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MP का वो क्रांतिकारी जो आजादी से 20 साल पहले बना था ‘सरकार-ए-हिंद’ का प्रधानमंत्री

Maulana Barkatullah Bhopali: आजादी की लड़ाई में मध्य प्रदेश की धरती ने भी ऐसे वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया। कुछ इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए, लेकिन कुछ कहानियों में गुम हो गए। 15 अगस्त 2026 तक हर दिन patrika.com आपको सुनाएगा ऐसी ही अनसुनी कहानियां, जिन्हें देशवासियों को जरूर जानना चाहिए। गुमनामी में पहुंचा एक ऐसा ही चेहरा थे मौलाना बरकतउल्लाह... जो थे 'देश के पहले प्रधानमंत्री'
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 10, 2026

Maulana Barkatullah Freedom fighter

Maulana Barkatullah Freedom fighter: विदेशी धरती पर संभाली थी सरकार-ए-हिंद की कमान, बने थे पहले प्रधानमंत्री और जगाई थी आजादी की अलख (AI Creative)

Maulana Barkatullah Bhopali: भारत की आजादी की कहानी जब भी सामने आती है, तो आमतौर पर महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और दूसरे बड़े नामों की चर्चा होती है। लेकिन इसी इतिहास में मध्य प्रदेश के भोपाल से निकला एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई को भारत की सीमाओं से निकालकर यूरोप, अमेरिका, जापान, अफगानिस्तान और रूस तक पहुंचा दिया। नाम था, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली।

वे ऐसे दौर में एक्टिव थे, जब भारत में अंग्रेजी राज के खिलाफ आवाज उठाना ही बड़ी चुनौती थी। बरकतुल्लाह ने भारत में रहकर ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहकर भी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की। उनकी जिंदगी का सबसे असाधारण अध्याय 1915 में आया, जब काबुल में भारत की एक अस्थायी निर्वासित सरकार (Provisional Government of India) बनाई गई और बरकतुल्लाह को उसका प्रधानमंत्री बनाया गया।

भोपाल से शुरू हुआ सफर

बरकतुल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल में हुआ था। उपलब्ध जीवनी स्रोतों के मुताबिक उनका बचपन शिक्षा और ज्ञान हासिल करने में बीता। आगे चलकर उन्होंने शिक्षक और पत्रकार के रूप में भी काम किया। लेकिन उनका जीवन सिर्फ नौकरी या पढ़ाई तक सीमित नहीं रहने वाला था। ब्रिटिश शासन और भारत की राजनीतिक स्थिति ने उनके विचारों को धीरे-धीरे क्रांतिकारी दिशा दी। 1880 के दशक में वे भारत से बाहर निकल गए और इसके बाद उनका जीवन लगातार अलग-अलग देशों में भारतीय स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाने में बीतने लगा।

विदेश पहुंचे तो समझ आया, लड़ाई सिर्फ भारत के भीतर नहीं लड़ी जा सकती

बरकतुल्लाह ने इंग्लैंड में भारतीय राष्ट्रवादियों से संपर्क किया। इसके बाद अमेरिका और जापान जैसे देशों में भी सक्रिय रहे। जापान में उन्होंने अध्यापन किया और भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में लेखन व प्रचार का काम किया। वे ‘Islamic Fraternity’ जैसे प्रकाशनों से भी जुड़े रहे। ब्रिटिश सरकार उनके लेखन और गतिविधियों को लेकर सतर्क थी। विश्वविद्यालय की एक जीवनी के अनुसार, उनकी गतिविधियों के चलते जापान में उनका पद भी समाप्त कर दिया गया। यहीं से बरकतुल्लाह की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण तरीका सामने आया, कलम, संगठन और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क।

वे समझ चुके थे कि ब्रिटिश साम्राज्य सिर्फ भारत में शासन नहीं कर रहा था, बल्कि पूरी दुनिया में उसका प्रभाव था। इसलिए भारत की आजादी की लड़ाई के लिए भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद भारतीयों और ब्रिटिश-विरोधी ताकतों को जोड़ना जरूरी था।

गदर आंदोलन से जुड़ाव

1913 में अमेरिका में भारतीय प्रवासियों के बीच गदर आंदोलन उभरा। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत से हटाने के लिए क्रांतिकारी संघर्ष खड़ा करना था। बरकतुल्लाह इस आंदोलन से जुड़े प्रमुख भारतीय क्रांतिकारियों में शामिल हुए। गदर आंदोलन का नेटवर्क अमेरिका और कनाडा से लेकर एशिया के दूसरे हिस्सों तक फैल रहा था। बाद में यही अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी नेटवर्क भारत की आजादी के लिए विदेश से समर्थन जुटाने की बड़ी कोशिशों का आधार बना।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि बरकतुल्लाह केवल किसी एक समुदाय या क्षेत्र तक सीमित नेता नहीं थे। काबुल की जिस अस्थायी सरकार में वे प्रधानमंत्री बने, उसमें उनके साथ राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी जैसे अलग पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे। यह उस दौर में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर मौजूद व्यापक गठजोड़ का उदाहरण था।

1 दिसंबर 1915: काबुल में बनी ‘सरकार-ए-हिंद’

बरकतुल्लाह के जीवन का सबसे ऐतिहासिक दिन था 1 दिसंबर 1915। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान काबुल में भारतीय क्रांतिकारियों ने प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ इंडिया (Provisional Government of India) यानी भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की।

राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति बने और मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री। मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री बनाया गया। इस सरकार का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को चुनौती देना और भारत की आजादी के लिए विदेशी समर्थन हासिल करना था। इसे समझने का सबसे सही तरीका यह है कि यह आजाद भारत की संवैधानिक सरकार नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ बनाई गई निर्वासित/अस्थायी क्रांतिकारी सरकार थी।

यही कारण है कि कई इतिहासकार और समकालीन लेख बरकतुल्लाह को ‘पहली सरकार-ए-हिंद के प्रधानमंत्री’ या ‘पहले प्रधानमंत्री इन-एग्जाइल’ के रूप में संदर्भित करते हैं। लेकिन उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

अंग्रेजों को हटाने के लिए दुनिया से मदद मांगने की कोशिश

काबुल पहुंचने के बाद क्रांतिकारियों की कोशिश थी कि अफगानिस्तान और दूसरे देशों से ब्रिटिश भारत के खिलाफ समर्थन मिले। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति आसान नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था और भारत की आजादी का सवाल बड़ी शक्तियों के हितों से जुड़ गया था। अफगान अमीर ने खुलकर ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध का रास्ता नहीं अपनाया और अंततः ब्रिटिश दबाव तथा बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी। 1919 तक यह सरकार काबुल से हट गई। लेकिन बरकतुल्लाह की लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई।

लेनिन से मुलाकात और रूस तक पहुंची आवाज

1919 में बरकतुल्लाह और उनके साथियों ने रूस की ओर रुख किया। वहां उन्होंने व्लादिमीर लेनिन से मुलाकात की और भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन हासिल करने की कोशिश की। उनकी राजनीति का मूल लक्ष्य स्पष्ट था, भारत से ब्रिटिश शासन का अंत।

वे किसी एक विदेशी विचारधारा के अनुयायी भर नहीं थे। उनका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देना था और इसी वजह से वे अलग-अलग देशों और राजनीतिक समूहों से संपर्क बनाने को तैयार थे।

उनकी लड़ाई की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?

बरकतुल्लाह की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने आजादी की लड़ाई को सिर्फ भारत के भीतर की राजनीतिक लड़ाई के रूप में नहीं देखा। उनकी गतिविधियों का दायरा इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, अफगानिस्तान और रूस तक फैला था। उन्होंने पत्रकारिता, भाषण, संगठन और कूटनीतिक संपर्क इन सभी माध्यमों का इस्तेमाल भारत की आजादी के लिए किया।

उनके विचारों में भारतीयों की एकता भी महत्वपूर्ण थी। उपलब्ध शोध और समकालीन विवरणों में उनके हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर देने का उल्लेख मिलता है। काबुल की सरकार में अलग-अलग पृष्ठभूमि के नेताओं का साथ आना भी इसी व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण को दिखाता है।

आजादी मिली, लेकिन वे उसे देख नहीं सके

बरकतुल्लाह ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा भारत से बाहर गुजारा। जिस आजाद भारत का सपना लेकर उन्होंने दशकों तक संघर्ष किया, उसे अपनी आंखों से देखने का मौका उन्हें नहीं मिला। 20 सितंबर 1927 को अमेरिका में उनका निधन हो गया। उन्हें कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो स्थित ओल्डसिटी सेमेट्री में दफनाया गया।

भारत की आजादी में अभी करीब दो दशक बाकी थे। यानी जिस व्यक्ति ने 1915 में काबुल से भारत के लिए एक अस्थायी सरकार खड़ी करने की कोशिश की थी, वह 1947 का स्वतंत्र भारत देखने से पहले ही दुनिया से चला गया।

फिर भोपाल ने उन्हें कैसे याद रखा?

बरकतुल्लाह की स्मृति को जीवित रखने के लिए भोपाल विश्वविद्यालय का नाम 1988 में बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय रखा गया। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी देश के बड़े हिस्से में उनका नाम उतना परिचित नहीं है, जितना उनके योगदान को देखते हुए होना चाहिए।

2026 में विश्वविद्यालय के नाम को बदलने के प्रस्ताव को लेकर बहस ने एक बार फिर बरकतुल्लाह के इतिहास को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया। इस बहस से अलग उनका ऐतिहासिक योगदान अपने आप में महत्वपूर्ण है। उन्होंने उस समय भारत की स्वतंत्रता का अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया, जब भारत अभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था।

इतिहास का वह पन्ना, जिसे फिर पढ़ने की जरूरत है

मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली की कहानी सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी की जीवनी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले कुछ लोग जेल, लाठी और फांसी से आगे बढ़कर विदेशी धरती पर कूटनीति, पत्रकारिता, संगठन और अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ को हथियार बना रहे थे।

भोपाल की जमीन से निकला यह व्यक्ति अमेरिका में भारतीय क्रांतिकारियों के बीच सक्रिय रहा, जापान में अध्यापन और पत्रकारिता की, गदर आंदोलन से जुड़ा, काबुल में भारत की अस्थायी निर्वासित सरकार का प्रधानमंत्री बना और रूस जाकर लेनिन से भारत की आजादी के लिए समर्थन मांगने की कोशिश की।

आजादी की सुबह आने से करीब 20 साल पहले उसकी जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन उसका सपना जिंदा रहा। और शायद यही वजह है कि बरकतुल्लाह भोपाली को सिर्फ एक ‘गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी’ कहना भी उनके योगदान को छोटा कर देता है। वे उन क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई को दुनिया के नक्शे पर एक अंतरराष्ट्रीय सवाल बनाने की कोशिश की।