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उत्तराखंड का वो पुराना बाजार जहां कभी पहाड़ भर से आते थे खरीदार, अब क्यों बदल गई इसकी रौनक?

Almora Old Markets : कभी पूरे कुमाऊं की अर्थव्यवस्था का केंद्र रहे अल्मोड़ा के ऐतिहासिक बाजार आज सड़कों के विस्तार, ऑनलाइन शॉपिंग और बदलती जरूरतों के कारण एक नए दौर से गुजर रहे हैं। जानिए इनके इतिहास और बदलते स्वरूप की पूरी कहानी।
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Aug 21, 2026
Almora Old Markets
Almora Old Markets : अल्मोड़ा का बाजार कभी था पूरे पहाड़ का बाजार, PC- Chatgpt

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अल्मोड़ा के पुराने बाजार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं रहे हैं। कभी ये पहाड़ की उस अर्थव्यवस्था के केंद्र थे, जहां दूर-दराज के गांवों से लोग सामान खरीदने, बेचने और जरूरी काम निपटाने आते थे। आज भी लाला बाजार, पटल बाजार, कचहरी बाजार, जौहरी बाजार और पलटन बाजार जैसे नाम अल्मोड़ा की पहचान हैं।

लेकिन पहाड़ में सड़कें गांव-गांव तक पहुंचीं, छोटे कस्बों में नई दुकानें खुलीं और खरीदारी के नए केंद्र बन गए। इसका असर उन पुराने बाजारों पर भी पड़ा, जो कभी पूरे इलाके की जरूरतों का केंद्र हुआ करते थे। यह कहानी है कि एक बाजार कैसे पहाड़ की अर्थव्यवस्था बना और बदलती सड़कों ने उसकी भूमिका कैसे बदल दी।

राजा ने बसाया शहर और बाजार बन गए उसकी धड़कन

अल्मोड़ा का विकास चंद वंश के दौर में हुआ। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार राजा कल्याण चंद ने 1563 में राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की। इसके बाद शहर के साथ बाजारों का विकास हुआ। आज भी पुराने बाजारों की संरचना उस दौर की व्यापारिक और सामाजिक व्यवस्था की झलक देती है।

अल्मोड़ा की भौगोलिक स्थिति भी इसे व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बनाती थी। यहां पहुंचने वाले रास्ते अलग-अलग इलाकों को जोड़ते थे। चौघानपाटा को आज भी वह केंद्र माना जाता है जहां पिथौरागढ़, बागेश्वर, नैनीताल और दूसरे हिस्सों से आने वाले रास्ते मिलते हैं।

यानी जिस दौर में हर गांव तक सड़क नहीं पहुंची थी, उस समय अल्मोड़ा जैसे शहर और उनके बाजार पूरे इलाके के लिए खरीदारी और कारोबार के केंद्र थे।

बाजारों की अपनी-अपनी पहचान थी

पुराने अल्मोड़ा बाजार की सबसे खास बात यह थी कि यहां सिर्फ एक बाजार नहीं था। अलग-अलग गलियों और इलाकों की अपनी अलग पहचान थी।

लाला बाजार : पुराने शहर का प्रमुख व्यापारिक इलाका। आज भी यहां पारंपरिक बाजार संस्कृति दिखाई देती है।

कचहरी बाजार : नाम से ही पता चलता है कि इसका संबंध प्रशासनिक और अदालत क्षेत्र से रहा। इसके आसपास कारोबार विकसित हुआ।

कर्कखाना बाजार : यहां कार्यशालाओं और कारीगरों की गतिविधियां महत्वपूर्ण थीं। पुराने लकड़ी के घर और पारंपरिक निर्माण शैली आज भी इस इलाके की अलग पहचान हैं।

जौहरी बाजार : कुमाऊं के पारंपरिक आभूषणों का बाजार। यहां सोने-चांदी के साथ स्थानीय शैली के गहनों की परंपरा रही है।

तमता मोहल्ला और तांबे का कारोबार

अल्मोड़ा के पारंपरिक तांबे के बर्तन पूरे कुमाऊं की पहचान बने। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार तमता समुदाय के कारीगर कभी शाही सिक्के बनाने से जुड़े थे और बाद में उन्होंने तांबे के बर्तन तथा सजावटी वस्तुएं बनाना शुरू किया।

इस तरह बाजार सिर्फ दुकानों की कतार नहीं था। यहां कारीगर, व्यापारी, सुनार, बर्तन बनाने वाले और स्थानीय उत्पाद बेचने वाले लोगों का पूरा आर्थिक नेटवर्क मौजूद था।

दूर-दूर के गांवों से क्यों आते थे लोग?

