
Jantar Mantar history : कभी खगोलीय गणना के लिए बना जंतर-मंतर, आज बना प्रदर्शन का केंद्र, PC- Patrika
Jantar Mantar Delhi : दिल्ली का जंतर-मंतर आज धरना-प्रदर्शनों का पर्याय बन चुका है। किसान आंदोलन हो, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन, पहलवानों का प्रदर्शन या किसी छात्र संगठन का विरोध…दिल्ली में आवाज उठानी हो तो जंतर-मंतर पहुंचना लगभग परंपरा बन गई है। हाल ही में 2026 में नीट-यूजी पेपर लीक की निष्पक्ष जांच और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर भी यही जगह हफ्तों से आंदोलन का केंद्र बनी हुई है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह जगह कभी राजनीति नहीं, बल्कि विज्ञान और गणित की प्रयोगशाला थी। इसे बनाने वाला शख्स कोई वैज्ञानिक नहीं, बल्कि जयपुर का राजा था…महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय।
सवाई जय सिंह द्वितीय (1688–1743) आम राजाओं की तरह केवल युद्ध और शासन तक सीमित नहीं थे। उन्हें गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान और वास्तुकला में गहरी रुचि थी। इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने संस्कृत, फारसी, अरबी और यूरोपीय खगोलीय ग्रंथों का गहन अध्ययन करवाया। उस दौर में प्रचलित खगोलीय गणनाओं में कई त्रुटियां मिल रही थीं। ग्रहण, ग्रहों की स्थिति और पंचांग की तिथियों में अंतर साफ दिखाई देता था। इसी समस्या को हल करने के लिए उन्होंने विशाल वेधशालाएं बनाने का निर्णय लिया।
आज मोबाइल ऐप कुछ सेकंड में सूर्योदय-सूर्यास्त बता देते हैं, लेकिन 300 साल पहले ऐसा नहीं था। सवाई जय सिंह के सामने पांच बड़ी चुनौतियां थीं:
इन्हीं उद्देश्यों से जंतर-मंतर वेधशालाओं का निर्माण हुआ।
जंतर-मंतर दरअसल पत्थर और ईंट से बने विशाल गणितीय उपकरण हैं। इनका पूरा डिजाइन ज्यामिति, त्रिकोणमिति, कोण मापन और खगोलीय निर्देशांक प्रणाली पर आधारित है। उदाहरण के लिए, सम्राट यंत्र का झुकाव पृथ्वी की धुरी के कोण के बराबर रखा गया है, ताकि सूर्य की छाया के आधार पर सटीक समय निकाला जा सके। यानी जंतर-मंतर केवल इमारत नहीं, बल्कि एक विशाल 'ओपन एयर मैथ लैब' है।
दिलचस्प बात यह है कि 18वीं शताब्दी में दूरबीनें मौजूद थीं, फिर भी इतने बड़े पत्थर के यंत्र क्यों बनाए गए? दरअसल उस समय की दूरबीनों और धातु के छोटे उपकरणों में तकनीकी सीमाएं थीं- वे घिस जाते थे और माप में त्रुटि आ जाती थी। सवाई जय सिंह का मानना था कि यदि उपकरण बहुत बड़े और स्थिर बनाए जाएं तो माप कहीं अधिक सटीक होगी। इसीलिए उन्होंने पत्थर और चिनाई से विशाल यंत्र तैयार करवाए।
महाराजा जय सिंह ने कुल पांच वेधशालाओं का एक नेटवर्क बनाया था, ताकि अलग-अलग स्थानों से मिले आंकड़ों की आपस में तुलना की जा सके-
दिल्ली - लगभग 1724 में निर्मित, इसे पहला जंतर-मंतर माना जाता है। आज यह लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रतीक बन चुका है।
जयपुर - सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित जंतर-मंतर, जहां लगभग 20 प्रमुख यंत्र मौजूद हैं। 2010 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला।
उज्जैन - प्राचीन भारत में खगोल विज्ञान का प्रमुख केंद्र होने के नाते यहां भी वेधशाला बनाई गई।
वाराणसी - ज्ञान और शिक्षा की प्राचीन नगरी होने के कारण यहां भी जंतर-मंतर स्थापित किया गया।
मथुरा - पांचवां जंतर-मंतर मथुरा में था, लेकिन 1857 से पहले ही यह नष्ट हो गया और आज इसके अवशेष भी लगभग नहीं बचे हैं।
सम्राट यंत्र - इसे दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्यघड़ी माना जाता है, जिससे समय की गणना की जाती थी।
राम यंत्र - किसी खगोलीय पिंड की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए।
जय प्रकाश यंत्र - आकाशीय पिंडों की स्थिति जानने के लिए।
मिश्र यंत्र - विभिन्न खगोलीय गणनाओं के लिए संयुक्त उपकरण।
नाम की बात करें तो 'जंतर-मंतर' शब्द संस्कृत के 'यंत्र' (उपकरण) और 'मंत्र' (सूत्र या गणना-विधि) से मिलकर बना है- यानी सीधे शब्दों में 'गणना करने का यंत्र'।
आजादी के बाद दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शन इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब लॉन्स (राजपथ क्षेत्र) में हुआ करते थे। 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में हुए विशाल किसान आंदोलन ने राजधानी में भारी अव्यवस्था पैदा कर दी थी। इसके चलते सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए, प्रधानमंत्री कार्यालय की नजदीकी को देखते हुए, 1993 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बोट क्लब में धरना-प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया।
इसके बाद जंतर-मंतर रोड को विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थान बनाया गया। संसद, मंत्रालयों और मीडिया कार्यालयों के पास होने के कारण यह जल्दी ही आंदोलनों का केंद्र बन गया।
2011 - अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन
2012 - निर्भया मामले में न्याय की मांग
2017 - तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन
2023 - पहलवानों का आंदोलन
2026 - नीट यूजी पेपर लीक की निष्पक्ष जांच और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्रों और विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों का लंबा धरना
नहीं। यूनेस्को के अनुसार जंतर-मंतर केवल खगोलीय वेधशाला नहीं था, बल्कि विज्ञान, सत्ता, धर्म और समाज के संगम का प्रतीक भी था। यह उस दौर की वैज्ञानिक सोच और राजकीय शक्ति दोनों को एक साथ दर्शाता है।
Updated on:
22 Jul 2026 10:51 am
Published on:
22 Jul 2026 10:51 am
