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Space Mission: नासा ने वॉयजर-2 को 50 साल बाद दी एक और जिंदगी, ‘Big Bang’ ऑपरेशन से बचाई एनर्जी

Voyager-2: करीब 50 साल पुराने वॉयजर-2 को नासा ने ऊर्जा बचाने की नई रणनीति से एक और साल का वैज्ञानिक समय दिया है। ‘बिग बैंग’ ऑपरेशन के माध्यम से कम ऊर्जा में इसके सक्रिय वैज्ञानिक उपकरणों को चलाने की कोशिश की गई है।
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भारत

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MI Zahir

Aug 10, 2026

Voyager 2's Journey Through Space News

वॉयजर-2: मानव इतिहास की सबसे लंबी अंतरिक्ष यात्रा। ( फोटो: AI)

लगभग 50 साल से अंतरिक्ष में सफर कर रहे नासा के वॉयजर-2 को नई जिंदगी मिल गई है। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) की इंजीनियरिंग टीम ने ऐसा तरीका खोजा है, जिससे इस बेहद पुराने अंतरिक्ष यान की सीमित ऊर्जा को बचाकर उसके वैज्ञानिक काम को कम से कम एक साल और जारी रखा जा सकेगा। इस ऊर्जा-बचत अभियान को टीम ने ‘बिग बैंग’ ऑपरेशन नाम दिया है। इस अभियान में इंजीनियरों ने एक साथ कुछ ज्यादा बिजली लेने वाले सिस्टम बंद किए और उनकी जगह कम ऊर्जा खपत करने वाले विकल्पों का इस्तेमाल किया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि ऊर्जा बचाने के साथ-साथ अंतरिक्ष यान को इतना गर्म भी रखा जाए कि उसके जरूरी सिस्टम काम करते रहें।

वॉयजर-2 में आखिर ऊर्जा की कमी क्यों हो रही है?

रिसर्च टीम के अनुसार ​वॉयजर-2 और उसका जुड़वां अंतरिक्ष यान वॉयजर-1 1970 के दशक में पृथ्वी से रवाना हुए थे। दोनों अंतरिक्ष यान बिजली के लिए रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) पर निर्भर हैं। इन जनरेटरों में प्लूटोनियम के रेडियोधर्मी क्षय से पैदा होने वाली गर्मी को बिजली में बदला जाता है। लेकिन प्लूटोनियम लगातार क्षय होता रहता है। इसलिए समय के साथ दोनों वॉयजर यानों की बिजली उत्पादन क्षमता घट रही है। नासा के अनुसार प्रत्येक अंतरिक्ष यान हर साल लगभग 4 वाट बिजली खो रहा है। आज यह कमी मिशन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

खास बात: 50 साल बाद हर वाट की कीमत

वॉयजर-2 को 1977 में लॉन्च किया गया था। तब उसके पास अपने वैज्ञानिक उपकरणों और दूसरे सिस्टम को चलाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा थी। लेकिन करीब पांच दशक बाद स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

अंतरिक्ष यान में मौजूद कई उपकरण अब बंद

स्टडी के अनुसार अंतरिक्ष यान में मौजूद कई उपकरण अब बंद किए जा चुके हैं। इनमें कुछ ऐसे उपकरण भी थे जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से ग्रहों के पास से गुजरने के दौरान किया जाना था।

दोनों यान सौरमंडल की बाहरी सीमा की ओर बढ़ते गए

वॉयजर मिशन की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे बाहरी ग्रहों के अध्ययन पर ध्यान दिया था। बाद में दोनों यान सौरमंडल की बाहरी सीमा की ओर बढ़ते गए और अंतरतारकीय अंतरिक्ष की जानकारी जुटाने लगे। अब मिशन की प्राथमिकता साफ है—कम से कम ऊर्जा में ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना।

2024 से लगातार बंद हो रहे उपकरण

बिजली की कमी के कारण नासा को 2024 से वॉयजर-2 के वैज्ञानिक उपकरणों में कटौती करनी शुरू करनी पड़ी। अंतरिक्ष यान में कुल 10 वैज्ञानिक उपकरण थे। इनमें से कुछ उपकरणों को पहले ही बंद किया जा चुका था, क्योंकि उनका मुख्य काम ग्रहों के नजदीक पहुंचने के दौरान पूरा हो गया था। बाद के वर्षों में ऊर्जा संकट बढ़ने पर दो और वैज्ञानिक उपकरण बंद करने पड़े।

सिर्फ तीन वैज्ञानिक उपकरण सक्रिय रखने की कोशिश की जा रही

अब वॉयजर-2 के सिर्फ तीन वैज्ञानिक उपकरण सक्रिय रखने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सामान्य परिस्थितियों में मिशन टीम को 2026 के अंत से पहले इनमें से एक और उपकरण बंद करना पड़ सकता था। यहीं ‘बिग बैंग’ योजना काम आई।

कैसे बचाई गई वॉयजर-2 की ऊर्जा?

