
Freedom fighter of mp india lal padmdhar singh: आजादी के परवाने जो गुमनाम हो गए। (AI Creative)
Lal Padmdhar Singh: आजादी की लड़ाई में कुछ तस्वीरें ऐसी हैं, जिन्हें देखने भर से उस दौर का जुनून महसूस किया जा सकता है। एक युवा छात्र, हाथ में तिरंगा, सामने अंग्रेजी पुलिस और पीछे हजारों छात्रों का हुजूम। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र से निकले लाल पद्मधर सिंह बघेल की कहानी कुछ ऐसी ही है।उनका जन्म करीब 1921 में रीवा क्षेत्र में हुआ था। भारत सरकार के आजादी का महोत्सव के आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें रीवा, मध्य प्रदेश का निवासी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय का स्टूडेंट बताया गया है। उनकी उम्र उस समय लगभग 21 साल थी, जब भारत छोड़ो आंदोलन ने देश के युवाओं को अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया।
1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का असर देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों तक पहुंचा। इलाहाबाद भी उस समय राष्ट्रीय आंदोलन का बड़ा केंद्र था। लाल पद्मधर सिंह वहां विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे और आंदोलन में सक्रिय हो गए। 12 अगस्त 1942 को उन्होंने इलाहाबाद में छात्रों के एक बड़े जुलूस का नेतृत्व किया। उनका लक्ष्य था अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए जिला न्यायालय की ओर बढ़ना। भारत सरकार के रिकॉर्ड में इस जुलूस और पुलिस फायरिंग का स्पष्ट उल्लेख है। लेकिन उस दिन जो हुआ, उसने लाल पद्मधर सिंह का नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कर दिया।
जुलूस जैसे-जैसे आगे बढ़ा, पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन लाल पद्मधर सिंह तिरंगा लेकर आगे बढ़ते रहे। सरकारी अभिलेख के मुताबिक पुलिस ने फायरिंग की। जिला अदालत के पास हुई गोलीबारी में उन्हें गोली लगी और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई।
लेकिन उनकी कहानी की सबसे भावुक बात यह है कि वह केवल एक छात्र नहीं थे, वह उस दौर के उस युवा भारत का प्रतीक थे जो अंग्रेजी शासन से डरने के बजाय उसके सामने खड़ा होना सीख चुका था।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़े एक अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी शहादत का विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें बताया गया है कि पद्मधर सिंह तिरंगा हाथ में लेकर आगे बढ़े और पुलिस अधिकारी के आदेश के बाद उन पर गोली चलाई गई। उनका सीना छलनी होता रहा और वे 'भारत माता की जय' और 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाते रहे। यही वह क्षण था जब, एक युवा छात्र ने अपनी जान की कीमत पर यह संदेश दिया कि तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं था।
उस समय वह स्वाभिमान और आजादी का प्रतीक था।
लाल पद्मधर सिंह की जिंदगी बहुत लंबी नहीं थी। वे करीब 21 वर्ष के थे। उन्होंने कोई लंबा राजनीतिक करियर नहीं बनाया। सत्ता में कोई पद नहीं पाया। आजादी के बाद किसी बड़े सरकारी पद पर बैठने का अवसर भी नहीं मिला। लेकिन उन्होंने वह किया जिसके लिए साहसी व्यक्तित्व चाहिए था। उन्होंने अपने सामने खड़ी बंदूकों के बावजूद तिरंगा नहीं छोड़ा।
12 अगस्त 1942 को इलाहाबाद में लगी पुलिस की गोलियों ने उनकी जिंदगी खत्म कर दी, लेकिन उनकी शहादत ने छात्र आंदोलन के भीतर गुस्सा और तेज कर दिया। सरकारी रिकॉर्ड उन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के शहीद के रूप में दर्ज करता है।
आजादी के 79 वर्ष पूरे होने के दौर में जब हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो अक्सर कुछ ही नाम हमारे सामने आते हैं। लेकिन लाल पद्मधर सिंह जैसे युवाओं की कहानियां बताती हैं कि आजादी का आंदोलन केवल बड़े नेताओं का आंदोलन नहीं था। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के युवा भी इसकी रीढ़ बन चुके थे। एक छात्र ने जुलूस का नेतृत्व किया। एक छात्र ने तिरंगा हाथ में लिया। एक छात्र पुलिस की गोली के सामने खड़ा रहा। और उसी छात्र ने अपनी जान देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए आजादी की कीमत बता दी।
बताते दें कि अमर शहीद लाल पद्मधर सिंह का नाम भारत सरकार के Who's Who of Indian Martyrs में भी दर्ज है। आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें रीवा, मध्य प्रदेश का निवासी बताया गया है। 12 अगस्त 1942 के इलाहाबाद छात्र जुलूस और पुलिस फायरिंग में उनकी शहादत का उल्लेख मिलता है।
Updated on:
11 Aug 2026 09:39 am
Published on:
11 Aug 2026 09:38 am
