
खरीफ सीजन में मक्के की फसल किसानों के लिए आय का बड़ा स्रोत होती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फॉल आर्मी वर्म (Fall Armyworm) नामक कीट ने इसकी खेती को बड़ी चुनौती बना दिया है। यह कीट बहुत तेजी से फैलता है और यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए तो पूरी फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। खासकर बारिश के मौसम में, जब मक्का घुटने से लेकर कमर तक की ऊंचाई पर पहुंचता है, तब इसका प्रकोप सबसे अधिक देखने को मिलता है।
फॉल आर्मी वर्म की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका लार्वा पौधे के गाभे (Whorl) में छिप जाता है और अंदर ही अंदर पत्तियों को खाना शुरू कर देता है। इससे पत्तियों में बड़े-बड़े छेद दिखाई देने लगते हैं, बीच की पत्ती कट जाती है और पौधे की बढ़वार रुक जाती है। इसकी पहचान सिर पर बने उल्टे अंग्रेजी अक्षर ‘Y’ के निशान से की जा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि फॉल आर्मी वर्म के खिलाफ लड़ाई खेत में नियमित निगरानी से शुरू होती है। किसान सप्ताह में कम से कम दो बार खेत का निरीक्षण करें और पौधों के गाभे को ध्यान से देखें। यदि पत्तियों में छेद, खुरचाव या कीट का मल दिखाई दे तो तुरंत नियंत्रण के उपाय शुरू कर देने चाहिए।
कई किसान केवल कीटनाशकों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि फॉल आर्मी वर्म का सबसे अच्छा नियंत्रण एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) से होता है। इसमें जैविक, यांत्रिक, सांस्कृतिक और रासायनिक सभी उपायों का संतुलित उपयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए, मक्के के गाभे में थोड़ी सूखी रेत या बारीक मिट्टी डालना एक आसान और सस्ता तरीका है। इससे लार्वा की गतिविधि प्रभावित होती है और कीट का प्रकोप कम हो सकता है। यह उपाय छोटे किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है।
शुरुआती अवस्था में नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग भी लाभदायक रहता है। नीम में मौजूद तत्व कीटों की वृद्धि और प्रजनन को प्रभावित करते हैं, जिससे उनकी संख्या नियंत्रित रहती है।
फॉल आर्मी वर्म की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप बेहद उपयोगी माने जाते हैं। ये ट्रैप वयस्क कीटों को आकर्षित करते हैं और किसानों को यह संकेत देते हैं कि खेत में प्रकोप बढ़ने वाला है। यदि लगातार दो-तीन दिनों तक ट्रैप में कीट दिखाई दें, तो नियंत्रण के उपाय तुरंत शुरू कर देने चाहिए।
इसके साथ ही Trichogramma जैसे परजीवी कीट और Metarhizium anisopliae जैसे जैविक फफूंद भी फॉल आर्मी वर्म को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प माने जाते हैं।
यदि प्रकोप अधिक हो जाए, तो वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। Coragen (Chlorantraniliprole 18.5% SC) फॉल आर्मी वर्म नियंत्रण के लिए प्रभावी माना जाता है। सामान्य तौर पर 30 मिलीलीटर दवा को 60 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाता है। ध्यान रहे कि दवा पौधे के गाभे तक पहुंचे, क्योंकि कीट अधिकतर वहीं छिपा रहता है।
कुछ क्षेत्रों में किसान पॉइजन बेट (Poison Bait) तकनीक का भी उपयोग कर रहे हैं। इसमें चोकर या ज्वार, गुड़ और अनुशंसित कीटनाशक मिलाकर छोटे गोले बनाए जाते हैं। इन्हें पौधों के गाभे में रखा जाता है, जिससे लार्वा इन्हें खाकर नष्ट हो जाता है। यह तरीका कम लागत में अच्छा परिणाम देने के लिए जाना जाता है।
महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में किए गए विभिन्न कृषि परीक्षणों में पाया गया कि IPM तकनीक अपनाने से फॉल आर्मी वर्म की आबादी में 60 से 80 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। साथ ही किसानों का उत्पादन बढ़ा और कीटनाशकों पर खर्च भी कम हुआ।
| उपाय | फायदा |
|---|---|
| खेत की नियमित निगरानी | समय पर पहचान |
| फेरोमोन ट्रैप | प्रकोप की शुरुआती जानकारी |
| नीम आधारित उत्पाद | जैविक नियंत्रण |
| रेत/मिट्टी डालना | लार्वा की गतिविधि कम |
| Trichogramma | अंडों का नियंत्रण |
| Metarhizium | प्राकृतिक जैविक नियंत्रण |
| Coragen | गंभीर प्रकोप में प्रभावी |
| IPM मॉडल | सबसे टिकाऊ और किफायती समाधान |