आज किसी पहाड़ी गांव में जरूरत का सामान मिल जाना सामान्य बात है। लेकिन पहले स्थिति अलग थी। कई गांवों में दुकानें सीमित थीं। कपड़े, बर्तन, गहने और दूसरे जरूरी सामान के लिए लोगों को बड़े बाजार जाना पड़ता था। गांवों से लोग पैदल या दूसरे उपलब्ध साधनों से अल्मोड़ा पहुंचते थे।

वापसी में वे सिर्फ सामान लेकर नहीं जाते थे। बाजारों से गांवों तक खबरें, सामाजिक संपर्क और नए कारोबार के अवसर भी पहुंचते थे। यही वजह है कि पहाड़ के पुराने बाजारों को केवल आर्थिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक केंद्र भी कहा जा सकता है।

एक परिवार की बाजार यात्रा कभी-कभी कई जरूरतें एक साथ पूरी करती थी। खरीदारी, सरकारी काम, रिश्तेदारों से मुलाकात और शहर की जानकारी।

बाजार का स्वर्णिम दौर कैसा रहा होगा?

अल्मोड़ा लंबे समय तक कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र रहा। जिला प्रशासन के अनुसार शहर चंद राजाओं द्वारा विकसित किया गया और बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान भी इसका विकास हुआ। आज भी जिला प्रशासन अल्मोड़ा को कुमाऊं क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र बताता है। पुराने बाजारों में उस समय स्थानीय जरूरतों से जुड़ा लगभग हर तरह का कारोबार मिलता था।

  • तांबे के बर्तन
  • सोने-चांदी के गहने
  • ऊन और पारंपरिक कपड़े
  • मसाले और खाद्य सामग्री
  • स्थानीय कृषि उत्पाद
  • हस्तशिल्प

आज भी पर्यटन विभाग अल्मोड़ा के बाजारों को स्थानीय हस्तशिल्प और कुमाऊं की पारंपरिक खरीदारी से जोड़ता है।

फिर सड़कें आईं और बाजार की दुनिया बदल गई

यहां कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ आता है। पहाड़ के लिए सड़क का मतलब था गांवों को शहर से जोड़ना। मरीज जल्दी अस्पताल पहुंच सके। बच्चों को स्कूल-कॉलेज जाना आसान हुआ। किसान अपना उत्पाद सीधे दूसरी मंडियों तक पहुंचा सके। लेकिन इसका एक आर्थिक असर पुराने बाजारों पर भी पड़ा।

पहले जहां आसपास के दर्जनों गांव किसी एक बड़े बाजार पर निर्भर थे, वहां धीरे-धीरे गांवों और छोटे कस्बों में ही दुकानें खुलने लगीं। लोग हर छोटी जरूरत के लिए दूर अल्मोड़ा जाने के बजाय अपने नजदीकी बाजार से खरीदारी करने लगे।

इस बदलाव का साफ उदाहरण कुमाऊं के दूसरे पुराने पहाड़ी बाजारों में भी दिखाई देता है। रानीखेत के व्यापारियों ने 2025 में बताया कि गांवों तक सड़कें पहुंचने और स्थानीय स्तर पर दुकानें खुलने से पुराने केंद्रीय बाजार पर निर्भरता कम हुई और कारोबार प्रभावित हुआ। यानी सड़क ने पहाड़ को जोड़ा जरूर, लेकिन उसने पुराने बाजारों की एकाधिकार वाली भूमिका खत्म कर दी।

