8 अगस्त 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

AI की असली कीमत सिर्फ बिजली नहीं, पानी भी? Google-Adani के Vizag प्रोजेक्ट ने खड़े किए बड़े सवाल

AI Data Centre Water Consumption India: सिर्फ बिजली या आपका मोबाइल डेटा सिर्फ बिजली की ताकत नहीं है, इसके पीछे बडी़ जरूरत है पानी की। भारत में तेजी से बढ़ता डेटा सेंटर का ट्रेंड क्या भविष्य में बड़ा जल संकट बनकर उभर सकता है? AI इंफ्रास्ट्रक्टर के लिए पानी की जरूरत...? जानिए गूगल-अडानी का विशाखापत्तनम प्रोजेक्ट क्या है और क्यों इसे लेकर उठ रहे सवाल?
7 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 08, 2026

AI Data Centre Water Consumption India

AI Data Centre Water Consumption India: AI Creative

AI Data Centre Water Consumption India: आप मोबाइल पर AI से सवाल पूछते हैं, तस्वीर बनवाते हैं, वीडियो तैयार करते हैं या किसी दस्तावेज का विश्लेषण करवाते हैं। जवाब कुछ सेकंड में स्क्रीन पर आ जाता है। लेकिन उस जवाब के पीछे एक ऐसी इंफ्रास्ट्रक्टर इकोनॉमी काम करती है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम चर्चा होती है।

AI को चलाने के लिए विशाल कंप्यूटिंग पावर चाहिए। इसके लिए डाटा सेंटर में हजारों सर्वर और हाई परफॉर्मेंस चिप्स लगातार काम करते हैं। ये मशीनें गर्मी पैदा करती हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है। यहीं AI की कहानी पानी से जुड़ जाती है। भारत में डाटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ रहा है। सरकार के अनुसार देश की डाटा सेंटर कैपेसिटी 2020 में करीब 375 MW थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1,500 MW हो गई। 2030 तक इसके करीब 4 GW तक पहुंचने का अनुमान भी सामने आया है। लेकिन जैसे-जैसे AI इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ेगा, सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि इसके लिए कितनी बिजली चाहिए। बड़ा सवाल यह भी है होगा कि, AI डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए कितना पानी चाहिए और वह पानी आएगा कहां से?

डेटा सेंटर आखिर पानी क्यों इस्तेमाल करता है?

Data centre में हजारों कंप्यूटर और प्रोसेसर्स लगातार चलते हैं। कंप्यूटिंग के दौरान हीट पैदा होती है। इस हीट को बाहर निकालना जरूरी होता है, वरना सर्वर्स औऱ परफॉर्मेंस के साथ ही उसकी रिलायबिलिटी बी प्रभावित हो सकती है।

इसके लिए अलग-अलग कूलिंग टेक्नोलॉजीज इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें एयर कूलिंग, ईवेपोरेटिव या एडिक्टेबल कूलिंग, डायरेक्ट टू चिप लिक्विड कूलिंग और इमर्शन कूलिंग शामिल है। हर टेक्नोलॉजी की पानी की जरूरत अलग होती है। किसी डेटा सेंटर की वास्तविक पानी की जरूरत उसके डिजाइन, लोकेशन, क्लाईमेट, कूलिंग टेक्नोलॉजी, कार्यक्षमता का भार, पानी की रिसाइक्लिंग की व्यवस्था पर निर्भर करती है।

भारत सरकार ने भी बताया है कि डेटा सेंटर इंडस्ट्री वाटर कंजप्शन कम करने के लिए एडवांस्ड कूलिंग टेक्नोलॉजी अपना रही है, इनमें डायरेक्ट टू चिप लिक्विड कूलिंग एडियाबैटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग शामिल हैं।

यानी सही सवाल यह नहीं है कि, AI पानी पीता है या नहीं? सही सवाल है कि, किस डेटा सेंटर में, कितना पानी, किस स्रोत से और किस कूलिंग सिस्टम के लिए इस्तेमाल होगा?

