
भारत की चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली, मुफ्त बस यात्रा, नकद सहायता, किसानों को आर्थिक मदद और सब्सिडी अब आम हो चुकी हैं। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले बहस सिर्फ 'सरकार जनता को क्या दे रही है?' तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि इन योजनाओं का खर्च कितना है और राज्य इन्हें लंबे समय तक चला भी पाएंगे या नहीं?
2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। यानी आने वाला साल कई बड़े राज्यों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
इसी बीच ग्रामीण रोजगार गारंटी में भी बड़ा बदलाव हुआ है। 1 जुलाई 2026 से MGNREGA की जगह VB-G RAM G लागू हुआ और रोजगार की कानूनी गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई। इसके लिए केंद्र ने 2026-27 में ₹95,692 करोड़ का प्रावधान किया है और केंद्र-राज्य हिस्सेदारी के साथ कुल कार्यक्रम खर्च ₹1.51 लाख करोड़ से अधिक रहने का अनुमान है।
तो सवाल है क्या भारत में ‘फ्रीबी बनाम वेलफेयर’ की नई राजनीति शुरू हो गई है?
फ्रीबी का सामान्य मतलब है ऐसी मुफ्त या अत्यधिक रियायती सुविधा, वस्तु या आर्थिक लाभ, जिसका तत्काल खर्च सरकार उठाती है। लेकिन हर मुफ्त योजना को फ्रीबी कहना सही नहीं होगा।
| वेलफेयर | फ्रीबी |
|---|---|
| सामाजिक सुरक्षा देने पर जोर | तत्काल लाभ देने पर जोर |
| रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी योजनाएं | मुफ्त बिजली, यात्रा या नकद लाभ जैसे उदाहरण |
| लोगों की क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य हो सकता है | चुनावी वादे का हिस्सा बन सकती है |
| लंबी अवधि का सामाजिक उद्देश्य | तत्काल राजनीतिक आकर्षण संभव |
हालांकि दोनों के बीच कोई बिल्कुल तय कानूनी सीमा नहीं है। किसी योजना को समझने के लिए उसके उद्देश्य, लाभार्थियों, लागत और लंबे समय के असर को देखना जरूरी है।
यह अंतर समझने के लिए नई ग्रामीण रोजगार योजना महत्वपूर्ण उदाहरण है। VB-G RAM G के तहत ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिन के मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी मिली है। इसमें पानी, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, आजीविका और जलवायु से जुड़े कामों पर जोर है। अगर निर्धारित समय में काम नहीं मिलता तो बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान भी है।
यानी सरकार सिर्फ मुफ्त पैसा नहीं बांट रही। काम के बदले मजदूरी और गांव में परिसंपत्ति निर्माण इसका हिस्सा है। इसलिए इसे सीधे फ्रीबी कहना सही नहीं होगा।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है पहले 100 दिन की तुलना में 125 दिन की गारंटी का मतलब है कि कार्यक्रम का वित्तीय आकार भी बड़ा होगा। खासकर इसलिए क्योंकि नई व्यवस्था में राज्यों की भी वित्तीय हिस्सेदारी है। सामान्य राज्यों के लिए केंद्र-राज्य हिस्सेदारी 60:40 है, जबकि उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए यह 90:10 है।
चुनावी राजनीति में ऐसी योजनाओं का सीधा असर मतदाता के जीवन पर दिखाई देता है। हर महीने खाते में आने वाली नकद सहायता, बिजली बिल में राहत, मुफ्त यात्रा या किसानों को आर्थिक मदद जैसी चीजें मतदाता तुरंत महसूस करता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए इन्हें चुनावी वादे के रूप में पेश करना आसान होता है।
यही वजह है कि आने वाले चुनावों में सवाल सिर्फ “कौन बेहतर सरकार देगा?” नहीं, बल्कि “कौन जनता को कितना लाभ देगा?” भी बन सकता है। लेकिन यहां एक मुश्किल है, चुनाव में किया गया वादा अगर सरकार बनने के बाद स्थायी योजना बन जाए तो उसका खर्च भी स्थायी हो जाता है।
