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देवभूमि में वीरान हुए सैकड़ों गांव, अब IFS मॉडल और रिवर्स माइग्रेशन से जगी उम्मीद की किरण

उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन से 1,700 से अधिक गांव वीरान हो चुके हैं। जानिए पलायन का दर्द और एकीकृत कृषि (IFS) मॉडल से बदलती आत्मनिर्भरता की नई कहानी।
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भारत

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Chitra Badoliya

Aug 08, 2026

UTTARAKHAND

रिवर्स माइग्रेशन: युवाओं की वापसी!( AI)

उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत पहाड़ों के बीच एक शांत त्रासदी आकार ले रही है। कभी फसलों की हरियाली और बच्चों की खिलखिलाहट से गुंजायमान रहने वाले गांव आज सन्नाटे के आगोश में हैं। जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अनिश्चितता के दोहरे प्रहार ने देवभूमि के ग्रामीण ढांचे की कमर तोड़ दी है। यह कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, यह उन बंद दरवाजों, बंजर होते खेतों और बूढ़ी आंखों की दास्तान है, जो हर शाम अपने बच्चों के लौटने की राह देखती हैं।

संकट के मुहाने पर पहाड़: जलवायु परिवर्तन और पलायन

उत्तराखंड की पारंपरिक अर्थव्यवस्था सदैव कृषि और पशुपालन पर टिकी रही है। हालांकि, बीते कुछ दशकों में मौसम के अनिश्चित मिजाज, अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक जल स्रोतों (धारों-नौलों) के सूखने से खेती अब केवल जीविकोपार्जन का साधन मात्र बनकर रह गई है। हालिया अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि से होने वाली सीधी आय इतनी कम हो चुकी है कि अधिकांश परिवारों का गुजारा बाहर से भेजे जाने वाले पैसे (रिमिटेंस) पर निर्भर हो गया है। खेती के अलाभकारी होने के कारण गांवों से मैदानी इलाकों और बड़े शहरों की ओर पलायन की रफ़्तार तेज हुई है।

1,700 से अधिक 'घोस्ट विलेजेज': बदलता सामाजिक ताना-बाना

पलायन की इस विभीषिका का सबसे भयावह रूप 'घोस्ट विलेजेज' (भूतहा गांव) के रूप में सामने आया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, उत्तराखंड में 1,700 से अधिक गांव पूरी तरह जनशून्य हो चुके हैं।

  • आबादी का असंतुलन: गांवों से युवाओं (विशेषकर पुरुषों) के बाहर जाने के कारण पीछे केवल बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह गए हैं।
  • सामाजिक संरचना का बिखराव: सामुदायिक गतिविधियों और पारंपरिक त्योहारों की रोनक गायब हो चुकी है।
  • महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ: पुरुष सदस्यों के जाने के बाद खेती, पशुपालन और घरेलू जिम्मेदारियों का पूरा भार महिलाओं के कंधों पर आ गया है। शोध दर्शाते हैं कि ग्रामीण आय घटने और सामाजिक-आर्थिक दबावों के कारण कई महिलाओं को शहरों में अनौपचारिक या घरेलू कामगार के रूप में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जहां कम वेतन और सामाजिक असुरक्षा जैसी नई चुनौतियां उनका इंतजार करती हैं।

उम्मीद की किरण: बागेश्वर का एकीकृत कृषि (IFS) मॉडल

क्या इस निराशाजनक परिदृश्य को बदला जा सकता है? इसका सकारात्मक उत्तर उत्तराखंड के ही बागेश्वर जिले से मिलता है, जहां एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System - IFS) ने एक किसान की जिंदगी बदलकर रख दी।

  • आय में अभूतपूर्व वृद्धि: वर्ष 2016–17 में जिस किसान की शुद्ध वार्षिक आय मात्र 13,300 रुपये थी, उसने IFS मॉडल (फसल विविधता, पशुपालन, फल-सब्जी उत्पादन और मूल्य संवर्धन) को अपनाकर वर्ष 2024–25 में अपनी शुद्ध आय 5.55 लाख रुपये तक पहुंचा दी।
  • लाभ-लागत अनुपात: इस अवधि में लाभ-लागत अनुपात 1.85 से बढ़कर 2.97 हो गया।
  • एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) का संदेश स्पष्ट है: यदि पारंपरिक खेती के साथ-साथ पशुपालन, बागवानी और स्थानीय उत्पादों की प्रोसेसिंग को जोड़ा जाए, तो खेती को न केवल टिकाऊ, बल्कि एक लाभदायक व्यवसाय भी बनाया जा सकता है।

रिवर्स माइग्रेशन और नवाचार: लौटती उम्मीदें

समस्या की गंभीरता के बीच कुछ सकारात्मक पहल भी देखने को मिल रही हैं। मैदानी इलाकों की भागदौड़ से दूर अब कुछ युवा वापस अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं और जलवायु-प्रतिरोधी (Climate-Resilient) खेती को अपना रहे हैं।

  • सहनशील फसलें: डैमास्क गुलाब (Damask Rose), भांग (Hemp) और औषधीय पौधों की खेती, जिन्हें कम पानी और कम रख-रखाव की आवश्यकता होती है।
  • स्थानीय उद्यम: एग्रो-टूरिज्म, होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प और जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग से युवाओं को गांव में ही रोजगार के साधन मिल रहे हैं।

समाधान का रोडमैप: पंचायतों की भूमिका और अगला कदम

उत्तराखंड के गांवों को पुनर्जीवित करने के लिए एक बहुस्तरीय और व्यावहारिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें स्थानीय नेतृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है:

  • संसाधनों की मैपिंग: ग्राम प्रधान, पंचायत प्रतिनिधि और स्थानीय किसान मिलकर गांव के उपलब्ध जल स्रोतों, बंजर भूमि और पारंपरिक फसलों का वैज्ञानिक आकलन करें।
  • क्लस्टर स्तर पर IFS को बढ़ावा: पंचायत स्तर पर किसानों को एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ दिया जाए।
  • गैर-कृषि रोजगार का सृजन: खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing), हस्तशिल्प, इको-टूरिज्म और स्थानीय कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर आय के वैकल्पिक साधन तैयार किए जाएं।
  • जल संरक्षण और सिंचाई: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (ड्रिप/स्प्रिंकलर) से कृषि भूमि की सिंचाई क्षमता बढ़ाई जाए।

उत्तराखंड की पहाड़ियों से उठती यह दर्दभरी कहानी वास्तव में संपूर्ण ग्रामीण भारत की चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन ने हमारी बुनियादी जीवनशैली को झकझोर कर रख दिया है। हालांकि, बागेश्वर का IFS मॉडल और रिवर्स माइग्रेशन कर रहे युवाओं के प्रयास यह साबित करते हैं कि सही नीतियों, स्थानीय नवाचार और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वीरान होते गांवों में एक बार फिर खुशहाली लौट सकती है।