई के गुप्त नेटवर्क में सक्रिय रहा। शायद यही वजह है कि उनकी कहानी 'MP के क्रांतिवीर, जो गुमनाम हो गए' सीरीज में जगह पाने की हकदार है। क्योंकि इतिहास में दर्ज हर बड़ा नाम कभी न कभी किसी ऐसे छोटे, गुमनाम नाम के कंधे पर खड़ा था, जिसे इतिहास ने ठीक से याद नहीं रखा।
Updated on:
10 Aug 2026 05:34 pm
Published on:
10 Aug 2026 05:20 pm
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