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न भारत देखा, न बॉर्डर का अनुभव… सिर्फ ‘1 दिन में 1 वकील’ ने ऐसे खींची भारत-पाक बंटवारे की लाइन

क्या आप जानते हैं कि सिर्फ एक दिन में एक वकील ने पूरे उपमहाद्वीप के भविष्य का फैसला किया और करीब 5 हफ्ते में फाइनली बंटवारा का नक्शा तैयार कर दिया? जानिए कैसे सर सिरिल रैडक्लिफ की बनाई रैडक्लिफ लाइन ने लाखों लोगों की जिंदगियों को बदल डाला!
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 10, 2026

india Pakistan border line history

पंडित नेहरू, रैडक्लिफ (बीच) और मो. जिन्ना| Credit- ChatGPT

अगस्त की तारीख में बंटवारे का दर्द संवेदनशील भारतीय या पाकिस्तानी कैसे भूल सकता है। हाल ही में निर्देशक इम्तियाज अली ने अपनी फिल्म "मैं वापस आऊंगा" में इस दर्द को फिल्माया भी है। आज की स्टोरी में हम उस शख्स के बारे में बात करने वाले हैं जिसने बंटवारे की लकीर उकेरी थी।

ना कभी भारत आया ना बंटवारे का था अनुभव

यह ऐतिहासिक घटना याद दिलाती है कि कैसे एक ब्रिटिश वकील ने बिना किसी पूर्व अनुभव के, महज कुछ हफ्तों में उपमहाद्वीप का विभाजन तय कर दिया। उसका नाम था- सर सिरिल रैडक्लिफ (Sir Cyril Radcliffe)। उसके द्वारा तैयार की गई "रैडक्लिफ लाइन" - यही वह सीमा रेखा थी, जिसने पंजाब और बंगाल को विभाजित कर भारत और पाकिस्तान के बीच नई सीमाएं निर्धारित कीं।

आपको जानकर हैरानी भी होगी रैडक्लिफ कभी भारत नहीं आया था। उसे यहां के धरातल का रत्ती भर भी अनुभव नहीं था और ना ही कभी बंटवारा किया था। फिर भी ब्रिटिशर्स ने उस वकील से बंटवारा करा डाला था।

एक दिन में ही तैयार किया था बंटवारे का नक्शा

रैडक्लिफ को जून 1947 में दो सीमा आयोगों - पंजाब और बंगाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, और उन्हें केवल पांच सप्ताह का समय मिला था। उन्होंने भारत में 8 जुलाई 1947 को आगमन किया और सीमाओं का नक्शा लगभग 9 अगस्त को तैयार कर लिया, लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से 17 अगस्त 1947 को घोषित किया गया - यानी स्वतंत्रता के दो दिन बाद।

पंजाब में सार्वजनिक सुनवाई 21 से 31 जुलाई तक लाहौर में हुई, जिसमें कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं। लेकिन विवादित इलाकों में सहमति न बन पाने के कारण, रैडक्लिफ को अकेले ही निर्णय लेना पड़ा।

रैडक्लिफ ने सीमाओं को धार्मिक आधार मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के आधार पर तो विभाजित किया ही, साथ ही प्राकृतिक सीमाओं, संचार, जल स्रोत और सिंचाई प्रणालियों जैसे "अन्य कारकों" को भी ध्यान में रखा।

लेकिन इस विभाजन ने लाखों लोगों के जीवन में दर्द और विस्थापन की आग लगा दी। पंजाब और बंगाल में हिंसा, पलायन और मौतों का सिलसिला शुरू हो गया, जिसे इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक माना जाता है।

रैडक्लिफ की यह सीमा रेखा आज भी भारत-पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा का हिस्सा है - पंजाब में भारत-पाक सीमा और बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा के रूप में।

अपने किए पर रैडक्लिफ थे शर्मिंदा

इस लकीर को खींचने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ₹2,37,880 रुपये (तब के £2,000) देने की बात कही थी। काम खत्म होने के बाद सरकार ने रकम देने की पेशकश की। लेकिन रैडक्लिफ ने वो रकम नहीं ली। क्योंकि, बंटवारे के बाद फैली हिंसा, लाखों लोगों के घर का उजड़ना… यह सबकुछ उनके हाथों खींची लकीर के कारण हुआ था। इसलिए, वो यह रकम नहीं लिए थे।

बंटवारे के दर्द पर उन्होंने कहा भी था- “मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था, समय बहुत कम था।”

विभाजन और मानवीय संवेदनाएं

आज की तारीख से जुड़ा यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि कैसे एक त्वरित, अपरिचित और विवादास्पद निर्णय ने उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया। यह घटना न केवल विभाजन की तत्काल पीड़ा का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सीमाएं केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से भी जुड़ी होती हैं। यह बात इम्तियाज की फिल्म में भी दिखाई गई है।

इस 'इतिहास में आज' के माध्यम से हमें यह समझना चाहिए कि सीमाएं कितनी जल्दी और कितनी गहराई से लोगों की जिंदगियों को प्रभावित कर सकती हैं।