
Antibiotic Resistance new threat of future: क्या आप भी पुरानी पर्ची दिखाकर ले आते हैं अपनी दवाएं, एंटीबायोटिक को न समझें सर्दी, जुकाम या तेज बुखार में राहत देने वाली दवा (AI Creative)
Antibiotic Resistance new threat: एंटीबायोटिक प्रतिरोध अब केवल अस्पतालों की समस्या नहीं रहा। जब बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो सामान्य संक्रमण का इलाज कठिन, लंबा और महंगा हो सकता है। भारत में 2026 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह खतरा आने वाले वर्षों की बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को आज सामान्य संक्रमण हुआ और डॉक्टर ने एंटीबायोटिक दी। कुछ दिन में वह ठीक भी हो गया। लेकिन अगर कुछ वर्षों बाद उसी तरह के संक्रमण पर वही दवा काम न करे तो?
दुनिया इस समय एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी एएमआर की समस्या से जूझ रही है। इसका अर्थ है कि बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिनसे उन्हें खत्म या नियंत्रित किया जाता है। हालांकि एंटीबायोटिक प्रतिरोध खास तौर पर बैक्टीरिया से जुड़ी समस्या है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि जिस समय दवा काम नहीं करती, संक्रमण का इलाज कठिन हो जाता है।
इसे ऐसे समझिए-
किसी संक्रमण में मौजूद ज्यादातर बैक्टीरिया एंटीबायोटिक से मर जाते हैं। लेकिन अगर कुछ बैक्टीरिया में दवा के खिलाफ प्रतिरोध मौजूद है तो वे बच सकते हैं और बढ़ते रह सकते हैं। गलत दवा, अनावश्यक एंटीबायोटिक इस्तेमाल या डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक और अवधि का सही पालन न करना इस समस्या को बढ़ा सकता है। समय के साथ ऐसे प्रतिरोधी बैक्टीरिया ज्यादा फैल सकते हैं। यानी एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल केवल उस एक मरीज को प्रभावित नहीं करता। इसके प्रभाव का संबंध समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था से भी हो सकता है।
भारत में संक्रामक रोगों का बोझ, बड़ी आबादी, स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच और एंटीबायोटिक के इस्तेमाल की बड़ी मात्रा एएमआर को महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनाती है।
राष्ट्रीय स्तर पर एएमआर की निगरानी के लिए ICMR Antimicrobial Resistance Surveillance Network काम करता है। इसके नेटवर्क में अलग-अलग चिकित्सा संस्थानों से बैक्टीरिया और उनकी दवाओं के प्रति संवेदनशीलता से जुड़े आंकड़े जुटाए जाते हैं।
2024 के ICMR surveillance report में देश के विभिन्न केंद्रों से प्राप्त हजारों क्लिनिकल आइसोलेट्स में एंटीबायोटिक संवेदनशीलता के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। रिपोर्ट में अलग-अलग बैक्टीरिया और संक्रमणों के लिए प्रतिरोध के स्तर में गंभीर अंतर दिखाई देता है। यानी हर एंटीबायोटिक हर संक्रमण पर समान रूप से प्रभावी नहीं है।
आम लोगों में एक गलत धारणा यह है कि तेज सर्दी, खांसी या बुखार का मतलब एंटीबायोटिक की जरूरत है। लेकिन सामान्य सर्दी-जुकाम के अधिकांश मामले वायरस से होते हैं, जबकि एंटीबायोटिक बैक्टीरिया पर काम करती हैं। इसलिए वायरल बीमारी में बिना चिकित्सकीय सलाह एंटीबायोटिक लेना फायदा नहीं देता, लेकिन अनावश्यक इस्तेमाल प्रतिरोध की समस्या को बढ़ाने में योगदान कर सकता है। यही कारण है कि हर बुखार को एंटीबायोटिक से जोड़ना सही नहीं है।
यह सवाल थोड़ा अधिक जटिल है। पुरानी सलाह अक्सर यह होती थी कि मरीज को डॉक्टर द्वारा लिखी पूरी एंटीबायोटिक अवधि हर हाल में पूरी करनी चाहिए। लेकिन आधुनिक चिकित्सा में उपचार की अवधि संक्रमण, दवा और मरीज की स्थिति के अनुसार तय होती है।
इसलिए सबसे सुरक्षित नियम यह है कि, डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक और अवधि का पालन करें और खुद से दवा बंद, शुरू या दोबारा शुरू न करें। अगर दवा से परेशानी हो रही है या मरीज को लगता है कि वह ठीक हो गया है, तो डॉक्टर से पूछकर ही उपचार में बदलाव करना चाहिए।
कई परिवारों में पुरानी दवाएं बची रहती हैं। अगली बार वही लक्षण आए तो लोग पुरानी पर्ची निकालकर वही एंटीबायोटिक शुरू कर देते हैं। यही आदत जोखिम बढ़ा सकती है। क्योंकि पिछली बीमारी और वर्तमान बीमारी एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं। अलग बैक्टीरिया के लिए अलग दवा की जरूरत हो सकती है और कई बार संक्रमण बैक्टीरियल होता ही नहीं। इसलिए पुरानी एंटीबायोटिक को देखकर खुद इलाज शुरू करना सुरक्षित तरीका नहीं है।
एएमआर का महत्व इसलिए ज्यादा है, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा की कई प्रक्रियाएं प्रभावी एंटीबायोटिक पर निर्भर करती हैं। बड़े ऑपरेशन, अंग प्रत्यारोपण, कैंसर का उपचार, गहन चिकित्सा और कई जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं में संक्रमण को नियंत्रित करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाएं तो इन उपचारों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए एएमआर को केवल 'एंटीबायोटिक गलत लेने' की कहानी समझना अधूरा है। यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।
एंटीबायोटिक को 'तेज असर वाली बुखार की दवा' समझना बंद करना होगा। सर्दी-जुकाम या वायरल बीमारी में खुद से एंटीबायोटिक न लें। बची हुई पुरानी दवा किसी नए मरीज को न दें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा की खुराक न बदलें और दवा लेने के दौरान असामान्य प्रतिक्रिया होने पर चिकित्सकीय सलाह लें। साथ ही हाथ धोना, सुरक्षित भोजन और पानी, टीकाकरण तथा संक्रमण की रोकथाम जैसे कदम भी एंटीबायोटिक की जरूरत को कम करने में मदद कर सकते हैं।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध का मतलब यह नहीं कि अचानक सभी एंटीबायोटिक बेकार हो जाएंगी। खतरा धीरे-धीरे बढ़ता है। आज कोई दवा काम करती है, कल उसका असर कम हो सकता है और किसी संक्रमण के लिए विकल्प सीमित हो सकते हैं। इसलिए एंटीबायोटिक बचाना किसी एक दवा को बचाना नहीं है। यह उस चिकित्सा व्यवस्था को बचाने की कोशिश है जिसमें एक सामान्य संक्रमण, ऑपरेशन या गंभीर बीमारी का इलाज आने वाली पीढ़ियों में भी संभव रहे। क्योंकि जिस दिन सामान्य संक्रमण के लिए भी प्रभावी दवा ढूंढना मुश्किल होने लगेगा, उस दिन समस्या सिर्फ बीमारी की नहीं होगी, इलाज की उपलब्धता भी बीमारी का हिस्सा बन जाएगी।
Updated on:
18 Aug 2026 03:47 pm
Published on:
18 Aug 2026 03:47 pm