भारत में यह सवाल अभी क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में डेटा सेंटर कैपेसिटी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। 2020 में करीब 375 MW से 2025 में करीब 1,500 MW तक पहुंचना इस बदलाव की गति दिखाता है।

AI और हाइपरस्केल कंप्यूटिंग के विस्तार के साथ आने वाले वर्षों में बड़े कैंपस विकसित होने की संभावना है। इसका मतलब यह है कि डेटा सेंटर का एन्वायरमेंटल फुटप्रिंट भी अब इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग का हिस्सा बन रहा है। और इसी संदर्भ में विशाखापत्तनम का Google-Adani project एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बन गया है।

विशाखापत्तनम ने सवाल को जमीन पर ला दिया

अक्टूबर 2025 में Google और Adani Group ने विशाखापत्तनम में भारत के सबसे बड़े एआई डेटा सेंटर कैंपस में से एक विकसित करने की साझेदारी की घोषणा की थी। अडानी एंटरप्राइजेज की अडानीकॉनेक्स के जरिए यह पार्टनरशिप विकसित की जा रही है। Google ने इस AI hub में 2026 से 2030 के बीच लगभग 15 अरब डॉलर निवेश की योजना बताई थी।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रोजेक्ट को अडानी ग्रुप के साथ साझेदारी में विकसित किया जा रहा है और अडानी ग्रुप इसका निर्माण करेगा। इस प्रोजेक्ट से करीब 1.88 लाख यानी 188,000 जॉब्स तक पैदा होने का अनुमान बताया गया है। यानी यह केवल एक टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट नहीं है। इसके साथ बड़े निवेश, रोजगार, ऊर्जा, जमीन, पानी और स्थानीय पर्यावरण के सवाल जुड़े हुए हैं। और यहीं से विवाद भी शुरू होता है।

शहर में पहले से पानी की कमी

रिपोर्ट बताती है कि 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार विशाखापत्तनम को reservoirs और rivers से करीब 410 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी मिलता है, जबकि शहर की जरूरत लगभग 480 मिलियन लीटर प्रतिदिन बताई गई है। यानी करीब 70 मिलियन लीटर प्रतिदिन का Gap बताया गया है। करीब 25 लाख की आबादी वाले शहर में पानी की rationing भी आम होने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।

इसी पृष्ठभूमि में एक्टिविस्ट्स यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े कम्प्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पानी की जरूरत स्थानीय जल-संसाधनों पर कितना अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि स्थानीय जल-संकट और डेटा सेंटर की वास्तविक पानी की जरूरत को सीधे बराबर मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। प्रोजेक्ट की कूलिंग टेक्नोलॉजी और पानी के वास्तविक स्रोत को अलग से देखना जरूरी है।

कम्बलकोंडा वन्यजीव अभयारण्य से सिर्फ 860 मीटर पानी के साथ दूसरा विवाद wildlife को लेकर है। मीडिया के मुताबिक आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में दायर PIL में प्रोजेक्ट साइट की कम्बलकोंडा वन्यजीव अभयारण्य से लगभग 860 मीटर की दूरी को लेकर चिंता जताई गई है।

यह अभयारण्य तेंदुआ और पैंगोलिन जैसी वन्यजीव प्रजातियों का हैबिटेट है। PIL में कंस्ट्रक्शन से होने वाले नॉइज और इकोलॉजिकल इम्पैक्ट को लेकर सवाल उठाए गए हैं। राज्य सरकार ने इन चिंताओं से असहमति जताते हुए कहा है कि प्रोजेक्ट साइट कानून में निर्धारित दूरी से अधिक दूर है। गूगल ने भी साउंड डैंपिंग मेजर्स अपनाने की बात कही है, ताकि आसपास के क्षेत्र पर शोर का असर कम हो।

यानी यहां भी दो अलग-अलग पक्ष हैं, एक्टिविट्स एन्वायरमेंटल रिस्क की बात कर रहे हैं, जबकि सरकार और प्रोजेक्ट पक्ष रेगुलेटरी कंपाइल्स और मिटिगेशन मेजर्स पर जोर दे रहे हैं।