नासा की इंजीनियरिंग टीम ने अंतरिक्ष यान के बिजली इस्तेमाल करने वाले अलग-अलग सिस्टम का दोबारा मूल्यांकन किया। लक्ष्य था कि जहां संभव हो, वहां ज्यादा बिजली लेने वाले सिस्टम की जगह कम ऊर्जा वाले विकल्पों का इस्तेमाल किया जाए।

आज के आधुनिक कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जैसी सुविधाएं नहीं

यह काम आसान नहीं था। करीब पांच दशक पुराने अंतरिक्ष यान में आज के आधुनिक कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जैसी सुविधाएं नहीं हैं। उसे पृथ्वी से अरबों किलोमीटर दूर से कमांड भेजकर संचालित किया जाता है।

चुनौती सिर्फ बिजली बचाने की नहीं थी

इंजीनियरों को यह भी सुनिश्चित करना था कि ऊर्जा बचाने के चक्कर में यान का तापमान इतना नीचे न चला जाए कि उसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम काम करना बंद कर दें। यानि चुनौती सिर्फ बिजली बचाने की नहीं थी, बल्कि ऊर्जा, तापमान और वैज्ञानिक उपकरणों के बीच संतुलन बनाने की थी।

‘बिग बैंग’ से मिला एक और साल

नासा के इस ऊर्जा-बचत अभियान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वॉयजर-2 पर मौजूद तीन सक्रिय वैज्ञानिक उपकरणों को कम से कम एक और साल तक चलाने की उम्मीद है। इसका मतलब वैज्ञानिकों को वॉयजर-2 से अंतरिक्ष के बेहद दूर और अब तक कम समझे गए हिस्से के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है। वॉयजर-2 की हर अतिरिक्त सक्रिय अवधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा कोई दूसरा अंतरिक्ष यान उसके स्थान पर तुरंत काम नहीं कर सकता।

वॉयजर-1 पर भी लागू होगी योजना

नासा अब इसी तरह की ऊर्जा बचत रणनीति वॉयजर-1 पर भी लागू करने की तैयारी कर रहा है। वॉयजर-1 इस समय वॉयजर-2 से भी ज्यादा दूर है। मिशन टीम आने वाले महीनों में वॉयजर-1 पर भी इसी तरह के बदलाव करने की उम्मीद कर रही है। अगर यह योजना सफल रहती है, तो दोनों अंतरिक्ष यानों से वैज्ञानिकों को कुछ अतिरिक्त समय तक डेटा प्राप्त हो सकता है।

पांच दशक पुराना मिशन आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?

वॉयजर मिशन मानव इतिहास के सबसे लंबे समय तक चलने वाले अंतरिक्ष अभियानों में से एक है। इन दोनों यानों ने उन ग्रहों और अंतरिक्ष क्षेत्रों के बारे में ऐसी जानकारी भेजी, जिसे पृथ्वी से हासिल करना बेहद मुश्किल था।

यूरेनस और नेपच्यून के पास से उड़ान भर कर अध्ययन किया

दरअसल वॉयजर-2 अकेला ऐसा अंतरिक्ष यान है जिसने यूरेनस और नेपच्यून के पास से उड़ान भरकर उनका प्रत्यक्ष अध्ययन किया। इसके बाद यह सौरमंडल के बाहरी क्षेत्र से आगे बढ़ गया। आज इसका वैज्ञानिक महत्व सिर्फ इसकी उम्र में नहीं है। यह पृथ्वी से बेहद दूर मौजूद वातावरण में कणों, चुंबकीय क्षेत्र और अंतरतारकीय अंतरिक्ष की स्थितियों को समझने के लिए लगातार डेटा उपलब्ध कराता रहा है।

मिशन की सबसे बड़ी चुनौती अब ऊर्जा है

वॉयजर-2 के सामने अब कोई एक बड़ी तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खत्म होती ऊर्जा सबसे बड़ी चुनौती है। हर साल कुछ वाट बिजली कम होना पृथ्वी पर मामूली बात लग सकती है, लेकिन करोड़ों-अरबों किलोमीटर दूर मौजूद एक छोटे अंतरिक्ष यान के लिए यही कुछ वाट उसके किसी वैज्ञानिक उपकरण को चालू या बंद रखने का फैसला कर सकते हैं।

नासा की टीम पुराने सिस्टम को नए तरीके से इस्तेमाल कर रही

नासा की टीम पुराने सिस्टम को नए तरीके से इस्तेमाल कर रही है और हर उपलब्ध वाट को बचाने की कोशिश कर रही है। लगभग पांच दशक पुराने वॉयजर-2 को फिलहाल एक और साल का वैज्ञानिक समय मिल गया है। यह मिशन कितने समय तक आगे बढ़ेगा, यह अब उसकी बची हुई ऊर्जा और सिस्टम की स्थिति पर निर्भर करेगा।

सदी पुरानी तकनीक भी काम कर सकती है

बहरहाल, ‘बिग बैंग’ ऑपरेशन ने एक बात जरूर साबित कर दी है—अंतरिक्ष में आधी सदी पुरानी तकनीक भी सही इंजीनियरिंग और सावधानी से उम्मीद से ज्यादा समय तक काम कर सकती है।