
AI tools impact on brain: डिजिटल युग में चैट GPT, क्लाउड और अन्य जेनरेटिव AI प्लेटफार्म समय बचाने और जटिल कामों को आसानी से करने के शक्तिशाली साधन बन गए हैं। सामान्य भाषा में दिए गए प्रॉम्प्ट पर ये प्लेटफार्म विस्तृत जवाब देते हैं। ईमेल लिखने, कोडिंग, अनुवाद, यात्रा प्लानिंग और यहां तक कि अदालती कामों में भी AI का इस्तेमाल हो रहा है। स्कूल, यूनिवर्सिटी, दफ्तर और निजी जीवन में AI टूल्स हर जगह मौजूद हैं।
AI टूल्स हमारे दिमाग से कई गुना तेज काम करते हैं और चंद सेकंड में बेहतर नतीजे देते हैं। विशेषज्ञों और हालिया अध्ययनों के अनुसार, AI जितनी आसानी से मदद करता है, उतनी ही तेजी से हमारे दिमाग को धीमा कर रहा है। अधिकतर कार्यों के लिए AI टूल्स पर निर्भर रहने वाले लोगों में याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और आलोचनात्मक सोच पर गंभीर असर दिख रहा है। जेनरेटिव AI प्लेटफार्म खासकर युवाओं पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। वैज्ञानिक इस गंभीर विकार से बचने के लिए AI प्लेटफार्म का सीमित इस्तेमाल की सलाह दे रहे हैं।
आज के दौर में AI टूल्स हर क्षेत्र में घुल-मिल गए हैं। छात्र असाइनमेंट तैयार करने, प्रोफेशनल्स रिपोर्ट लिखने और आम लोग रोजमर्रा के काम निपटाने के लिए इनका सहारा ले रहे हैं। AI की क्षमता इतनी व्यापक है कि यह लगभग हर तरह की बौद्धिक गतिविधि में मदद कर सकता है। AI प्लेटफार्म की यही खूबी अब चिंता का विषय बन गई है।
हाल ही में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों ने AI पर निर्भरता के नुकसान को उजागर किया है। खासतौर पर संज्ञानात्मक कामों (दिमागी कार्यों) को AI के भरोसे छोड़ने से नुकसान हो रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि AI पर निर्भरता से याददाश्त कमजोर हो रही है, निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो रही है और आलोचनात्मक सोच घट रही है। इसके अलावा 1,222 लोगों पर किए गए एक अमेरिकी-ब्रिटिश अध्ययन में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं।
रिसर्च में पाया गया कि AI टूल के इस्तेमाल से अंकगणित के सवाल हल करने या रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन जैसे टास्क में शुरुआती दौर में प्रदर्शन बेहतर होता है। लेकिन लंबे समय में नतीजे गिरने लगते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि AI टूल उपलब्ध न होने पर खुद से कोशिश करने की इच्छा और क्षमता भी कम हो जाती है। रिसर्चरों का कहना है कि किसी कौशल को सीखने के लिए जिद और दृढ़ता बेहद जरूरी है। यह लंबे समय तक सीखने का सबसे मजबूत संकेतक है।
अफ्रीका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के डॉक्टरेट के छात्र ग्रेस लियु के मुताबिक, AI का हर सवाल का तेज जवाब देना यूजर्स के 'सीखने के अवसरों' को कम कर देता है। लियु ने आगे बताया कि AI किसी खास गतिविधि के लिए नहीं बना है। AI को तार्किक, बौद्धिक और संज्ञानात्मक हर तरह की गतिविधि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जो इसे खासतौर पर खतरनाक बनाता है। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर समीकरण हल करने में मदद करता है, लेकिन तार्किक प्रक्रिया इंसानी दिमाग में ही चलती रहती है। जेनरेटिव AI पूरी प्रक्रिया खुद संभाल लेता है।
