
भारत के शोधकर्ताओं ने AI के लिए 5,815 मिनट का ऑडियो डेटा तैयार किया है। (ChatGpt)
भारत में हाल ही में एक अनूठा प्रयास सामने आया है, जिसमें जंगलों की आवाजों को समझने और संरक्षित करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को एक नई भाषा सिखाई गई है। इस पहल में 518 प्रजातियों की आवाजों को शामिल करते हुए कुल 5,815 मिनट का ऑडियो डेटा तैयार किया गया है। यह डेटा अब AI मॉडल को जंगल की भाषा समझने में मदद कर रहा है।
इस पहल का विवरण हाल ही में प्रकाशित एक शोध-पत्र में सामने आया है, जो 20 जुलाई 2026 को bioRxiv पर पोस्ट किया गया। इसमें बताया गया है कि भारत के 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैले जंगलों से 518 प्रजातियों की आवाजों को रिकॉर्ड किया गया। इसमें 3,311 मिनट की ‘strongly labelled’ (स्पष्ट रूप से टैग की गई) और 2,504 मिनट की ‘weakly labelled’ (कम टैग की गई) आवाजें शामिल हैं, जो मिलाकर 5,815 मिनट बनती हैं।
इस डेटा का उद्देश्य AI को जंगल की आवाजों की पहचान सिखाना है। ‘Strongly labelled’ डेटा में प्रत्येक आवाज को स्पष्ट रूप से किसी प्रजाति के साथ जोड़ा गया है, जबकि ‘weakly labelled’ डेटा में केवल यह संकेत होता है कि उस ऑडियो में कोई विशेष प्रजाति मौजूद है, लेकिन उसे टैग नहीं किया गया। यह दो तरह का डेटा AI मॉडल को बेहतर तरीके से प्रशिक्षित करने में मदद करता है।
यह पहल सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत में जंगलों और वन्यजीवों की आवाजों को सुनने और समझने की क्षमता बढ़ने से, हम इन प्रजातियों की निगरानी, संरक्षण और अध्ययन को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। AI मॉडल अब जंगल में होने वाली गतिविधियों को पहचानने, खतरे का पता लगाने और पर्यावरणीय बदलावों का विश्लेषण करने में सक्षम हो सकते हैं।
इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक क्राउड-सोर्स्ड प्रयास है। यानी इसमें शोधकर्ता, संरक्षण कार्यकर्ता और प्रकृति प्रेमी—सभी ने मिलकर आवाजों को रिकॉर्ड और टैग किया। इस तरह का सामूहिक प्रयास डेटा की व्यापकता और गुणवत्ता दोनों को बढ़ाता है।
AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए इस तरह का डेटा क्यों जरूरी है? जंगलों में कई बार आवाजें एक-दूसरे के साथ ओवरलैप हो जाती हैं, या इंसानों के कानों से सुनना मुश्किल हो जाता है। AI इन जटिलताओं को समझने और अलग-अलग आवाजों को पहचानने में सक्षम होता है। इससे वन्यजीवों का व्यवहार, उनकी संख्या, और उनके आवास की स्थिति को समझने में मदद मिलती है।
इस पहल से जुड़े शोधकर्ताओं में विजय रमेश, समीर सिंह, पूजा चोकसी, प्रभजीत सिंह, सारिका खानविलकर, सोनल तेजोतिया समेत 59 लोग शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर इस डेटा सेट को तैयार किया।
यह डेटा अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, जिससे अन्य शोधकर्ता और संरक्षण संस्थान भी इसका उपयोग कर सकते हैं। इससे AI आधारित जैव-ध्वनि (bioacoustic) मॉनिटरिंग को और व्यापक रूप से अपनाया जा सकता है।
इस पहल का प्रभाव क्या हो सकता है? सबसे पहले, जंगलों में होने वाले बदलावों जैसे कि अवैध कटाई, आग, या मानव-वन्यजीव संघर्ष- को जल्दी पहचानकर कार्रवाई की जा सकती है। दूसरा, दुर्लभ या संकटग्रस्त प्रजातियों की आवाजों को ट्रैक करके उनकी संख्या और व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है। तीसरा, यह डेटा भविष्य में AI आधारित वन्यजीव संरक्षण उपकरणों के विकास का आधार बन सकता है।
इसके अलावा, यह पहल भारत में AI और संरक्षण विज्ञान के बीच एक पुल का काम कर रही है। यह दिखाती है कि कैसे तकनीक का इस्तेमाल पारंपरिक संरक्षण तरीकों को और प्रभावी बना सकता है। साथ ही, यह स्थानीय समुदायों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करता है, जिससे जागरूकता और सहभागिता बढ़ती है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी, शोधकर्ता या छात्र हैं, तो इस डेटा को डाउनलोड करके खुद भी AI मॉडल पर काम कर सकते हैं। आप स्थानीय जंगलों में आवाजें रिकॉर्ड कर सकते हैं और उन्हें टैग करके इस डेटा सेट में योगदान दे सकते हैं। इससे संरक्षण प्रयासों को और मजबूत किया जा सकता है।
इस पहल ने जंगल की आवाजों को एक नई भाषा में बदलकर AI को सिखाया है—एक भाषा जो हमें प्रकृति से जोड़ती है, और हमें उसकी रक्षा करने में सक्षम बनाती है। यह प्रयास न केवल तकनीकी उन्नति का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम भी है।
Updated on:
10 Aug 2026 12:36 pm
Published on:
10 Aug 2026 12:36 pm