'We cannot drink DATA' तक पहुंचा विरोध

प्रोजेक्ट के खिलाफ स्थानीय विरोध अब सड़क तक पहुंच चुका है। हाल के हफ्तों में एक्टिविट्स और बच्चों ने विशाखापत्तनम में प्रदर्शन किए। इनमें 'We cannot drink DATA' जैसे संदेश वाले बैनर्स भी दिखाई दिए।

स्थानीय संगठन ग्रीन विशाखा ने शहर की जल आपूर्ति और मांग के आंकड़ों को सामने रखते हुए प्रोजेक्ट के संभावित पानी के प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। यह विरोध केवल तकनीक के खिलाफ नहीं है। इसकी मूल चिंता यह है कि जिस शहर में पहले से पानी की कमी है, वहां बड़े इंडस्ट्रियल स्केल कम्प्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रिसोर्स एलोकेशन कैसे किया जाएगा।

मामला अदालत तक पहुंच चुका है

प्रोजेक्ट को लेकर कानूनी चुनौतियां भी सामने आ चुकी हैं। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जल बिरादरी यानी पानी कम्यूनिटी की ओर से PIL दाखिल की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक याचिका में नजदीकी जलाशय पर दबाव और पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई गई है। हाईकोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को करने वाला है।

इसके अलावा मानवाधिकार आयोग की तरफ से पर्यावरण न्यायाधिकरण (NGT) में तीन और मामले दायर किए गए हैं। इनमें प्रोजेक्ट रोकने की मांग करते हुए आरोप लगाया गया है कि ग्रामीण पेयजल योजना से आपूर्ति लेने के पर्यावरण पर असर का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।

मानवाधिकार आयोग ने अलग से प्रोजेक्ट की मंजूरी पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय संपत्ति की प्रक्रिया की दोबारा समीतक्षा की जानी चाहिए। हालांकि ये याचिकाकर्ताओं के आरोप और कानूनी दावे ही हैं।

सरकार का जवाब क्या है?

आंध्र प्रदेश सरकार ने एक्टिविस्ट के आरोपों को गलत और गुमराह करने वाला बताया है, हालांकि मीडिया को दिए बयान में सरकार ने कहा है कि वैध चिंताओं पर वह फीडबैक लेने और जरूरी सफाई देने के लिए तैयार है।

सरकार का यह भी कहना है कि ग्रामीण या रिहायशी उद्देश्यों के लिए निर्धारित पानी डेटा सेंटर को नहीं दिया जाएगा और नजदीकी जलाशय का इस्तेमाल भी नहीं किया जाएगा।

यानी विवाद का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर है कि प्रोजेक्ट के लिए पानी का वास्तविक स्रोत क्या होगा और उसका स्थानीय पेयजल आपूर्ति पर कोई असर पड़ेगा या नहीं।

Google और Adani का पक्ष क्या है?

Google ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया है कि प्रोजेक्ट लागू कानूनों के अनुरूप विकसित किया जाएगा और स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए एडवांस एयर कूलिंग का इस्तेमाल किया जाएगा।

Adani की आधिकारिक घोषणा के अनुसार गूगल और अडानीकॉनेक्स मिलकर विशाखापत्तनम में GW स्केल AI डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करेंगे, जिसे क्लीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और सुबेसा केबल नेटवर्क के सपोर्ट से किया जाएगा। यानी प्रोजेक्ट का दावा है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक स्थायी तरीके से विकसित किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि इन दावों को मापने योग्य पब्लिक डेटा में कैसे बदला जाएगा।

सिर्फ डेटा सेंटर के अंदर का पानी नहीं, पूरी वॉटर फुटप्रिंट देखनी होगी

किसी डेटा सेंटर की वॉटर फुटप्रिंट केवल उसके कूलिंग टावर कूलिंग इक्विपमेंट से निकलने वाले आंकड़े तक सीमित नहीं होती। इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन में भी पानी का इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए किसी प्रोजेक्ट का डायरेक्ट और इनडायरेक्ट वॉटर यूज को अलग-अलग समझना जरूरी है। इसके अलावा यह भी देखना होगा कि प्रोजेक्ट ताजा पानी का इस्तेमाल करेगा, ट्रीटेड व्यर्थ पानी, रिसाइकिल्ड पानी या किसी अन्य स्रोत का।

