
India Ageing Population: भारत के भविष्य का संकट, तब कैसे निपटेंगे हम? (AI Creative)
India Ageing Population: भारत को आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। बड़ी युवा आबादी को देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है, यानी काम करने वाली आबादी के बढ़ने से आर्थिक विकास को गति मिलने का अवसर। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू तेजी से सामने आ रहा है। भारत की आबादी सिर्फ बढ़ नहीं रही, उसकी उम्र की संरचना भी बदल रही है।
UNFPA के अनुसार 2022 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 15.3 करोड़ लोग थे। 2050 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। यानी करीब तीन दशकों में बुजुर्गों की संख्या लगभग 20 करोड़ बढ़ सकती है। UNFPA के एक हालिया आकलन में 2050 तक 60+ आबादी को लगभग 34.6 करोड़ यानी कुल आबादी का करीब 21 प्रतिशत बताया गया है। यह सिर्फ जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है। इसका सीधा असर स्वास्थ्य व्यवस्था, पेंशन, रोजगार, परिवार की जिम्मेदारियों और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ने वाला है।
भारत में ageing का पैटर्न यूरोप या जापान जैसा नहीं है। भारत अभी भी अपेक्षाकृत युवा देश है और राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय बदलाव की गति अलग-अलग है। दक्षिणी राज्यों में बुजुर्गों की हिस्सेदारी पहले से ज्यादा है, जबकि उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में आबादी अपेक्षाकृत युवा है। UNFPA की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले वर्षों में इन राज्यों में भी एल्डरली पॉपुलेशन का हिस्सा बढ़ेगा।
इसलिए देश में एक साथ दो तस्वीरें दिखाई देंगी, एक तरफ युवा रोजगार तलाश रहे होंगे, दूसरी तरफ परिवारों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही होगी। यहीं से केयर इकोनॉमी का सवाल पैदा होता है।
भारत में बुजुर्गों की देखभाल का बड़ा हिस्सा अभी भी परिवार आधारित है। UNFPA की India Ageing Report 2023 ने बुजुर्गों की living arrangements, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और सरकारी योजनाओं तक पहुंच का अध्ययन किया है। रिपोर्ट के लिए Longitudinal Ageing Study in India यानी LASI 2017-18 सहित उपलब्ध सरकारी आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
लेकिन भारत में परिवारों की संरचना भी बदल रही है। युवा रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं। कई परिवार छोटे हो रहे हैं। ऐसे में गांव या छोटे शहर में रहने वाले बुजुर्गों की देखभाल का सवाल आने वाले वर्षों में ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। यानी समस्या सिर्फ यह नहीं होगी कि कितने बुजुर्ग होंगे, बल्कि यह भी कि उनकी देखभाल कौन करेगा?
UNFPA की 2023 रिपोर्ट के अनुसार भारत के बुजुर्गों में आर्थिक असुरक्षा महत्वपूर्ण समस्या है। रिपोर्ट के मुताबिक 40 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग आबादी सबसे गरीब wealth quintile में आती है और लगभग 18.7 प्रतिशत बुजुर्गों के पास कोई आय नहीं है।
यह आंकड़ा ageing को सीधे सामाजिक सुरक्षा से जोड़ता है। अगर व्यक्ति के पास नियमित आय नहीं है, तो बढ़ती उम्र में दवाइयां, इलाज, यात्रा और रोजमर्रा के खर्च परिवार पर निर्भर हो सकते हैं।
और यहां एक दूसरा अंतर भी सामने आता है, महिलाओं और पुरुषों का। बूढ़ी होती आबादी में महिलाओं की कहानी अलग होगी। दरअसल अब तक सामने आईं कई रिसर्च बताती हैं कि महिलाएं औसतन पुरुषों से ज्यादा समय तक जीवित रहती हैं। इसका परिणाम यह है कि सबसे अधिक उम्र वाले वर्गों में महिलाओं की संख्या और उनकी निर्भरता बढ़ सकती है।
