
Brest Cancer Symptoms: हर महिला को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि ब्रेस्ट कैंसर का पहला और एकमात्र संकेत गांठ ही होगा। स्तन के आकार या बनावट में बदलाव, त्वचा का धंसना, निप्पल का बदलना या असामान्य स्राव जैसे संकेत भी चिकित्सकीय जांच की वजह हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की जुलाई 2026 में अपडेट की गई जानकारी के मुताबिक ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में सबसे आम कैंसर बना हुआ है और 2024 में अनुमानित 24 लाख महिलाओं में इसका निदान हुआ था। इसी साल इससे करीब 6.94 लाख मौतें हुईं।
भारत के लिए चिंता सिर्फ मरीजों की संख्या बढ़ने की नहीं, बल्कि बीमारी के देर से पकड़ में आने की भी है। जून 2026 में अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी के सम्मेलन में प्रस्तुत एक भारतीय अध्ययन ने बताया कि भारत में ब्रेस्ट कैंसर की आयु-समायोजित घटना दर 1990 के दशक में लगभग 25 प्रति एक लाख से बढ़कर 2022 में करीब 40 प्रति एक लाख हो गई। उसी अध्ययन में यह भी बताया गया कि भारतीय महिलाओं में 60 प्रतिशत से अधिक मामले स्थानीय रूप से उन्नत या मेटास्टेटिक अवस्था में सामने आते हैं।
फरवरी 2026 में Cancer Epidemiology में प्रकाशित भारतीय महिलाओं पर व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण ने कई ऐसे कारकों की पहचान की जिनका ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम से संबंध देखा गया। इनमें प्रजनन संबंधी कारक, हार्मोन से जुड़ा प्रभाव, पेट के आसपास अधिक चर्बी, परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास और जीवनशैली से जुड़े कुछ कारक शामिल हैं। अध्ययन ने यह भी बताया कि शारीरिक गतिविधि का अधिक स्तर जोखिम के साथ विपरीत संबंध दिखाता है।
लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है। इन जोखिम कारकों का होना यह साबित नहीं करता कि किसी महिला को कैंसर होगा। इसी तरह इनमें से कोई जोखिम कारक न होना भी कैंसर से पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
WHO के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत ब्रेस्ट कैंसर ऐसे महिलाओं में होते हैं, जिनमें महिला होने और उम्र बढ़ने के अलावा कोई खास जोखिम कारक नहीं होता। यानी केवल यह सोचकर जांच टाल देना कि परिवार में किसी को कैंसर नहीं हुआ, सही रणनीति नहीं है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा नहीं है। वहीं WHO का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर के संभावित संकेतों में बिना दर्द वाली गांठ या मोटापन, स्तन के आकार या स्वरूप में बदलाव, त्वचा में गड्ढे या लालिमा, निप्पल या उसके आसपास बदलाव तथा असामान्य या खून मिला स्राव शामिल हो सकता है। खास बात यह है कि कैंसर की गांठ अक्सर दर्द रहित हो सकती है।
इसका मतलब यह भी नहीं कि हर गांठ कैंसर है। WHO स्पष्ट करता है कि ज्यादातर ब्रेस्ट गांठें कैंसर नहीं होतीं। लेकिन किसी असामान्य गांठ या बदलाव को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है, क्योंकि अगर कैंसर है तो छोटा और स्थानीय स्तर पर मौजूद ट्यूमर उपचार के लिए अधिक अनुकूल स्थिति में होता है।
यहां भी जवाब इतना सीधा नहीं है। स्क्रीनिंग और किसी लक्षण के बाद जांच दो अलग चीजें हैं। स्क्रीनिंग का उद्देश्य बिना लक्षण वाली आबादी में बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ना है, जबकि किसी महिला में गांठ या दूसरा संदिग्ध बदलाव दिखाई देने पर डॉक्टर द्वारा कराई जाने वाली जांच लक्षण आधारित निदान का हिस्सा है। WHO इन दोनों को अलग-अलग रणनीतियां मानता है।