साल 2025 में MIT की एक स्टडी में पाया गया कि जेनरेटिव AI का इस्तेमाल करके लेख लिखने वाले छात्रों की आलोचनात्मक सोच की क्षमता घट रही है। इसी तरह की अन्य रिसर्च में इस स्थिति को 'संज्ञानात्मक बोझ हटाना' या 'संज्ञानात्मक समर्पण' कहा गया है। यानी दिमाग काम करना कम या बंद कर देता है। फ्रांस की सरकारी रिसर्च संस्थान CNRS के योआन श्वालेर का कहना है कि इंसानों में ऊर्जा बचाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।
रिसर्चर कहते हैं कि हम अक्सर आसान रास्ता चुनते हैं, जो काम जल्दी पूरा कर दे। हम सोचतने हैं कि बिना सोचे-समझे काम हो जाए। जेनरेटिव AI इस प्रवृत्ति को और मजबूत कर रहा है। अगर हम कुछ गतिविधियां कभी खुद नहीं करेंगे तो दिमाग उन न्यूरल कनेक्शन्स को बनाए रखने का प्रयास भी नहीं करेगा जिनका इस्तेमाल नहीं हो रहा।
AI के बढ़ते नुकसान को देखते हुए डेवलपर्स अब सावधानी बरत रहे हैं। कई कंपनियां 'सोक्रैटिक' फंक्शन विकसित कर रही हैं, जिसमें चैटबॉट सीधा जवाब देने की बजाय सवाल पूछकर यूजर की सोच को बढ़ावा देता है। ओपन AI के चैट GPT का 'स्टडी मोड' और गूगल जेमिनाइ का 'गाइडेड लर्निंग' इसके उदाहरण हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने अपने कोपायलट मॉडल में गलती के जोखिम की चेतावनी शामिल की है। कंपनी यूजर्स को याद दिलाती है कि AI द्वारा दी गई जानकारी की खुद जांच करें।
दिग्गज टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का कहना है कि संज्ञानात्मक बोझ को अत्यधिक हटाने का जोखिम वास्तविक है। खासकर उन कामों में, जहां कौशल विकास जरूरी है। कंपनी यूजर्स को सही इस्तेमाल के लिए ट्रेनिंग देने पर जोर दे रही है। विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि AI के मानव दिमाग पर लंबे समय के प्रभावों को समझने के लिए बड़े पैमाने पर और लंबी अवधि के अध्ययन अभी तक नहीं हुए हैं।
फ्रांस की सरकारी रिसर्च संस्थान CNRS के रिसर्चरों के मुताबिक, जब तक ठोस सबूत नहीं मिल जाते, हमें AI का चतुराई से इस्तेमाल करना होगा। हम पहले भी तकनीकी क्रांतियों के अनुकूल खुद को ढाल चुके हैं, भविष्य में भी ढल जाएंगे। हालांकि, शिक्षा जगत और कार्यस्थलों में AI को सहायक के रूप में इस्तेमाल करने की बजाय रिप्लेसमेंट के रूप में देखने की प्रवृत्ति चिंताजनक है।
तेजी से बढ़ते AI के इस्तेमाल और इसके जोखिमों पर विशेषज्ञों ने शिक्षकों और अभिभावकों सुझाव दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों को AI के साथ-साथ खुद सोचने-समझने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। कार्यालयों में भी ऐसे टूल्स को अपनाते समय संतुलन बनाना जरूरी है। AI एक शक्तिशाली तकनीक है, लेकिन अगर हम अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं को बचाए रखना चाहते हैं तो इसे स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल करना होगा।
सुविधा के नाम पर दिमाग की कसरत छोड़ने का भविष्य में बहुत भारी पड़ सकता है। जेनरेटिव AI हमें कई कामों में मदद कर रहा है, लेकिन हमें सतर्क रहना होगा। संतुलित उपयोग ही इस तकनीकी क्रांति को फायदेमंद बना सकता है। अन्यथा, हम तेजी से सोचने वाले दिमागों की बजाय AI पर निर्भर सोचने वाले मशीनों की पीढ़ी तैयार कर रहे होंगे।