
child Mental Health: भावनात्मक उतार-चढ़ाव (Photo Source- freepik)
Mental Health: "आज बहुत एंग्जायटी हो रही है…", "मुझे शायद थेरेपी की जरूरत है…" जैसे वाक्य अब केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। 15 साल तक के बच्चे भी अपनी रोजमर्रा की बातचीत में एंग्जायटी, ट्रॉमा, थेरेपी और ओवरथिंकिंग जैसे मनोवैज्ञानिक शब्दों का सहज इस्तेमाल कर रहे है। स्कूल, ट्यूशन और सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा होने से ये शब्द नई पीढ़ी की भाषा का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता का संकेत है। पहले जहां बच्चों की भावनात्मक परेशानियों पर खुलकर बात नहीं होती थी, वहीं अब सकारात्मक माहौल और बदलती पेरेंटिंग के कारण बच्चे अपनी भावनाएं साझा करने लगे हैं।
मानसिक आरोग्यशाला के मनोवैज्ञानिक डॉ. अमन किशोर बताते हैं कि पहले मानसिक समस्याओं, खासकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। संयुक्त परिवारों में भावनात्मक सहारा अधिक मिलता था, लेकिन अब एकल परिवार, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सोशल मीडिया का प्रभाव बच्चों में मानसिक दबाव बढ़ा रहा है। ऐसे में माता-पिता भी अब समस्याओं को नजरअंदाज करने के बजाय काउंसलिंग और थेरेपी का सहारा लेने लगे हैं।
डॉ. अमन के अनुसार, यह सकारात्मक है कि बच्चे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन हर तनाव, असफलता या निराशा को 'ट्रॉमा' कहना सही नहीं है। ट्रॉमा एक गंभीर मनोवैज्ञानिक स्थिति है। जिसकी पहचान विशेषज्ञ तय मानकों के आधार पर करते हैं। रोजमर्रा का तनाव और भावनात्मक उतार-चढ़ाव जीवन का सामान्य हिस्सा हैं।
-छोटी-छोटी बातों पर डरना या घबराना। पहले की तुलना में अधिक चुप या अलग-थलग रहना।
-गुस्सा, चिड़चिड़ापन या आक्रामक व्यवहार बढ़ना।
-किसी बात की जरूरत से ज्यादा चिंता करना। नींद और भूख के पैटर्न में बदलाव।
-बच्चों को मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के उपाय
-उनकी बात बिना टोके ध्यान से सुनें। भावनाओं को नजरअंदाज न करें।
-सोशल मीडिया को जीवन का केंद्र न बनने दें। जरूरत पड़ने पर स्कूल काउंसलर या
-मनोवैज्ञानिक से सलाह लें।
Updated on:
14 Aug 2026 05:53 pm
Published on:
14 Aug 2026 05:53 pm