WHO के वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देशों में सामान्य जोखिम वाली महिलाओं के लिए मैमोग्राफी आधारित जनसंख्या स्क्रीनिंग का प्रमुख आयु समूह 50-69 वर्ष है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 50 वर्ष से कम उम्र की महिला में किसी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज किया जाए। लक्षण मौजूद होने पर उम्र की सीमा का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए।
यही अंतर आम महिला के लिए सबसे महत्वपूर्ण है- 'मेरी उम्र अभी कम है, इसलिए मुझे चिंता की जरूरत नहीं' और 'मेरे शरीर में नया बदलाव आया है, इसलिए इसकी जांच होनी चाहिए', दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं।
भारत में ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए केवल महंगी मशीनों पर निर्भर रहना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। WHO की ग्लोबल ब्रेस्ट कैंसर पहल शुरुआती पहचान के लिए तीन स्तरों पर जोर देती है। लक्षणों के प्रति जागरूकता, समय पर निदान और व्यापक उपचार। WHO का लक्ष्य है कि 60 प्रतिशत से अधिक आक्रामक ब्रेस्ट कैंसर मामले स्टेज I या II में पकड़े जाएं।
जून 2026 का भारतीय नर्स-नेतृत्व वाले क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन पर अध्ययन इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है। इसमें बताया गया कि मौजूदा व्यवस्था में कर्मचारियों और बुनियादी ढांचे की सीमाएं स्क्रीनिंग को बड़े पैमाने पर लागू करने में बाधा बनती हैं। अध्ययन ने अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था में प्रशिक्षित नर्सों के जरिए क्लिनिकल ब्रेस्ट जांच को मजबूत करने की संभावना पर काम किया।
ICMR की वेबसाइट पर 2026 में भी ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम और स्क्रीनिंग से जुड़े नए शोध प्रस्ताव दिखाई दे रहे हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर में ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और बेहतर जीवित रहने पर अध्ययन शामिल हैं। इससे यह साफ है कि भारत में शुरुआती पहचान को मजबूत करना अभी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में है।
ब्रेस्ट को लेकर जागरूकता का मतलब हर छोटी असामान्यता को कैंसर मान लेना नहीं है। इसका मतलब है शरीर में आए नए और लगातार बने रहने वाले बदलाव को नजरअंदाज न करना। खासकर इन संकेतों पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए-
इनमें से कोई संकेत होने का मतलब अपने आप कैंसर नहीं है। लेकिन जांच को टालना भी सही नहीं है।
भारत में ब्रेस्ट कैंसर की कहानी को केवल बढ़ते मरीजों की संख्या से समझना अधूरा होगा। 2026 के उपलब्ध आंकड़े एक दूसरी कहानी भी बताते हैं। बढ़ता जोखिम, देर से पहचान और शुरुआती जांच तक पहुंच के बीच का अंतर।
नई भारतीय समीक्षा भारत में ब्रेस्ट कैंसर की घटनाओं में लगभग 5.6 प्रतिशत सालाना वृद्धि की संभावना जताती है। दूसरी ओर 2026 के भारतीय अध्ययन में बड़ी संख्या में मामलों के उन्नत अवस्था में सामने आने की बात कही गई है।
इसलिए महिलाओं के लिए सबसे जरूरी संदेश यह नहीं कि हर गांठ कैंसर है, बल्कि यह है कि शरीर के संकेतों को सामान्य मानकर महीनों तक टालना खतरनाक हो सकता है।
कैंसर की शुरुआती पहचान केवल अस्पताल की जिम्मेदारी नहीं है। यह उस क्षण से शुरू होती है, जब कोई महिला अपने शरीर में आए असामान्य बदलाव को पहचानती है और कहती है, 'इसे एक बार डॉक्टर को दिखाना चाहिए।'
बता दें कि यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, क्लिनिकल ब्रेस्ट जांच या अन्य परीक्षण की जरूरत उम्र, लक्षण, व्यक्तिगत जोखिम और डॉक्टर की सलाह के अनुसार अलग हो सकती है। बिना लक्षण वाली महिलाओं के लिए भी स्क्रीनिंग का निर्णय सार्वभौमिक रूप से एक जैसा नहीं होता।