नए बाजार और बदलती खरीदारी

सड़क नेटवर्क बढ़ने के बाद एक और बदलाव आया। अब सामान सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रहा। ट्रक और दूसरे वाहनों के जरिए दूर-दराज के उत्पाद पहाड़ तक पहुंचने लगे। हल्द्वानी और दूसरे बड़े शहरों से सामान आसानी से आने लगा।

फिर ऑनलाइन खरीदारी ने भी तस्वीर बदली। आज अल्मोड़ा के किसी ग्राहक के पास पहले से ज्यादा विकल्प हैं। वह स्थानीय बाजार से खरीद सकता है, बड़े शहर से मंगा सकता है या ऑनलाइन ऑर्डर कर सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि पुराना बाजार खत्म हो गया। बल्कि उसकी भूमिका बदल रही है। जहां पहले वह पूरे इलाके की रोजमर्रा की जरूरतों का मुख्य केंद्र था, अब उसके सामने नई चुनौती है। अपनी ऐतिहासिक और स्थानीय पहचान को बचाते हुए नए ग्राहकों को आकर्षित करना।

आज पुराने बाजार की स्थिति क्या है?

अल्मोड़ा के लाला बाजार और पलटन बाजार आज भी शहर के प्रमुख बाजार क्षेत्रों में शामिल हैं। उत्तराखंड प्रशासन से जुड़े 2024 के एक अध्ययन में इन्हें अल्मोड़ा के मुख्य बाजार क्षेत्रों में गिना गया है। लेकिन बाजारों की चुनौती सिर्फ ग्राहकों की संख्या नहीं है।

  • संकरी गलियां
  • पार्किंग की कमी
  • पुरानी इमारतें
  • आधुनिक सुविधाओं की जरूरत

पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए बेहतर प्रस्तुति

इन सवालों के बीच राज्य सरकार भी पुराने बाजारों को पर्यटन और स्थानीय व्यापार से दोबारा जोड़ने की कोशिश कर रही है। 2025 में उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने 50 प्रमुख बाजारों को पारंपरिक डिजाइन के साथ विकसित करने की योजना की जानकारी दी थी। इस योजना के पहले चरण में अल्मोड़ा के पटल बाजार को भी शामिल करने की बात कही गई। सरकार का तर्क था कि राज्य में पर्यटक संख्या बढ़ने के बावजूद स्थानीय बाजारों को उसका पूरा आर्थिक फायदा नहीं मिल रहा है।

क्या पुराना बाजार फिर से पहाड़ की अर्थव्यवस्था का केंद्र बन सकता है? : शायद पहले की तरह नहीं। क्योंकि आज सड़कें, छोटे कस्बे, नए बाजार और डिजिटल खरीदारी पहाड़ की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन पुराने बाजार के पास एक ऐसी ताकत है जो किसी नए बाजार के पास नहीं, उसकी पहचान और इतिहास।

  • अल्मोड़ा का तांबे का काम
  • पारंपरिक गहने
  • पुरानी लकड़ी और पत्थर की वास्तुकला
  • कुमाऊं की मिठाइयां और स्थानीय खानपान
  • सदियों पुरानी बाजार संस्कृति

अगर इन्हें पर्यटन और आधुनिक कारोबार से सही तरीके से जोड़ा जाए तो पुराने बाजार फिर से आर्थिक रूप से मजबूत हो सकते हैं।

सबसे बड़ी बात : अल्मोड़ा के पुराने बाजार की कहानी दरअसल सड़क के आने से खत्म हुई कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें सड़क ने लोगों को पुराने बाजार तक पहुंचने की सुविधा दी, फिर वही सड़क उन्हें नए बाजारों तक भी ले गई।

कभी दूर-दूर के गांवों का एक ही आर्थिक केंद्र था। आज विकल्प बढ़ गए हैं। अब सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड अपने पुराने बाजारों को सिर्फ इतिहास की गलियां बनने देगा या उन्हें विरासत और आधुनिक अर्थव्यवस्था का नया केंद्र बनाएगा?

Updated on:
21 Aug 2026 03:54 pm
Published on:
21 Aug 2026 03:54 pm