यही कारण है कि डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स के लिए केवल पानी की बचत करने वाली तकनीक लिख देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जनता के सामने कम से कम ये आंकड़े होने चाहिए-

  • रोजाना freshwater requirement कितनी है?
  • recycled/treated wastewater कितना इस्तेमाल होगा?
  • groundwater से कितना पानी लिया जाएगा?
  • cooling technology कौन-सी होगी?
  • water recycling rate कितना होगा?
  • गर्मी और सूखे के दौरान water demand कितनी बढ़ सकती है?
  • project का पानी स्थानीय पेयजल आपूर्ति से कैसे अलग रखा जाएगा?
  • वाइल्डलाइफ और आस-पास का इकोसिस्टम पर शोर या गर्मी के असर का ध्यान कैसे रखा जाएगा

क्या हर AI डेटा सेंटर जल संकट पैदा करेगा?

इसका जवाब है नहीं। यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि हर AI डेटा सेंटर पानी का संकट पैदा करेगा। कुछ आधुनिक कूलिंग टेक्नोलॉजी पानी की खपत कम कर सकती हैं। Treated wastewater और recycling का इस्तेमाल भी direct freshwater demand को घटा सकता है।

इसलिए असली समस्या AI तकनीक नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट-विशिष्ट संसाधन योजना है। अगर किसी जलीय दबाव वाले इलाके में बहुत बड़ा डेटा सेंटर बनाया जा रहा है, तो वहां प्रोजेक्ट प्लानिंग में जगह-खास पानी का संतुलन, भूजल की स्थिति, सूखे का जोखिम और समुदाय की पानी की जरूरत को शामिल करना जरूरी होगा।

अब भारत के सामने नया policy सवाल

भारत AI इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से निवेश कर रहा है। यह डिजिटल इकोनॉमी, शोध, स्टार्टअप्स और हाई पर्फॉर्मेंस कम्प्यूटिंग के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन डेटा सेंटर कैपेसिटी जितनी बढ़ेगी, उतना ही जरूरी होगा कि उसकी पर्यावरणीय लागत भी पारदर्शी हो।

विशाखापत्तनम का मामला इसी बड़े सवाल को सामने लाता है- क्या AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग पानी का बजट होना चाहिए? हर बड़े डेटा सेंटर के लिए यह सार्वजनिक होना चाहिए कि वह कितने पानी की मांग करेगा, पानी कहां से आएगा और स्थानीय जल-संसाधनों पर उसका प्रभाव क्या होगा। क्योंकि रोजगार और निवेश के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पानी और पर्यावरण का हिसाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

AI का भविष्य पानी के सवाल से अलग नहीं हो सकता

गूगल-अडानी का विशाखापत्तनम प्रोजेक्ट भारत की AI महत्वाकांक्षा का बड़ा उदाहरण है। करीब 15 अरब डॉलर की निवेश योजना और 1.88 लाख तक संभावित जॉब्स के साथ यह प्रोजेक्ट आर्थिक दृष्टि से बड़ा है। लेकिन इसके साथ ही पानी के दबाव, वाइल्डलाइफ और पर्यावरणीय मंजूरीको लेकर जो सवाल उठे हैं, वे सिर्फ एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं हैं।

भारत में आने वाले वर्षों में ऐसे कई बड़े AI औ हाइपरस्केल डेटा सेंटर विकसित हो सकते हैं। इसलिए अभी से यह तय करना जरूरी है कि, कहां data centre बनेगा, कितनी बिजली इस्तेमाल होगी, कितना पानी चाहिए होगा, पानी किस स्रोत से आएगा और स्थानीय लोगों के पानी पर उसका कोई असर तो नहीं पड़ेगा।

कहना होगा, AI भारत की अगली बड़ी डिजिटल क्रांति हो सकता है। लेकिन उसकी सफलता को सिर्फ GPUs, servers, investment और jobs से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि डिजिटल भविष्य की कीमत कहीं हमारे पानी और पर्यावरण से तो नहीं चुकाई जा रही।