सरकारों की आय मुख्य रूप से टैक्स, गैर-कर राजस्व, केंद्र से मिलने वाले हस्तांतरण और उधारी से आती है। मान लीजिए किसी राज्य ने नई योजना शुरू की और हर साल उस पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने हैं। अगर राज्य की आय उसी गति से नहीं बढ़ती, तो सरकार के सामने तीन रास्ते होते हैं-
यहीं से फ्रीबी और वित्तीय अनुशासन की बहस शुरू होती है। 16वें वित्त आयोग ने राज्यों के राजकोषीय घाटे को GSDP के 3% तक सीमित रखने की सिफारिश की है और ऑफ-बजट उधारी को भी बजट में दिखाने पर जोर दिया है।
इसका मतलब यह नहीं कि सरकारें कल्याणकारी योजनाएं बंद कर दें। मतलब यह है कि योजनाओं की लागत और उन्हें चलाने की क्षमता का हिसाब भी होना चाहिए।
सरकार के पास पैसा सीमित है। अगर उसका बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज, सब्सिडी और नकद सहायता जैसी मदों में चला जाता है तो सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल और दूसरी पूंजीगत परियोजनाओं के लिए पैसा कम पड़ सकता है।
यही कारण है कि फ्रीबी की बहस में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि लाभार्थी को कितना मिला। यह भी देखना जरूरी है कि सरकार ने उस पैसे की कीमत क्या चुकाई।
उदाहरण के लिए, अगर मुफ्त बिजली से गरीब परिवार को राहत मिलती है तो उसका सामाजिक फायदा है। लेकिन अगर बिजली सब्सिडी इतनी बढ़ जाए कि बिजली वितरण कंपनियों का वित्तीय संकट बढ़ने लगे और सरकार को लगातार ज्यादा पैसा डालना पड़े, तो उसकी आर्थिक कीमत भी होगी।
नहीं। भारत जैसे देश में सामाजिक सुरक्षा की जरूरत है। गरीब परिवारों के लिए मुफ्त या सस्ती स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, राशन और रोजगार सहायता जीवन स्तर सुधार सकती है। समस्या तब होती है जब योजना:
इसलिए किसी योजना को सिर्फ 'फ्रीबी' कह देना भी उतना ही गलत है जितना हर मुफ्त योजना को 'कल्याण' मान लेना।
2027 में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटें इसे सबसे बड़ा चुनावी मैदान बनाती हैं।
ऐसे में रोजगार, महिलाओं को आर्थिक सहायता, किसान योजनाएं, बिजली-पानी की सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण रह सकते हैं।
लेकिन आने वाले चुनावों में एक और सवाल ज्यादा जोर से उठ सकता है- 'आपका वादा कितना बड़ा है और उसका बिल कौन भरेगा?' यही सवाल राजनीतिक दलों को अपनी घोषणाओं की वित्तीय लागत बताने के लिए मजबूर कर सकता है।
लाभ किसे मिल रहा है? : क्या वास्तव में जरूरतमंद लोगों को फायदा मिल रहा है?
सरकार पर सालाना खर्च कितना है? : एक बार का खर्च और हर साल होने वाला खर्च अलग-अलग हैं।
क्या इससे लोगों की क्षमता बढ़ती है? : रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी योजनाएं भविष्य की आय क्षमता बढ़ा सकती हैं।
क्या सरकार इसे 5-10 साल तक चला सकती है? : यही सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय सवाल है।
पूरी तरह यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 2027 का चुनाव सिर्फ ‘फ्रीबी बनाम वेलफेयर’ के मुद्दे पर लड़ा जाएगा। लेकिन दिशा जरूर बदल रही है। एक तरफ सरकारें रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ा रही हैं। दूसरी तरफ चुनावी राजनीति में नकद सहायता और मुफ्त सेवाओं की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। वहीं वित्तीय संस्थाएं और वित्त आयोग राज्यों को घाटे और कर्ज पर नियंत्रण रखने की सलाह दे रहे हैं।
इसलिए आने वाले वर्षों की असली बहस शायद 'मुफ्त क्या है?' से आगे बढ़कर 'मुफ्त या रियायती योजना कितनी टिकाऊ है?' पर होगी। गरीब को राहत देना वेलफेयर है, लेकिन उस राहत को लंबे समय तक जारी रखने के लिए सरकार के पास पैसा भी होना चाहिए। यही 2027 से पहले की नई चुनौती है। चुनावी वादा कितना बड़ा हो और राज्य का बजट कितना उसे उठा सके।