UNFPA के अनुसार 2022 से 2050 के बीच भारत में 80 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी में करीब 279 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। रिपोर्ट ने विशेष रूप से बहुत बुजुर्ग महिलाओं में विडोहुड और निर्भरता की समस्या को रेखांकित किया है।
यानी ageing की कहानी सिर्फ “senior citizens बढ़ेंगे” की कहानी नहीं है। यह भविष्य में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाओं की कहानी भी हो सकती है जो बहुत अधिक उम्र तक जीवित रहेंगी, लेकिन अकेलेपन, सीमित आय और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों से जूझेंगी।
UNFPA की 2023 रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण अनुमान है कि 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बच्चों की आबादी से अधिक हो सकती है। इस बदलाव का अर्थ शिक्षा और स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में भी बदलाव होगा।
आज सार्वजनिक नीति में बच्चों और युवाओं की जरूरतों पर बड़ा ध्यान स्वाभाविक है। लेकिन आने वाले दशकों में हेल्थ केयर इंफ्रास्ट्रक्चर, जेरियाट्रिक केयर, रिहैबिलिटेशन, होम बेस्ड केयर और सोशल सिक्योरिटी की मांग तेजी से बढ़ सकती है।
बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य जरूरतें भी बदलती हैं। बुजुर्गों को सिर्फ इमरजेंसी ट्रीटमेंट नहीं चाहिए। उन्हें लंबे समय तक चलने वाली क्रोनिक कंडिशन्स की निगरानी, दवाइयां, रिहैबिलिटेशन, मोबिलिटी सपोर्ट और नियमित मेडिकल केयर की जरूरत पड़ सकती है। इसीलिए एजिंग पॉलिसी को सिर्फ अस्पतालों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
भारत को भविष्य में ऐसे मॉडल की जरूरत होगी जिसमें, प्रायमरी हेल्थकेयर में जेरिएट्रिक सर्विसेज मजबूत हों, घर के नजदीक हेल्थकेयर उपलब्ध हो, बुजुर्गों के लिए सोशल सिक्योरिटी आसान हो, अकेले रहने वाले बुजुर्गों की पहचान और सहायता हो, महिलाओं के लिए विशेष आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा हो और परिवार पर पूरा देखभाल का बोझ डालने के बजाय कम्यूनिटी बेस्ड देखभाल विकसित हो।
UNFPA की रिपोर्ट भी बुजुर्गों के कल्याण के लिए सेहत की देखभाल और सामाजिक सुरक्षा के साथ ही संस्थागत प्रशासन को मजबूत करने की जरूरत पर जोर देती है।
भारत की इस चुनौती का सबसे अहम पलू यह है कि उम्र अचानक होने वाली घटना नहीं है। भारत को पता है कि 2050 तक 60+ आबादी लगभग 35 करोड़ तक पहुंच सकती है। यानी स्वास्थ्य, पेंशन और केयर इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी आखिरी समय में करने की जरूरत नहीं है।
कहना होगा कि भारत के पास अभी युवा आबादी का बड़ा हिस्सा है। यही डेमोग्राफिक डिविडेंड भविष्य की उम्र की व्यवस्था तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आज अगर हेल्थकेयर वर्कर्स, जेरियाट्रिक सर्विस, पेंशन कवरेज, आसानी से उपलब्ध सार्वजनिक परिवहन, उम्र-अनुकूल आवास और सोसायटी केयर में निवेश किया जाता है तो, आने वाले डेमोग्राफिक बदलाव को संकट के बजाय अवसर में बदला जा सकता है।
भारत की ageing story सुनाती इस रिपोर्ट में महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि 2050 में कितने बुजुर्ग होंगे। उसका जवाब हमारे पास पहले से है, करीब 34.6-34.7 करोड़। असली सवाल है, इन करोड़ों लोगों के पास आय होगी या नहीं? इलाज उनके घर के पास होगा या नहीं? अकेले रहने वाले बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या भारत की सामाजिक व्यवस्था इतनी तेजी से बदलेगी, जितनी तेजी से उसकी उम्र की संरचना बदल रही है?
आज भारत के लिए demographic dividend की चर्चा जरूरी है। लेकिन उसी के साथ 'demographic ageing preparedness' पर चर्चा शुरू करना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि 2050 का भारत सिर्फ ज्यादा उम्र वाले लोगों वाला भारत नहीं होगा। वह ऐसा भारत होगा जहां आज का युवा ही कल का बुजुर्ग होगा और उसकी तैयारी आज से करनी होगी।
Updated on:
08 Aug 2026 05:49 pm
Published on:
08 Aug 2026 05:49 pm
